Iran crisis: युद्ध की आंच में व्यापार, सरकार ‘एक्शन मोड’ में
जंग की आग में फंसा वैश्विक व्यापार, भारत पर बढ़ा दबाव हाई-लेवल मीटिंग में सप्लाई चेन बचाने की रणनीति तैयार MSME, निर्यात और जरूरी आयात को सुरक्षित रखने पर सरकार का फोकस

Iran crisis: इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच गहराते युद्ध ने सिर्फ सरहदों को ही नहीं हिलाया, बल्कि पूरी दुनिया की सप्लाई चेन को झकझोर दिया है। इसका असर अब भारत के कारोबार पर भी साफ दिखाई देने लगा है। मध्य एशिया के साथ होने वाले अरबों डॉलर के व्यापार पर खतरा मंडराता देख केंद्र सरकार अब पूरी तरह ‘एक्शन मोड’ में आ गई है। सोमवार को वाणिज्य मंत्रालय ने एक हाई-लेवल इमरजेंसी मीटिंग बुलाई, जिसमें युद्ध से पैदा होने वाले आर्थिक झटकों को कम करने के लिए ठोस रणनीति तैयार की गई। सरकार का साफ संदेश है, हालात चाहे जैसे हों, भारत का व्यापार नहीं रुकने दिया जाएगा।
बड़ी बैठक में कौन-कौन रहा शामिल?
यह अहम बैठक वाणिज्य विभाग के विशेष सचिव सुचिंद्र मिश्रा और महानिदेशक (DGFT) लव अग्रवाल की अध्यक्षता में हुई। इसमें शिपिंग कंपनियों, पेट्रोलियम मंत्रालय, भारतीय रिजर्व बैंक और केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) के वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हुए। बैठक का मुख्य मकसद यह था कि युद्ध का असर भारतीय बंदरगाहों, निर्यातकों और कारोबारियों तक कम से कम पहुंचे। सरकार चाहती है कि व्यापार की रफ्तार बनी रहे और बाजार में घबराहट न फैले।
सप्लाई चेन पर दबाव, बढ़ती लागत की चुनौती
युद्ध के कारण कई समुद्री मार्गों में बदलाव करना पड़ रहा है। इससे जहाजों की ट्रांजिट टाइम बढ़ गई है और माल ढुलाई (Freight) व बीमा (Insurance) की लागत में इजाफा हुआ है। सरकार खासतौर पर छोटे और मध्यम उद्योगों (MSME) को लेकर सतर्क है, क्योंकि बढ़ती लागत का सबसे ज्यादा असर इन्हीं पर पड़ता है। बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि निर्यात में गिरावट न आए और कारोबारियों को अतिरिक्त बोझ से राहत मिले।
इन 5 मोर्चों पर सरकार की तैयारी
1. प्रक्रिया में लचीलापन: अगर किसी देश के साथ व्यापार बाधित होता है तो एक्सपोर्ट मंजूरी की प्रक्रियाओं को आसान और तेज किया जाएगा। 2. फास्ट ट्रैक क्लीयरेंस: फल, सब्जियां और दवाओं जैसे जल्दी खराब होने वाले सामान के लिए सीमा शुल्क विभाग के साथ मिलकर विशेष ‘फास्ट ट्रैक’ व्यवस्था लागू की जाएगी। 3. वित्तीय सुरक्षा कवच: निर्यातकों को भुगतान में दिक्कत न हो, इसके लिए बैंक और बीमा कंपनियों के साथ लगातार समन्वय रहेगा। 4. कंटेनर की उपलब्धता: जहाजों के रूट बदलने के बावजूद कंटेनरों की कमी न हो, इसके लिए वैकल्पिक इंतजाम तलाशे जा रहे हैं। 5. रियल-टाइम मॉनिटरिंग: सभी मंत्रालयों के बीच डेटा शेयरिंग की व्यवस्था मजबूत की जाएगी, ताकि किसी भी संकट पर तुरंत फैसला लिया जा सके।सरकार ने साफ कर दिया है कि घरेलू उत्पादन और जरूरी आयात पर कोई असर नहीं पड़ने दिया जाएगा। मौजूदा वैश्विक तनाव के बीच भारत अपनी आर्थिक सेहत को बचाने के लिए सतर्क भी है और सक्रिय भी।



