औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति के बिना भारत को समझना संभव नहीं : पद्मश्री डॉ कपिल तिवारी

शास्त्र और लोक दोनों मिलकर भारतीय सभ्यता की आत्मा का करते हैं निर्माण

नई दिल्ली। भारत को उसकी अपनी दृष्टि से समझने की जरूरत है। जब तक हम औपनिवेशिक मानसिकता से पूरी तरह मुक्त नहीं होंगे, तब तक न अपनी परंपरा को सही ढंग से समझ पाएंगे और न ही अपने लोक एवं शास्त्र के वास्तविक स्वरूप को पहचान सकेंगे। यह बात लोक समाजसेवी और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित डॉ कपिल तिवारी ने एक व्याख्यान में कही।

डॉ. तिवारी ने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा केवल शास्त्रों तक सीमित नहीं है। लोकजीवन, लोककलाएं, लोकनाट्य और लोकाचार भी भारतीय ज्ञान की समान रूप से समृद्ध परंपरा का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि शास्त्र और लोक दोनों मिलकर भारतीय सभ्यता की आत्मा का निर्माण करते हैं।

उन्होंने कहा कि भारतीय लोकनाट्य परंपराएं केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक स्मृति और जीवन-दृष्टि की संवाहक हैं। नौटंकी, माच, स्वांग, गम्मत, नाचा, खयाल, रासलीला और रामलीला जैसी परंपराओं ने सदियों तक समाज को जोड़े रखा है। इनकी वाचिक परंपरा आज उपेक्षा के कारण संकट में है और इसे संरक्षित करने की आवश्यकता है।

डॉ. तिवारी ने भारतीय और पाश्चात्य रंगदृष्टि की तुलना करते हुए कहा कि पश्चिमी परंपरा में जीवन को त्रासदी, संघर्ष और अपराधबोध से जोड़कर देखा गया, जबकि भारतीय चिंतन जीवन को उत्सव, आनंद और सौभाग्य के रूप में स्वीकार करता है। यही दृष्टि भारतीय लोककला, संगीत, नृत्य और रंगमंच में भी दिखाई देती है।

उन्होंने कहा कि भारत की लोक परंपराओं में कृषि, ऋतु, अन्न, पर्व और सामाजिक जीवन का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। नए अन्न के स्वागत से जुड़े लोकपर्व, लोकगीत और नृत्य भारतीय संस्कृति की जीवनमूलक चेतना के प्रतीक हैं।

फ्रांसीसी क्रांति का उदाहरण देकर समझाया औपनिवेशिक मानसिकता

अपने व्याख्यान के समापन में डॉ. तिवारी ने फ्रांसीसी क्रांति का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जेल से मुक्त किए गए कई कैदी कुछ ही घंटों बाद वापस लौट आए, क्योंकि वर्षों की कैद के बाद उन्हें आजादी का उजाला असहज लगने लगा था। उन्होंने कहा कि यही स्थिति औपनिवेशिक मानसिकता की भी है। राजनीतिक स्वतंत्रता मिलने के बावजूद मानसिक गुलामी आज भी समाज के एक बड़े वर्ग में बनी हुई है। जब तक इस मानसिकता से मुक्ति नहीं मिलेगी, तब तक भारत अपनी परंपरा, शास्त्र और लोक को उसकी वास्तविक दृष्टि से नहीं देख पाएगा।

प्रमुख बातें

भारत को उसकी अपनी सांस्कृतिक दृष्टि से समझने की आवश्यकता।
शास्त्र और लोक भारतीय ज्ञान परंपरा के दो समान रूप से महत्वपूर्ण आधार।
लोकनाट्य और लोककलाओं की वाचिक परंपरा संरक्षण की मांग कर रही है।
भारतीय जीवन-दृष्टि उत्सव, आनंद और समरसता पर आधारित।
औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति के बिना सांस्कृतिक आत्मबोध संभव नहीं।

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