सभी साहित्यिक विधाएँ एवं कला एक ही मंच पर ‘स्पंदन सम्मान समारोह 2026’

भोपाल में सजा साहित्य और कला का भव्य मंच स्पंदन सम्मान समारोह में रचनाकारों का सम्मान कविता, कथक, आलोचना और रंगमंच का संगम

Bhopal news: देश की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले भोपाल में आयोजित दो दिवसीय ‘स्पंदन सम्मान समारोह 2026’ के द्वितीय दिवस के प्रथम सत्र में स्पंदन सम्मान से नवाजे गए रचनाकारों का वक्तव्य और रचना पाठ आयोजित हुआ। इस सत्र में कविता, कहानी, आलोचना, नृत्य और रंगमंच जैसी विविध विधाओं की प्रतिभाएँ एक ही मंच पर उपस्थित रहीं। कार्यक्रम ने साहित्य और कला के समन्वित स्वरूप को सजीव रूप में प्रस्तुत किया, जहाँ सृजन और संवेदना का अद्भुत संगम देखने को मिला।

 

कथक से कविता तक: अभिव्यक्ति के विविध स्वर

स्पंदन ललित कला सम्मान 2024 से सम्मानित कथक नृत्यांगना रचना यादव ने अपने वक्तव्य में कहा कि कला केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न साथी है, कभी माता-पिता, कभी मित्र तो कभी प्रेम की तरह हमारे साथ रहती है। अपने जीवन का पहला पुरस्कार प्राप्त करने वाली वियोगिनी ठाकुर ने भावपूर्ण कविताओं का पाठ किया। वहीं रूपा सिंह ने अपने कहानी संग्रह ‘दुखां दी कटोरी सुखां दा छल्ला’ से अंश प्रस्तुत कर श्रोताओं को संवेदनाओं की दुनिया में ले गईं।

 

सामाजिक सरोकारों पर तीखा स्वर

‘स्त्रियाँ जब घर लौटती हैं’ काव्य संग्रह के लिए विवेक चतुर्वेदी को स्पंदन कृति सम्मान 2024 से सम्मानित किया गया। उन्होंने अपने काव्य पाठ में देश में फैलती कट्टरता और सामाजिक विवादों पर तीखा व्यंग्य किया। “आम के एक पेड़ की मृत्यु पर”, “ताले रास्ता देखते हैं” और “स्त्रियाँ जब घर लौटती हैं” जैसी कविताओं के माध्यम से उन्होंने समकालीन यथार्थ को मार्मिक अभिव्यक्ति दी।

 

आलोचना, नाटक और साहित्य पत्रकारिता पर विमर्श

लेखिका प्रज्ञा, जो तीन दशकों से अधिक समय से साहित्य साधना में सक्रिय हैं, को आलोचना कर्म के लिए सम्मानित किया गया। उन्होंने कहा कि कला एक वैज्ञानिक यात्रा है, जिसमें निरंतर प्रयोग आवश्यक हैं। चर्चित रंगकर्मी और लोक कलाकार विभा रानी, जिन्हें स्पंदन ललित कला सम्मान 2025 से नवाजा गया, ने शब्दों को “कवच” बताते हुए अभिव्यक्ति की शक्ति पर बल दिया। प्रख्यात प्राध्यापक अरुण होता ने आलोचना की सार्थकता पर विचार रखते हुए कहा कि केवल सार-संक्षेप आलोचना नहीं है, बल्कि रचना की परिस्थितियों और संवेदनाओं को समझना जरूरी है। वहीं जय प्रकाश पाण्डेय ने साहित्य पत्रकारिता पर बोलते हुए भारतेंदु हरिश्चंद्र के योगदान को याद किया और आधुनिक मोबाइल संस्कृति को बड़ी चुनौती बताया।

 

अध्यक्षीय उद्बोधन और समापन

कार्यक्रम के अंत में अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए डॉ. सूर्यबाला ने कहा कि घर में रहना घरेलू होना नहीं है, बल्कि सृजनशीलता हर परिस्थिति में जीवित रहती है। उन्होंने सभी वक्ताओं और साहित्य प्रेमियों को शुभकामनाएँ दीं। पूरे आयोजन का मंच संचालन चित्रा सिंह ने कुशलता के साथ किया, जिससे समारोह गरिमामय और सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न हुआ।

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