करघे की खटखट में बुनी जा रही विरासत

डिजिटल प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन बिक्री, डिजाइन विकास और ब्रांडिंग के रास्ते बाजार में पहुंच बना रहे हैं हथकरघा उत्पाद

नई दिल्ली। भारत की सदियों पुरानी बुनकरी परंपरा, स्थानीय हुनर और लाखों बुनकर परिवारों के योगदान को सम्मान देने के लिए देशभर में आज राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया जा रहा है। 7 अगस्त को मनाया जाने वाला यह दिवस केवल कपड़ा बनाने की पारंपरिक कला का उत्सव नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, महिला रोजगार और भारत की विविध सांस्कृतिक पहचान से जुड़े हथकरघा क्षेत्र को पहचान देने का अवसर भी है। इस वर्ष राष्ट्रीय हथकरघा दिवस का 12वां आयोजन हो रहा है।

7 अगस्त को ही क्यों मनाया जाता है हथकरघा दिवस

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के लिए 7 अगस्त की तारीख का संबंध भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से है। 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता में हुए एक बड़े आंदोलन के दौरान स्वदेशी आंदोलन को गति मिली थी। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने की भावना ने भारतीय हस्तशिल्प और हथकरघा को भी राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ दिया।

इसी ऐतिहासिक महत्व को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2015 में 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस घोषित किया। पहला राष्ट्रीय हथकरघा दिवस चेन्नई में मनाया गया था। तब से हर साल इस दिन बुनकरों, डिजाइनरों और हथकरघा क्षेत्र से जुड़े लोगों को सम्मानित किया जाता है।

इस साल राष्ट्रपति भवन में मुख्य समारोह

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस का मुख्य समारोह 7 अगस्त 2026 को राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र (आरबीसीसी), नई दिल्ली में आयोजित किया जा रहा है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगी। इस दौरान वर्ष 2025 के राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार और संत कबीर हथकरघा पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। समारोह में बुनकरों, डिजाइनरों, निर्यातकों, उद्योग प्रतिनिधियों और अन्य हितधारकों की भागीदारी रहेगी।

35.22 लाख लोगों की आजीविका से जुड़ा क्षेत्र

हथकरघा क्षेत्र आज भी देश के बड़े ग्रामीण रोजगार क्षेत्रों में शामिल है। सरकार के अनुसार करीब 35.22 लाख बुनकर और संबद्ध कामगार इस क्षेत्र से जुड़े हैं। इनमें 72 प्रतिशत से अधिक महिलाएं हैं। इसका मतलब है कि हथकरघा केवल पारंपरिक कला को बचाए रखने का माध्यम नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में ग्रामीण महिलाओं के लिए आय और आर्थिक भागीदारी का जरिया भी है।

भारत के अलग-अलग हिस्सों में हथकरघा की अपनी अलग पहचान है। असम का मूगा और गामोसा, उत्तर प्रदेश की बनारसी बुनाई, पश्चिम बंगाल की जामदानी और तांत, तमिलनाडु की कांजीवरम, ओडिशा की इकत, आंध्र प्रदेश की कलमकारी और राजस्थान की पारंपरिक बुनाइयां भारतीय हथकरघा की विविधता को दर्शाती हैं।

एक साड़ी में कई दिनों की मेहनत

मशीन से तैयार कपड़ों के दौर में भी हथकरघा उत्पादों की अपनी अलग पहचान बनी हुई है। एक बुनकर के लिए कपड़ा तैयार करना केवल धागों को जोड़ने की प्रक्रिया नहीं है। इसमें धागे का चयन, रंगाई, डिजाइन तैयार करना, ताना-बाना लगाना और करघे पर बुनाई जैसे कई चरण शामिल होते हैं।

कई पारंपरिक बुनाइयों में डिजाइन और मोटिफ पीढ़ियों से बुनकर परिवारों में चले आ रहे हैं। यही वजह है कि हथकरघा उत्पादों में एक जैसी मशीन से बनी वस्तुओं की तुलना में अलग-अलग बुनकरों की व्यक्तिगत कला और स्थानीय पहचान भी दिखाई देती है।

महिलाओं की बड़ी भागीदारी

हथकरघा क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। बुनाई के अलावा धागा तैयार करने, रंगाई, डिजाइन, कढ़ाई और अन्य सहायक गतिविधियों में बड़ी संख्या में महिलाएं काम करती हैं।

सरकारी आंकड़ों में 72 प्रतिशत से अधिक महिलाओं की भागीदारी का उल्लेख इस क्षेत्र के सामाजिक महत्व को रेखांकित करता है। ग्रामीण और छोटे कस्बों में हथकरघा परिवार की आय का महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है।

बाजार बदल रहा, करघे की चुनौती भी बढ़ी

हथकरघा क्षेत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में मशीन से बने सस्ते कपड़ों से प्रतिस्पर्धा, कच्चे माल की कीमत, बाजार तक सीधी पहुंच और बुनकरों की आय से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। बदलती पसंद और तेज फैशन के दौर में पारंपरिक बुनकरों के सामने अपने उत्पादों को नए बाजार और नई पीढ़ी की पसंद के अनुरूप ढालने की चुनौती भी है।

