कविता क्रांति नहीं, बदलाव का माध्यम है: स्पंदन सम्मान समारोह में गूंजे साहित्य के सरोकार

साहित्य, संवेदना और सामाजिक सरोकारों पर गंभीर मंथन “कविता क्रांति नहीं, बदलाव का माध्यम है” जितेंद्र श्रीवास्तव स्त्री-अस्मिता, लोकतंत्र और समय-बोध पर गूंजे विचार

Mp news: भोपाल में संचालालय पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय तथा स्पंदन संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘स्पंदन सम्मान समारोह’ का साहित्यिक सत्र संवेदना, समकालीन चिंतन और सामाजिक सरोकारों से परिपूर्ण रहा। सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ लेखिका चंद्रकांता ने की, जबकि मंच संचालन सुमन सिंह ने किया। कार्यक्रम में मानवता, स्त्री-चेतना, लोकतांत्रिक मूल्यों और साहित्य की जिम्मेदारी जैसे विषयों पर गंभीर विमर्श हुआ।

 

मानवता और साहित्य का संबंध

डॉ. विशाल पाण्डेय ने कहा कि मानवता की सेवा ही उनके साहित्य का मूल उद्देश्य है और साहित्य तभी सार्थक है जब वह मनुष्यता के साथ खड़ा रहे। उन्होंने सम्मान को अपनी साहित्यिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बताया। कवि विवेक चतुर्वेदी ने अपनी कृति “स्त्रियां घर लौटती हैं” से कविताएं पढ़ीं, जिनमें स्त्री जीवन की संवेदनाएं और आत्मसम्मान की मुखर अभिव्यक्ति दिखाई दी।

 

स्त्री-अस्मिता और विद्रोह की परंपरा

सुभाष राय ने ऐतिहासिक कवयित्रियों अक्क महादेवी और आण्डाल का उल्लेख करते हुए स्त्री-अस्मिता और विद्रोह की परंपरा को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि इतिहास में कई कवयित्रियों को सीमित दायरे में प्रस्तुत किया गया, जबकि वे परिवर्तन की प्रतीक थीं। अपनी कृतियों “दिगम्बर विद्रोहिणी अक्क महेश्वरी” और “आत्मसम्भवा आण्डाल” का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज की महिलाओं को अपनी ज्योति स्वयं प्रज्वलित करनी होगी।

 

लोकतांत्रिक चेतना और समय-बोध

विमलेश त्रिपाठी ने अपने संग्रह “आदमी की बात” से कई कविताओं का पाठ किया, जिनमें लोकतांत्रिक चेतना और समकालीन विडंबनाओं का प्रभावी चित्रण था। मनीष वैद्य को उनके कहानी संग्रह “वांग छी” के लिए ‘स्पंदन कृति सम्मान’ से सम्मानित किया गया। उन्होंने “घड़ी साज” के अंश पढ़ते हुए कहा कि समय के बदलने से दुनिया बदलती है, लेकिन लोग समय का मूल्य समझने में चूक जाते हैं।

 

आत्मालोचन और साहित्य की जिम्मेदारी

कवि जितेंद्र श्रीवास्तव ने रचनाकारों के लिए आत्मालोचन को अनिवार्य बताया और कहा कि अपनी रचनाओं को आलोचनात्मक दृष्टि से देखना आवश्यक है। उन्होंने कहा, “कविता क्रांति नहीं, बल्कि बदलाव लाने का माध्यम है।” वहीं ‘स्पंदन कृति सम्मान 2023’ से सम्मानित विवेक मिश्र ने अपने उपन्यास “जन्म-जन्मांतर” का अंश पढ़ते हुए कहा कि जीवन निरंतर सीखने की प्रक्रिया है और श्रेष्ठ बनने से पहले मनुष्य बनना जरूरी है। अध्यक्षीय संबोधन में चंद्रकांता जी ने साहित्य की सामाजिक जिम्मेदारी पर बल देते हुए कहा कि आज का साहित्य बोरिंग नहीं, बल्कि समय के जटिल प्रश्नों से जूझ रहा है। यह सत्र साहित्य, संवेदना और सामाजिक चेतना का जीवंत उदाहरण बनकर उभरा।

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