बंगाल में रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग से सियासी भूचाल, क्या बदलने वाला है सत्ता का खेल?
पहले चरण में रिकॉर्ड 91.78% मतदान ने बंगाल की सियासत गरमा दी है राजनीतिक दल इसे अपने-अपने पक्ष में बड़ा संकेत बता रहे हैं अब सवाल है, क्या यह सत्ता बदलाव की आहट है या सिर्फ बढ़ा हुआ उत्साह

Bengal elections: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार ऐसा नजारा देखने को मिला है, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। पहले चरण की वोटिंग में रिकॉर्ड 91.78% मतदान दर्ज हुआ है, जो पिछले चुनावों से काफी ज्यादा है। इसी आंकड़े ने अब सियासी हलचल तेज कर दी है, क्या यह बदलाव की आहट है या सिर्फ चुनावी उत्साह का असर? पहले चरण में राज्य के 16 जिलों की 152 सीटों पर वोटिंग हुई और आंकड़े सामने आते ही राजनीतिक गलियारों में बहस तेज हो गई है कि आखिर इतनी भारी वोटिंग के पीछे असली वजह क्या है।
रिकॉर्ड वोटिंग ने बढ़ाई सियासी धड़कनें
पश्चिम बंगाल में जहां 2021 में करीब 81.56% मतदान हुआ था, वहीं इस बार यह आंकड़ा 91.78% तक पहुंच गया। करीब 9% की यह बढ़ोतरी कई तरह के राजनीतिक मायने निकाले जाने लगे हैं। टीएमसी और बीजेपी दोनों ही इस बढ़े हुए मतदान को अपने-अपने पक्ष में बता रही हैं और जीत का दावा कर रही हैं।
Bengal elections: क्या सत्ता विरोधी लहर का संकेत है?
चुनावी विश्लेषण में अक्सर माना जाता है कि जब वोटिंग प्रतिशत बढ़ता है, तो यह सत्ता विरोधी लहर का संकेत हो सकता है। यानी लोग बदलाव के लिए ज्यादा संख्या में वोटिंग करते हैं।लेकिन बंगाल के मामले में तस्वीर इतनी सीधी नहीं है। विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ वोटिंग बढ़ने से किसी भी नतीजे का साफ अनुमान लगाना आसान नहीं है।
Bengal elections: SIR और वोटर लिस्ट बदलाव बना बड़ा मुद्दा
इस बार चुनाव से पहले वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर बदलाव हुए, जिसे लेकर राजनीतिक बहस भी तेज रही। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत करीब 91 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए। बताया गया कि इनमें कई मृतक, पलायन कर चुके या दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके लोग शामिल थे। हालांकि इस प्रक्रिया को लेकर सवाल भी उठे, क्योंकि लाखों नामों में से बहुत कम लोगों को ही वापस वोटिंग अधिकार मिल पाया।
क्या इतिहास दोहराएगा अपना खेल?
बंगाल के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो तस्वीर और भी दिलचस्प हो जाती है। 2011 में जब ममता बनर्जी सत्ता में आई थीं, तब मतदान 84% से ज्यादा था। इसके बाद 2016 और 2021 में वोटिंग थोड़ी घटी, लेकिन सरकार फिर भी टीएमसी के पास ही रही। वहीं 1977 से 2011 तक लेफ्ट का लंबे समय तक शासन रहा, और उस दौर में भी मतदान का उतार-चढ़ाव सरकार बदलने की गारंटी नहीं बना।
असली सवाल क्या है?
Bengal elections: अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार की रिकॉर्ड वोटिंग किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की तरफ इशारा कर रही है या यह सिर्फ जनता की बढ़ी हुई भागीदारी है? फिलहाल टीएमसी और बीजेपी दोनों अपनी-अपनी जीत का दावा कर रही हैं, लेकिन असली तस्वीर आने वाले चरणों की वोटिंग और नतीजों के बाद ही साफ होगी।
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