अब बिखरते जेन-जी को संभालने वाले गुरु चाहिए

गुरु पूर्णिमा 2026 विशेष


जेन-जी आंदोलन की तपन अभी पूरी तरह खत्म भी नहीं हुई है और गुरु पूर्णिमा का पर्व आन पड़ा है। इस आंदोलन ने समाज के रूप में हमें यह सबक दिया है कि वर्तमान गुरुओं को अब बिखरते जेन-जी को संभालने के लिए अपने नए सूत्र और संकल्प साधने होंगे। इस आंदोलन में जिस तरह की अश्लीलता और युवाओं का बिखराव सामने आया, उसे देख लगता है कि अब गुरुओं को अपनी भूमिका और बड़ी करनी होगी।

मुझे सद्गुरु कबीर याद आ रहे हैं। उन्होंने कहा था –

“यह तन विष की वेलरी , गुरु अमृत की खान ।
सीस दिये यदि गुरु मिले तो भी सस्ता जान।।”

कितनी गहरी बात कह गये कबीर। यह बात वही कह सकता है , जिसने सद्गुरु की सच्ची महिमा को जान लिया हो। गुरु यदि शिष्य से उसका शीष मांग रहे हैं ,तो लाभ शिष्य का ही होने वाला है ,वरना उस शीष का गुरु करेंगे क्या ? गुरु द्रोणाचार्य ने तो एकलव्य का अंगूठा मांगा था । अंगूठा दे दिया ,तो एकलव्य इतिहास में अमर हो गया गुरुभक्ति के लिये । वरना कौन पूछता एकलव्य को ? वह सच्चा शिष्य था । द्रोणाचार्य का गुरुत्व कम नहीं हुआ दक्षिणा में अंगूठा मांग लेने से। वे एकलव्य का मन जानते थे । उन्हें भरोसा था कि मांगने पर एकलव्य अपना शीष भी दे देगा। ऐसा भरोसा उन्हें तब अर्जुन के लिये नहीं था। अर्जुन ने द्रोणाचार्य से धनुर्विद्या तो सीखी , किन्तु वह आत्मविद्या नहीं सीखी , जो एकलव्य ने गुरु की प्रतिमा के सामने शस्त्रसंधान करते हुए सीख ली। अर्जुन बहुत अच्छा विद्यार्थी सिद्ध हुआ , किन्तु गुरु द्रोणाचार्य का नहीं, भगवान् कृष्ण का , जहाँ गीता में उसे आत्मज्ञान मिला ,और जीवन के सत्य से सामना भी हुआ । श्रीमद्भगवद्गीता गुरु और शिष्य के बीच संवाद ही तो है ।एक तरफ प्रणिपात है , परिप्रश्न है , सेवा है । दूसरी तरफ अनुग्रह है , अनुकम्पा है , कृपा है ।

गुरु एक सर्वोच्च सत्ता है । इससे ऊपर कुछ भी नहीं । सब
देवता इस सत्ता से बहुत नीचे है । वेदों में जो ब्रह्मणस्पति
या बृहस्पति है ,वही बाद में ब्रह्म है ,और वही कालान्तर में
सद्गुरु है । हमारे सब धार्मिक विश्वास अंतत: गुरुतत्व में ही
जा मिलते है,इसीलिये “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर:”
के स्वरूप में हमें गुरु साक्षात् परब्रह्म की तरह लगने लगते
हैं । तुलसीदास जी को स्मरण कीजिए – “श्रीगुरुचरणसरोज रज निज मन मुकुर सुधारि।” गुरु के चरणकमलों की रज से मन रूपी दर्पण स्वच्छ होता हो , तो कहीं और क्यों जाया जाए। यह अनुभव की चीज है , यह अपने आप पर विश्वास करने की चीज है।इस तत्व पर हमारे यहाँ कभी बहस नहीं हुई, शास्त्रार्थ नहीं हुए । चाहे कोई सी भी कौम हो , किसी ने भी गुरु की महिमा से छेड़-छाड़ नहीं की और न ही तर्क-वितर्क किये ।

