12 साल जेल में फांसी का इंतजार, अब बरी होकर मांगा न्याय और मुआवजा
फांसी की गलत सजा झेलने वाले तीन निर्दोष व्यक्तियों ने 12 साल जेल में बिताने के बाद सुप्रीम कोर्ट में मुआवजे की मांग की है। अदालत ने केंद्र से इस पर मार्गदर्शन मांगा है, जिससे न्यायिक जवाबदेही पर बहस तेज हो गई है।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट अब उन तीन याचिकाओं पर सुनवाई करने जा रहा है जिनमें गलत सजा और फांसी की सजा झेलने के बाद निर्दोष साबित हुए लोगों ने मुआवजे की मांग की है। मुख्य याचिकाकर्ता रामकिरत मुनिलाल गौड़, महाराष्ट्र के निवासी हैं, जिन्होंने 12 साल जेल में बिताए, जिनमें से छह वर्ष उन्होंने फांसी की सजा के इंतजार में गुजारे।
त्रुटिपूर्ण जांच और दूषित साक्ष्य पर दोषसिद्धि
सुप्रीम कोर्ट ने रामकिरत को बरी करते हुए पाया कि उनकी दोषसिद्धि त्रुटिपूर्ण और दूषित जांच पर आधारित थी। अदालत ने 27 अक्टूबर को कहा कि भारत सरकार के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अटॉर्नी जनरल अदालत की सहायता करें ताकि ऐसे मामलों में मुआवजे की दिशा तय की जा सके।
अन्य दो मामले: हत्या–बलात्कार के झूठे आरोप
याचिकाओं में शामिल दो अन्य व्यक्तियों — तमिलनाडु के कट्टावेल्लई और उत्तर प्रदेश के संजय — को भी हत्या और बलात्कार के मामलों में फांसी की सजा सुनाई गई थी। दोनों को बाद में सुप्रीम कोर्ट ने निर्दोष करार दिया। कट्टावेल्लई के मामले में अदालत ने कहा था कि गलत तरीके से कैद किए गए लोगों को मुआवजा देने के लिए कानून की जरूरत है।
कानूनी सुधार की दिशा में संकेत
इन मामलों ने न्याय प्रणाली में जवाबदेही और मुआवजे की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम भविष्य में गलत दोषसिद्धि झेलने वालों को राहत दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।



