जाति गणना और जनगणना 2027
जाति की सही गिनती के लिए बेहतर व्यवस्था जरूरी
नई दिल्ली। जनगणना 2027 के दूसरे चरण का अभ्यास (प्री-टेस्ट) 6 जुलाई से 16 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चल रहा है। इस बार लोगों से उनकी जाति पूछने के लिए एक खुला कॉलम रखा गया है, जिसमें वे अपनी जाति का नाम बताएंगे और गणनाकर्मी उसे दर्ज करेगा। यह अभ्यास 20 जुलाई तक चलेगा, जिसके बाद सरकार जाति गणना की अंतिम प्रक्रिया तय करेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि खुले कॉलम में जाति लिखवाने का तरीका भरोसेमंद आंकड़े नहीं दे सकता। अगर जाति का नाम खुला छोड़कर पूछा जाएगा, तो सही और उपयोगी आंकड़े मिलना मुश्किल हो सकता है। वर्ष 2011 के सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना (SECC) में भी यही तरीका अपनाया गया था। तब लोगों ने जाति, उपजाति, गोत्र और उपनाम अलग-अलग तरीके से दर्ज कराए, जिससे करीब 46 लाख अलग-अलग जाति नाम सामने आए। इसके मुकाबले 1931 की जनगणना, जिसमें आखिरी बार जातिवार आंकड़े प्रकाशित किए गए थे, में केवल 4,147 जातियां दर्ज थीं। इतनी बड़ी संख्या में अलग-अलग नाम आने के कारण 2011 के आंकड़े उपयोगी नहीं माने गए। केंद्र सरकार ने 2021 में सुप्रीम कोर्ट को भी बताया था कि उन आंकड़ों में इतनी त्रुटियां हैं कि उन्हें आरक्षण जैसे मामलों में आधार नहीं बनाया जा सकता।
विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि डिजिटल जनगणना में गणनाकर्मियों के हैंडहेल्ड उपकरणों में जातियों और उपजातियों की पहले से तैयार सूची उपलब्ध कराई जाए। उत्तरदाता की जानकारी के आधार पर गणनाकर्मी उसी सूची से सही विकल्प चुने। इससे गलतियां पूरी तरह खत्म नहीं होंगी, लेकिन आंकड़े अधिक व्यवस्थित और उपयोगी होंगे। बिहार की 2022-23 की जाति आधारित गणना में इसी तरह की व्यवस्था अपनाई गई थी, जिससे अपेक्षाकृत बेहतर आंकड़े मिले। दरअसल भाषा, धर्म या लिंग की तरह जाति कोई प्राकृतिक पहचान नहीं, बल्कि जन्म के आधार पर बनी सामाजिक पहचान है। संविधान का उद्देश्य जातिगत भेदभाव खत्म करना और सभी नागरिकों को समान अवसर देना है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब लक्ष्य जातिवाद को कम करना है, तो जाति की गिनती क्यों की जाए?
इसका जवाब यह है कि आज भी जाति के आधार पर सामाजिक और आर्थिक असमानताएं मौजूद हैं। ऐसे में सटीक जातिवार आंकड़े सरकार को कल्याणकारी योजनाएं, आरक्षण, क्रीमी लेयर और पिछड़े वर्गों के उप-वर्गीकरण जैसी नीतियां बेहतर ढंग से बनाने में मदद कर सकते हैं। अगर जाति का नाम खुला छोड़कर पूछा जाएगा, तो सही और उपयोगी आंकड़े मिलना मुश्किल हो सकता है।
निष्कर्ष यही है कि यदि जाति की गणना करनी है, तो वह वैज्ञानिक, एकरूप और सटीक तरीके से होनी चाहिए। केवल खुला कॉलम देकर लोगों से जाति लिखवाने का तरीका इस उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाएगा।



