आवारा कुत्तों के मुद्दे पर राष्ट्रीय मंथन: समाधान है विज्ञान, जवाबदेही और समन्वय

Press Club of India में नीति और समाधान पर गंभीर चर्चा एबीसी कार्यक्रम की फंडिंग और पारदर्शिता पर सवाल वैज्ञानिक और मानवीय दृष्टिकोण अपनाने पर जोर

नई दिल्ली में Press Club of India में आवारा कुत्तों के प्रबंधन को लेकर सांसदों, कानूनी विशेषज्ञों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों की एक अहम बैठक हुई। चर्चा में माना गया कि हालिया घटनाओं और कानूनी बहसों के बाद समाज में दो धड़े बन गए हैं एक पक्ष सामुदायिक कुत्तों की देखभाल की बात करता है, तो दूसरा उन्हें स्थायी रूप से हटाने की मांग कर रहा है। इस ध्रुवीकरण के कारण कई जगहों पर हिंसा और पशु प्रेमियों के साथ उत्पीड़न की घटनाएं भी सामने आई हैं। पैनल ने साफ कहा कि यह मुद्दा भावनाओं के टकराव से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और प्रशासनिक दृष्टिकोण से सुलझाया जाना चाहिए।

 

एबीसी कार्यक्रम पर उठे सवाल

बैठक में सबसे बड़ी चिंता पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) कार्यक्रम को लेकर जताई गई। पैनल का मानना था कि इस योजना को पर्याप्त फंड नहीं मिल रहा और जहां मिल रहा है, वहां पारदर्शिता और निगरानी की कमी है। बड़े पैमाने पर स्थायी आश्रय स्थल बनाने के विचार को भी अव्यावहारिक और अमानवीय बताया गया। वक्ताओं ने कहा कि वैज्ञानिक नसबंदी, नियमित टीकाकरण और डेटा आधारित निगरानी ही स्थायी समाधान दे सकते हैं।

 

रेणुका चौधरी और प्रियंका चतुर्वेदी की राय

कांग्रेस सांसद Renuka Chowdhury ने कहा कि पशुओं के प्रति क्रूरता समाज में व्यापक हिंसा को जन्म दे सकती है। उन्होंने कानूनों को और सख्त बनाने तथा राज्यों को पर्याप्त धन आवंटित करने की मांग की। वहीं Priyanka Chaturvedi ने माना कि इंसान और कुत्तों के बीच संघर्ष वास्तविक है, लेकिन इसका समाधान तकनीक और समन्वय से निकाला जाना चाहिए। उन्होंने एआई आधारित मॉनिटरिंग और शिकायत प्रणाली को मजबूत करने का सुझाव दिया।

 

प्रशासनिक जवाबदेही और राजनीतिक इच्छाशक्ति

एनसीपी सांसद Anish Gawande ने नगरपालिका प्रशासन की खामियों को उजागर करते हुए कहा कि एबीसी कार्यक्रम का सही क्रियान्वयन ही कानूनी और तार्किक रास्ता है। सामाजिक कार्यकर्ता Anjali Gopalan ने उदाहरण देते हुए कहा कि Netherlands जैसे देशों में सख्त प्रजनन नियंत्रण और गोद लेने के अभियान से सकारात्मक परिणाम मिले हैं, लेकिन इसके लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति जरूरी है।

 

कानूनी और सामाजिक दृष्टिकोण

अधिवक्ता Paulomi Pavini Shukla ने पशु कल्याण को बाल कल्याण से जोड़ते हुए कहा कि संवेदनशील समाज ही सुरक्षित समाज बनाता है। उन्होंने चेतावनी दी कि बड़े आश्रय स्थलों से स्वास्थ्य संकट पैदा हो सकते हैं। वहीं पीपल फार्म के Robin Singh ने ग्रिड-आधारित नसबंदी मॉडल को प्रभावी बताया, जिससे आक्रामकता घटती है और आबादी नियंत्रित होती है।

 

क्या निकला निष्कर्ष?

बैठक का स्पष्ट संदेश था कि यह बहस जानवर बनाम इंसान की नहीं है, बल्कि बेहतर शासन और समन्वित नीति की है। पर्याप्त फंडिंग, पारदर्शी डैशबोर्ड, केंद्र-राज्य तालमेल, अवैध प्रजनन पर रोक और जन-जागरूकता अभियान को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई गई। पैनल ने कहा कि समाधान मौजूद हैं, बस उन्हें ईमानदारी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ लागू करने की आवश्यकता है।

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