हालांकि पिछले कुछ वर्षों में हथकरघा उत्पादों के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन बिक्री, डिजाइन विकास और ब्रांडिंग के रास्ते भी खुले हैं। सरकारी पहल का जोर बाजार पहुंच बढ़ाने और बुनकरों की आय में सुधार पर भी है।

बदलते बाजार के बीच इस विरासत को बचाए रखना तभी संभव होगा, जब पारंपरिक हुनर को सम्मान मिले।

‘इंडिया हैंडलूम’ से पहचान की कोशिश

हथकरघा उत्पादों की पहचान और बाजार में उनकी विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए ‘इंडिया हैंडलूम’ ब्रांड की शुरुआत 7 अगस्त 2015 को की गई थी। इसका उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण हथकरघा उत्पादों की ब्रांडिंग और प्रचार करना है। आधिकारिक दिशा-निर्देशों के अनुसार इसके तहत 100 प्रतिशत हथकरघा उत्पादों, प्राकृतिक रेशों, रंगों और निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर जोर दिया जाता है।

इसके साथ ही जीआई पंजीकरण जैसी व्यवस्थाओं के जरिए क्षेत्रीय और पारंपरिक बुनाइयों की पहचान को संरक्षित करने की कोशिश की जा रही है। जीआई टैग किसी खास क्षेत्र से जुड़े उत्पाद की विशिष्ट पहचान को कानूनी संरक्षण देने में मदद करता है।

पुरस्कारों से हुनर को सम्मान

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर बुनकरों और इस क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करने वाले लोगों को सम्मानित करने की परंपरा है। संत कबीर हथकरघा पुरस्कार और राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार बुनकरों, डिजाइनरों, संगठनों और हथकरघा उत्पादों के विपणन से जुड़े लोगों की उपलब्धियों को पहचान देते हैं।

सरकारी विवरण के अनुसार पुरस्कारों का उद्देश्य असाधारण बुनाई कौशल, डिजाइन, विपणन और हथकरघा परंपरा के संरक्षण में योगदान को पहचान देना है। युवा बुनकरों को प्रोत्साहित करना भी इसका एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है।

दिल्ली में ‘वीव्स ऑफ इंडिया’ का आयोजन

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शनियां, बिक्री मेले, कार्यशालाएं और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। दिल्ली में ‘वीव्स ऑफ इंडिया’ उत्सव का आयोजन सेंट्रल कॉटेज इंडस्ट्रीज एम्पोरियम में किया गया, जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों के हथकरघा उत्पादों को प्रदर्शित किया गया। यह आयोजन 24 जुलाई से 7 अगस्त तक चला।

करघे से डिजिटल बाजार तक

हथकरघा की परंपरा अब केवल गांवों और स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं रह गई है। ई-कॉमर्स, सोशल मीडिया और डिजिटल मार्केटिंग ने बुनकरों को देश के दूसरे हिस्सों और अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों तक पहुंचने का अवसर दिया है।

डिजाइनर भी पारंपरिक बुनाइयों को आधुनिक परिधानों, घरेलू सजावट और लाइफस्टाइल उत्पादों के साथ जोड़ रहे हैं। इससे युवा उपभोक्ताओं के बीच हथकरघा को नए रूप में पेश करने की कोशिश हो रही है।

विरासत बचाने के साथ आय बढ़ाना बड़ी चुनौती

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारतीय हथकरघा के सामने अब दोहरी चुनौती है—एक ओर सदियों पुरानी बुनाई तकनीकों और स्थानीय डिजाइनों को बचाना, दूसरी ओर बुनकरों के लिए इस पेशे को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना।

केवल पारंपरिक कला के संरक्षण से काम नहीं चलेगा। बुनकरों को उचित कीमत, बाजार की सीधी पहुंच, बेहतर डिजाइन, तकनीकी प्रशिक्षण, कच्चे माल की उपलब्धता और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भी लगातार काम की जरूरत है।

धागे में संस्कृति, करघे पर अर्थव्यवस्था

भारत का हथकरघा क्षेत्र देश की सांस्कृतिक विविधता को कपड़े पर उकेरता है। अलग-अलग राज्यों की बुनाई में वहां की भाषा, लोककला, प्रकृति, परंपरा और इतिहास की झलक मिलती है। इसलिए हथकरघा को केवल कपड़ा उद्योग मानना इसके व्यापक महत्व को सीमित करना होगा।

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस इस बात की याद दिलाता है कि एक साड़ी, गमछे, शॉल या कपड़े के पीछे केवल धागे और रंग नहीं होते, बल्कि किसी बुनकर परिवार का कौशल, समय और पीढ़ियों से चली आ रही विरासत भी जुड़ी होती है। बदलते बाजार के बीच इस विरासत को बचाए रखना तभी संभव होगा, जब पारंपरिक हुनर को सम्मान के साथ-साथ स्थायी बाजार और बेहतर आमदनी भी मिले।

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