वह अभागा है, जिसका अपने जीवन में कोई गुरु नहीं ।
वह और भी बड़ा अभागा है , जिसने अंधे गुरु को पकड़
लिया और दोनों गड्ढे में जा गिरे । गुरु कहलाने वालों की
भीड़ में सच्चे गुरु की पहचान के लिये भी हमें योग्य गुरु
की तलाश है।गुरु होने के लिये यह जरूरी नहीं ,कि वह
स्कूल-काॅलेज में पढ़ाता हो , किसी मठ या आश्रम की
गादी सम्हालता हो , या बड़ा भारी कोचिंग सेंटर चलाता
हो । वह तो सामान्य पढ़ा-लिखा या बिलकुल न पढ़ा हुआ
भी हो सकता है । रामकृष्ण परमहंस पढ़े-लिखे नहीं थे,
किन्तु उनके आभामंडल में सद्गुरु का उच्चतम प्रकाश था।हमारा प्राचीन इतिहास ऐसे सद्गुरुओं का ही इतिहास है ,
जो जंगल से बाहर नहीं गये , किन्तु उन्होंने राजाओं के
गुण-धर्म बदले , धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के जीवन-स्तम्भ रचे ,और समाज की मूलभूत व्यवस्थाओं का ऐसा ढाँचा बना
कर दिया , जिसकी आत्मा में सत्य की सुगंध है और वह पवित्रता है जो मानव -जीवन को शुद्ध आचरण में ढालती है ।

सच्चा गुरु हमेशा ही सच्चे शिष्य की तलाश में रहता है ।
सच्चे गुरु की जायदाद असीमित होती है , वह भौतिक
सम्पदाओं के साथ तौली नहीं जा सकती । वह कभी भी
संग्रह में रुचि नहीं रखता।अपना सब कुछ ही दे डालना
चाहता है । किन्तु सच्चा शिष्य न मिले , तो उसकी पोटली
बंद पड़ी रह जाती है । फिर उसे खोलने वाला कोई नहीं
मिलता । इसलिये जरूरी है कि हम सुयोग्य शिष्य होने के
लिये निरन्तर प्रयत्नशील रहें । अच्छा शिष्य होना बहुत
आसान तो नहीं , किन्तु बहुत कठिन भी नहीं । थोड़ी सी
विनयशीलता , थोड़ी जिज्ञासा वृत्ति , थोड़ा सदाचार और
थोड़ी समर्पण बुद्धि के साथ अनुशासन में रहने का स्वभाव
आपके भीतर है , तो गुरु आपके बहुत पास तक स्वयं ही
दौड़े चले आयेंगे। फिर आपको कुछ नहीं करना है । सब
काम गुरु के स्पर्श मात्र से होगा। गुरु किताब खोल कर
नहीं पढ़ायेंगे , न परीक्षा की झंझट में डालेंगे । वह एक ही
काम करेंगे , आपके अहंकार को चूर-चूर कर डालेंगे , कर्म
में झोंक देंगे , दिखा देगें कि भगवान् कैसा है , और फिर चौबीसों घंटे पल-पल आपके चित्त की पहरेदारी करेंगे ।

सबसे पहले हमें सच्चे गुरु की पहचान होनी चाहिए। विधि
ने इसके लिये हमारा रास्ता कितना सरल बना दिया। जन्म
लेते ही हमारा सामना प्रथम गुरु से होता है , और वह है –
“माँ “। माँ को जानने के लिये यत्न नहीं करना पड़ता। वह हमारे अन्नमय, प्राणमय , मनोमय कोशों को रचती है , इन्हें
अपनी ममता से सींचती है , और हममें एकाकार हो जाती
है । माँ ही अपने गर्भ में से बाहर ला कर हमें यह सलौना
संसार दिखाती है , इस संसार के दु:ख और सुख , उतार-
चढ़ाव से परिचित करवाती है । शैशव का यह विद्याभ्यास
अंतिम साँस तक काम आता है । सच्चा गुरु “माँ” की तरह
ही होता है । हम उसी की आँखों से संसार को देखने लगते
हैं , वह हममें एकाकार हो जाता है।वह शरीर में न हो , तब
भी शिष्य में उसकी सम्पूर्ण उपस्थिति होती है। शिष्य का उठना-बैठना , सोचना-समझना सब गुरु का होता है। तब
अनिष्ट की सम्भावना नहीं होती , अनृत को मुँह मारने का
अवसर नहीं मिलता।प्रेम के एक ही झूले में गुरु-शिष्य झूल
रहे होते हैं ।

