खेतों में जीवंत हुई मरुधरा की अनूठी परंपरा ‘लाह’

रस्म नहीं, बल्कि प्रकृति, खेती और समाज के बीच गहरे संबंधों का प्रतीक

जयपुर। राजस्थान की मरुधरा में मानसून की दस्तक के साथ एक बार फिर सदियों पुरानी लोक परंपरा ‘लाह’ खेतों में जीवंत हो उठी है। बारिश के बाद जब खेत हरियाली से भर जाते हैं, तब ग्रामीण महिलाएं और पुरुष पारंपरिक वेशभूषा में खेतों पर पहुंचकर गीत, नृत्य और सामूहिक उत्सव के माध्यम से अच्छी फसल और समृद्धि की कामना करते हैं। यह परंपरा कृषि, लोकसंस्कृति और सामाजिक एकता का अनूठा संगम मानी जाती है।

‘लाह’ केवल एक कृषि अनुष्ठान नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन की सांस्कृतिक पहचान भी है। इस अवसर पर महिलाएं पारंपरिक लोकगीत गाती हैं, जबकि किसान परिवार सामूहिक रूप से खेतों में पूजा-अर्चना कर प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। मान्यता है कि इससे फसल की अच्छी पैदावार होती है और गांव में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

राजस्थान के कई ग्रामीण इलाकों में यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाई जा रही है। आधुनिक खेती और बदलती जीवनशैली के बावजूद ग्रामीण समुदाय इसे अपनी सांस्कृतिक विरासत के रूप में संजोए हुए है। स्थानीय लोग मानते हैं कि ‘लाह’ केवल एक रस्म नहीं, बल्कि प्रकृति, खेती और समाज के बीच गहरे संबंधों का प्रतीक है।

मुख्य बातें

– मानसून के दौरान खेतों में मनाई जाती है ‘लाह’ की परंपरा।
– अच्छी फसल और समृद्धि की कामना के लिए किया जाता है सामूहिक आयोजन।
– लोकगीत, पारंपरिक नृत्य और पूजा-अर्चना इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं।
– राजस्थान की समृद्ध लोक-सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है ‘लाह’।

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