प्लास्टिक का ‘साइलेंट किलर’: अमेरिकी सेना का नया M111 ग्रेनेड कितना खतरनाक?

प्लास्टिक से बना M111 ग्रेनेड, शॉक वेव से करता है हमला शहरी युद्ध के लिए तैयार, दुश्मन को छिपने का नहीं मिलता मौका बिना टुकड़ों के ज्यादा सुरक्षित, लेकिन अंदरूनी अंगों पर करता है घातक असर

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी सेना ने एक नया और बेहद खतरनाक हथियार पेश किया है। इस हैंड ग्रेनेड का नाम M111 रखा गया है, जो पारंपरिक ग्रेनेड से पूरी तरह अलग है। खास बात ये है कि यह धातु नहीं बल्कि प्लास्टिक से बना है और दुश्मनों को मारने के लिए टुकड़े नहीं, बल्कि शक्तिशाली शॉक वेव्स का इस्तेमाल करता है।

 

क्या है M111 की खासियत?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह ग्रेनेड खासतौर पर शहरी युद्ध (Urban Combat) के लिए तैयार किया गया है। पुराने ग्रेनेड जहां चारों तरफ धातु के टुकड़े फैलाते थे, वहीं M111 सीधे शरीर पर असर डालता है। इसकी शॉक वेव्स शरीर के अंदरूनी अंगों जैसे फेफड़े, कान और आंखों को गंभीर नुकसान पहुंचाती हैं। यही वजह है कि इसे इस्तेमाल करने वाले सैनिकों के लिए भी यह अपेक्षाकृत ज्यादा सुरक्षित माना जा रहा है।

 

कैसे करता है काम?

M111 के फटते ही इसका प्लास्टिक बॉडी वाष्प (भाप) में बदल जाता है, जिससे आसपास कोई खतरनाक टुकड़े नहीं फैलते। इसे किसी कमरे या बंद जगह में फेंकने पर यह दीवारों या फर्नीचर के पीछे छिपे दुश्मनों को भी अपनी चपेट में ले सकता है। यानी दुश्मन के पास बचने की गुंजाइश बहुत कम रह जाती है।

 

पुराने ग्रेनेड से कितना अलग?

अगर पुराने हथियारों की बात करें तो 1968 में वियतनाम युद्ध के दौरान MK3A2 ग्रेनेड इस्तेमाल किया गया था, जिसे बाद में एस्बेस्टस जैसे खतरनाक तत्वों के कारण हटा दिया गया। इसके बाद M67 ग्रेनेड आया, जो धातु के टुकड़ों से हमला करता था। लेकिन इससे अपने ही सैनिकों को भी खतरा रहता था। अब M111 इस कमी को दूर करने की कोशिश करता है, जहां नुकसान दुश्मन तक सीमित रखने पर फोकस है।

 

निष्कर्ष

M111 ग्रेनेड आधुनिक युद्ध की बदलती रणनीति का संकेत है, जहां कम से कम बाहरी नुकसान और ज्यादा सटीक मारक क्षमता पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि, इसकी घातकता को देखते हुए यह साफ है कि आने वाले समय में युद्ध और भी ज्यादा तकनीकी और खतरनाक होने वाले हैं।

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