इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: ट्रांसजेंडर के साथ लिव-इन में रह रहे कपल को सुरक्षा
हाईकोर्ट ने ट्रांसजेंडर कपल को दी सुरक्षा बालिगों की लिव-इन रिलेशनशिप को मिला संरक्षण परिवार के हस्तक्षेप पर सख्त टिप्पणी

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ट्रांसजेंडर और एक अन्य बालिग व्यक्ति के बीच लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी संरक्षण देते हुए साफ कहा है कि उनके जीवन में परिवार या समाज का कोई भी व्यक्ति दखल नहीं दे सकता। कोर्ट ने संविधान के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को सर्वोपरि बताते हुए पुलिस को जरूरत पड़ने पर तत्काल सुरक्षा देने का आदेश दिया है।
मुरादाबाद से जुड़ा है मामला
मामला मुरादाबाद जिले के मझोला थाना क्षेत्र का है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि वे दोनों बालिग हैं और अपनी इच्छा से साथ रह रहे हैं। उनका आरोप था कि परिवार के लोग ही उनके रिश्ते का विरोध कर रहे हैं और जान-माल का खतरा पैदा कर रहे हैं। स्थानीय पुलिस से सुरक्षा की मांग करने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने स्पष्ट किया कि हर बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने का पूरा अधिकार है। परिवार या समाज इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले Navtej Singh Johar v. Union of India का हवाला दिया, जिसमें समलैंगिक संबंधों को मान्यता देते हुए आईपीसी की धारा 377 को निरस्त किया गया था। कोर्ट ने कहा कि ऐसे संबंध संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 19 (अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता का अधिकार) और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन नहीं करते। साथ ही, Akanksha v. State of Uttar Pradesh मामले का उल्लेख करते हुए अदालत ने दोहराया कि शादी न होने या किसी कारण से शादी न कर पाने की स्थिति में भी दो बालिग व्यक्तियों के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार सुरक्षित रहते हैं।
परिवार को हस्तक्षेप से रोका
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि जब दो बालिग अपनी मर्जी से साथ रहने का फैसला कर लेते हैं, तो परिवार या अन्य किसी को उनके शांतिपूर्ण जीवन में बाधा डालने का अधिकार नहीं है। राज्य की जिम्मेदारी है कि वह नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करे। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ताओं को किसी प्रकार की परेशानी होती है तो वे पुलिस कमिश्नर या संबंधित जिले के एसएसपी से संपर्क कर सकते हैं। पुलिस तत्काल सुरक्षा उपलब्ध कराएगी। यदि उम्र को लेकर विवाद हो तो पुलिस ऑसिफिकेशन टेस्ट या अन्य कानूनी प्रक्रिया से सत्यापन कर सकती है। हालांकि, यदि कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है, तो पुलिस अनावश्यक या जबरन कार्रवाई नहीं करेगी। यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि बालिगों के निजी जीवन में बेवजह हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है।



