तानाशाह का मातम और विलाप करते ‘बुद्धिजीवी’: प्रगतिशीलता के नकाब में छिपा दोगलापन

ईरान मुद्दे पर भारत में वैचारिक बहस तेज महिलाओं के अधिकार और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सवाल लिबरल राजनीति में दोहरे मानदंड का आरोप

सोशल मीडिया के दौर में वैचारिक विरोधाभास खुलकर सामने आ जाते हैं, लेकिन हालिया घटनाओं ने बहस को और तेज कर दिया है। एक तरफ ईरान की सड़कों पर उस शासन के खिलाफ गुस्सा और जश्न के दृश्य दिखे, जिसे कई लोग दमनकारी मानते रहे हैं; वहीं दूसरी ओर भारत में कुछ समूहों द्वारा उस नेतृत्व के समर्थन में आवाजें उठती नजर आईं। आलोचकों का कहना है कि यह रुख वैचारिक असंगति को दर्शाता है, जबकि समर्थक इसे वैश्विक राजनीति की जटिलता बताते हैं।

महिलाओं के अधिकार और अंतरराष्ट्रीय बहस

ईरान में ‘मोरैलिटी पुलिस’ और महिलाओं के अधिकारों को लेकर लंबे समय से विवाद रहा है। महसा अमीनी की मौत के बाद उठे आंदोलन ने वैश्विक स्तर पर आक्रोश पैदा किया था। विरोध करने वाले कहते हैं कि ऐसे शासन के प्रति सहानुभूति जताना महिलाओं की स्वतंत्रता के सवालों को कमजोर करता है। वहीं कुछ विश्लेषक मानते हैं कि क्षेत्रीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय दबावों को भी इस परिप्रेक्ष्य में समझना जरूरी है।

कला, सिनेमा और अभिव्यक्ति की आज़ादी

ईरानी फिल्मकारों जैसे जफर पनाही, बहमन घोबाडी और असगर फरहादी के साथ कथित व्यवहार को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। भारत में भी The Kashmir Files और The Kerala Story जैसी फिल्मों पर तीखी बहस छिड़ी थी। आलोचकों का कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रुख अक्सर विचारधारात्मक चश्मे से तय होता है।

कट्टरपंथ, नीति और वैचारिक स्थिरता

कट्टरपंथ और पहचान की राजनीति पर भी समाज में मतभेद गहरे हैं। कुछ लोग तर्क देते हैं कि चरमपंथ का विरोध सिद्धांतों के आधार पर होना चाहिए, न कि सुविधा के अनुसार। उदाहरण के तौर पर संयुक्त अरब अमीरात द्वारा कट्टरपंथ से निपटने के लिए उठाए गए कदमों का हवाला दिया जाता है। अंततः बहस इसी प्रश्न पर केंद्रित है कि क्या वैचारिक प्रतिबद्धता स्थायी मूल्यों पर आधारित है या परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है।

 

By: Rajvardhan Singh

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