राजपाल यादव: हंसाने वाला स्टार, लेकिन करोड़ों के कर्ज़ में कैसे डूब गया?
5 करोड़ के लोन ने राजपाल यादव को पहुंचाया कोर्ट और जेल तक। “अता पता लापता” की फ्लॉप ने बिगाड़ा पूरा फाइनेंशियल गणित। स्टारडम से संघर्ष तक कॉमेडी किंग की कर्ज़ वाली सच्चाई।

बॉलीवुड के मशहूर कॉेडियन राजपाल यादव ने 2000 के दशक में हंगामा, चुप चुप के, भूल भुलैया, फिर हेरा फेरी जैसी फिल्मों से अपनी अलग पहचान बनाई। एक समय ऐसा था जब वे साल में 8–10 फिल्मों में काम कर रहे थे और इंडस्ट्री के सबसे व्यस्त कलाकारों में गिने जाते थे। लेकिन प्रोडक्शन में कदम रखना उनके लिए भारी पड़ गया।
कहानी की शुरुआत: फिल्म “अता पता लापता” (2012)
राजपाल यादव ने 2012 में फिल्म “अता पता लापता” बनाई।यह फिल्म उनके बैनर Shree Naurang Godavari Entertainment Ltd. के तहत बनी। फिल्म बनाने के लिए उन्होंने एक दिल्ली-स्थित बिजनेसमैन (MGF ग्रुप से जुड़े कारोबारी एम.जी. अग्रवाल) से लगभग ₹5 करोड़ का कर्ज़ लिया। यह राशि कंपनी के खाते में निवेश/लोन के रूप में दी गई थी। फिल्म रिलीज़ तो हुई, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप रही। कमाई लागत के आसपास भी नहीं पहुंच पाई, जिससे कर्ज़ चुकाना मुश्किल हो गया।
कानूनी पेंच: चेक बाउंस और कोर्ट केस
कर्ज़ की रकम लौटाने के लिए कंपनी की ओर से जो चेक दिए गए, वे बाउंस हो गए। इसके बाद कारोबारी ने दिल्ली की अदालत में Negotiable Instruments Act (चेक बाउंस) के तहत केस दर्ज कराया। अदालत ने कई बार पेश होने के लिए कहा, लेकिन अनुपस्थित रहने पर मामला और गंभीर हो गया।2018 में दिल्ली हाईकोर्ट ने अदालत की अवमानना के मामले में राजपाल यादव को 3 महीने की सिविल जेल की सजा सुनाई।उन्हें तिहाड़ जेल भेजा गया, जहां उन्होंने सजा काटी।
क्या सिर्फ 5 करोड़ ही मामला था?
मुख्य केस करीब ₹5 करोड़ के लोन और उस पर ब्याज/दंडात्मक राशि से जुड़ा था। कुछ रिपोर्ट्स में ब्याज और पेनल्टी मिलाकर रकम और बढ़ने की बात सामने आई थी, लेकिन मूल विवाद 5 करोड़ के आसपास का था। यह ध्यान देने वाली बात है कि यह रकम व्यक्तिगत उधारी नहीं, बल्कि उनकी प्रोडक्शन कंपनी के माध्यम से ली गई थी, लेकिन बतौर डायरेक्टर और जिम्मेदार हस्ताक्षरकर्ता वे कानूनी रूप से जवाबदेह थे।
करियर पर असर
2012 के बाद से उन्हें बड़ी फिल्मों में कम मौके मिले। जेल जाने की खबर ने उनकी छवि पर असर डाला। हालांकि, सजा पूरी करने के बाद उन्होंने फिर से फिल्मों और वेब सीरीज में काम शुरू किया। बाद में वे Judwaa 2, Coolie No.1 (रीमेक), Hungama 2 जैसी फिल्मों में नजर आए।
सबक क्या है?
1. स्टारडम हमेशा आर्थिक सुरक्षा की गारंटी नहीं देता। 2. फिल्म प्रोडक्शन हाई-रिस्क बिजनेस है, फ्लॉप का मतलब सीधा घाटा। 3. कंपनी के नाम पर लिया गया कर्ज़ भी डायरेक्टर/हस्ताक्षरकर्ता को कानूनी मुसीबत में डाल सकता है। राजपाल यादव की कहानी सिर्फ एक अभिनेता की नहीं, बल्कि उस जोखिम की कहानी है जो ग्लैमर के पीछे छुपा होता है।