हमारे चारों तरफ अज्ञान का अंधेरा फैला हुआ है , और
हम अपने ज्ञानवान् होने की घोषणा कर रहे हैं।हम जड़ता
के शिकार हैं , और स्वयं को चैतन्य मान रहे हैं । अंधे अंधों
को ठेल रहे हैं , और फूले नहीं समा रहे हैं । सुख-सुविधा में
रमे हुए लोगों को यह शंका भी नहीं कि आपदा माथे पर है ,
और जल्दी से जल्दी कोई जतन करना होगा । हरेक को
रास्ता बताने वाला चाहिए , और रास्ता बताने वाले गुरुजनों
की सुध लेने को कोई तैयार नहीं । बच्चे सीख रहे हैं एक-
दूसरे के कंधे पर पाँव रख कर आगे निकल जाने की कला । धैर्य , शान्ति , साहचर्य , करुणा और प्रेम की शब्दावलियाँ
खो चुकी हैं , और हमारे स्कूली बच्चे मूल्यहीन प्रगति के बनाये हुए चक्के पर बैठा कर वहाँ पहुँचा दिये जा रहे हैं , जहाँ से फिर एक उबाऊ यात्रा शुरू होगी । गुरु के लिये कोई तड़फ नहीं , गुरु के लिये कोई बेचैनी नहीं ।

आपका कोई गुरु नहीं ,तो आपका जीवन गौरवशाली कैसे
हो ? आपका कोई गुरु नहीं , तो आप आजीवन अंधेरे में
भटकते रहने के लिये अभिशप्त हैं ।आपका कोई गुरु नहीं ,
तो जिस दिन बड़ा भारी संकट आपके घर पर दस्तक देगा ,
आप अकेले होंगे , निहत्थे होंगे , असहाय होंगे और बिखर
जायेंगे । गुरु के अलावा कोई आपकी नाव नहीं खे पायेगा।
समर्थ गुरु की उंगली एक बार थाम लीजिए , फिर न छोड़िए।
वह गुरुग्रंथ , गीता , कुरान और बाइबिल के रूप में भी मिल
सकता है । वह शंकराचार्य, दयानंद , विवेकानंद , या आचार्य
श्रीराम शर्मा में भी मिल सकता है । वह आपके माता , पिता,
भाई , बहन , सच्चे मित्र सहित टूटे-फूटे ओटले पर बैठे फकीर में भी मिल सकता है ,जिसे देख कर आपके मन का मैल धुल जाए , श्रद्धा उत्पन्न हो , मन में संतोष और प्रेम का बीज अंकुरित हो , जिसके अनुशासन में रहने का संकल्प जाग उठता हो और आपको जिसके पीछे चलते हुए अपना पथ प्रशस्त दिखाई देता हो।

श्री अरविन्द कहते हैं – “केवल दो ही शक्तियाँ हैं जो मिल कर उस महान् कार्य को पूरा कर सकती हैं जो हमारे प्रयास का उद्देश्य है – एक तो है अचल अभीप्सा जो नीचे से पुकारती है और दूसरी है वह भागवत अनुकम्पा जो ऊपर से उत्तर देती है।” ये दो शक्तियाँ ही गुरु और शिष्य हैं । ये दोनों सचमुच मिल जाएँ , तो समाज के उचित रूपान्तर को कोई नहीं रोक सकता।

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उपरोक्त आलेख वरिष्ठ पत्रकार श्री ईश्वर शर्मा का है। आप एक सुप्रतिष्ठित मोटिवेशनल स्पीकर तो हैं ही, इसके अतिरिक्त आप संस्कृति एवं लोक कला पर केंद्रित अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर व्याख्यान दे चुके हैं

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