क्या सच में “भारत का बेटा” थे Ayatollah Ruhollah Khomeini? बाराबंकी से ईरान तक की ऐतिहासिक कड़ी
बाराबंकी के किंतूर से जुड़ी बताई जाती हैं खुमैनी की पुश्तैनी जड़ें। 1830 के दशक में दादा सैयद अहमद मूसवी के ईरान बसने का मिलता है उल्लेख। 1978 में शाह ने ‘भारतीय मूल’ का मुद्दा उठाया, लेकिन बढ़ गई खुमैनी की लोकप्रियता।

Iran crisis: ईरान की 1979 की इस्लामी क्रांति के जनक और पहले सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी को लेकर अक्सर यह दावा किया जाता है कि उनका पुश्तैनी नाता उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले से था। उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोत इस बात की पुष्टि करते हैं कि खुमैनी के दादा सैयद अहमद मूसवी (हिंदी स्रोतों में: सैयद अहमद मूसवी हिंदी/हिंदी) का संबंध बाराबंकी के किंतूर गांव से जोड़ा जाता है, जहां आज भी ‘सैयदवाड़ा’ नाम से एक इलाका और काज़मी/मूसवी सैयद परिवारों की मौजूदगी बताई जाती है।
बाराबंकी से खुमैन तक: पारिवारिक प्रवास की कहानी
19वीं सदी के शुरुआती दशकों में सैयद अहमद मूसवी के अवध क्षेत्र से निकलकर ईरान जाने का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि वे 1830 के आसपास यात्रा पर निकले और अंततः ईरान के खुमैन (Khomein) में बस गए। यहीं से परिवार ने “खुमैनी” उपनाम अपनाया, जो उनके नए निवास-स्थान से जुड़ा था।खुमैनी के पिता सैयद मुस्तफा मूसवी का जन्म ईरान में हुआ, और आगे चलकर 1902 में रुहोल्लाह खुमैनी का जन्म भी खुमैन में ही हुआ। इस तरह उनकी जड़ें भारतीय उपमहाद्वीप से जुड़ती हैं, जबकि उनका जन्म और राजनीतिक जीवन पूरी तरह ईरान में विकसित हुआ।
1978 का ‘भारतीय मूल’ वाला विवाद
1978–79 में जब ईरान में शाह Mohammad Reza Pahlavi के खिलाफ आंदोलन तेज हुआ, तब सरकारी प्रचार तंत्र ने खुमैनी को “विदेशी/भारतीय मूल का मुल्ला” बताकर उनकी वैधता पर सवाल उठाने की कोशिश की। लेकिन यह दांव उल्टा पड़ा ईरानी समाज में उनकी धार्मिक प्रतिष्ठा और क्रांतिकारी छवि इतनी मजबूत थी कि इस प्रचार से उनकी लोकप्रियता और बढ़ गई। 1979 में शाह का शासन गिरा और इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई, जिसके पहले सर्वोच्च नेता खुमैनी बने।
किंतूर में आज भी चर्चा क्यों?
बाराबंकी के किंतूर गांव में स्थानीय स्तर पर यह मान्यता प्रचलित है कि खुमैनी के पूर्वज यहीं से थे। ‘सैयदवाड़ा’ क्षेत्र और काज़मी/मूसवी परिवारों का हवाला दिया जाता है। हालांकि, यह संबंध वंशावली और मौखिक परंपराओं पर आधारित है; औपनिवेशिक दौर के कुछ दस्तावेज़ों और ईरानी जीवनी-स्रोतों में भी हिंदुस्तानी मूल का उल्लेख मिलता है, पर विस्तृत अभिलेख सीमित हैं।
निष्कर्ष
वंशगत संबंध: खुमैनी के दादा का संबंध बाराबंकी (किंतूर) से जोड़ा जाता है। जन्म और राजनीतिक पहचान: खुमैनी का जन्म, शिक्षा और राजनीतिक जीवन ईरान में हुआ। 1978 का प्रचार: शाह शासन द्वारा “भारतीय मूल” का मुद्दा उठाया गया, जो राजनीतिक रूप से कारगर नहीं हुआ। इतिहास यह बताता है कि खुमैनी की वैचारिक और राजनीतिक पहचान ईरान में गढ़ी गई, लेकिन उनकी पारिवारिक जड़ों की एक कड़ी उत्तर प्रदेश के बाराबंकी से जुड़ती है, इसी वजह से समय-समय पर “भारत का बेटा” वाला दावा चर्चा में आता रहता है।



