कौनसे राज्य देते हैं सबसे ज्यादा गलियां? यूपी-बिहार तीसरे नंबर पर, कानपुर को गालियों में गोल्ड मेडल!

आजकल गालियों का चलन सिर्फ झगड़ों या गुस्से तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन चुका है। हाल ही में किए गए एक बड़े सर्वे में पता चला कि भारत के कई राज्यों और शहरों में गालियों का इस्तेमाल आम हो गया है। उत्तर प्रदेश के कुछ शहरों में तो लगभग हर चार में तीन लोग बातचीत के दौरान गाली देते हैं।
इस लेख में हम जानेंगे कि यूपी के कौन से शहर सबसे आगे हैं, किन राज्यों में गालियों का चलन अधिक है, सर्वे किसने किया और कैसे, और इसका समाज पर क्या असर पड़ रहा है।
सर्वे किसने और कैसे किया?
यह सर्वे सेल्फी विद डॉटर फाउंडेशन द्वारा किया गया। इसके नेतृत्व में महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक (हरियाणा) के प्रोफेसर सुनील जागलान ने इसे अंजाम दिया।
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यह सर्वे लगभग 11 वर्षों तक चला।
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देशभर के 70,000 लोगों को इसमें शामिल किया गया।
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इसमें युवाओं, माता-पिता, पुलिसकर्मियों, शिक्षकों, व्यापारियों और समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों से बातचीत कर उनकी भाषा की आदतों का अध्ययन किया गया।
इस पहल के अंतर्गत “गाली बंद घर अभियान” भी चलाया गया, जिसका उद्देश्य:
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महिलाओं के प्रति अपमानजनक भाषा का विरोध करना
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सभ्य संवाद को बढ़ावा देना
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बच्चों में अच्छे संस्कार विकसित करना
देशभर में 60,000 से अधिक जगहों पर ‘गाली बंद घर’ के चार्ट लगाए गए, ताकि लोग रोज देखकर भाषा पर नियंत्रण रखें।
यूपी के कौन से शहर सबसे ज्यादा गाली देते हैं?
सर्वे में उत्तर प्रदेश के कई शहरों को गाली देने में सबसे आगे पाया गया। आंकड़ों के अनुसार ये शहर टॉप 10 में शामिल हैं।
यूपी के टॉप 10 शहर – गालियों की प्रवृत्ति (प्रतिशत में):
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कानपुर – 78%
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लखनऊ – 76%
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वाराणसी – 76%
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मुरादाबाद – 76%
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संतकबीरनगर – 76%
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मेरठ – 75%
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प्रयागराज – 75%
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गौतमबुद्ध नगर – 73%
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बलिया – 73%
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मिर्जापुर – 73%
यह आंकड़े बताते हैं कि शहरों में गालियों का चलन किस स्तर तक पहुंच चुका है।
भारत के कौन से राज्य सबसे ज्यादा गालियां देते हैं?
सर्वे में पूरे भारत के राज्यों को भी शामिल किया गया। इसमें पाया गया कि कुछ राज्यों में गालियों का इस्तेमाल बहुत ज्यादा है, जबकि कुछ राज्यों में सांस्कृतिक और धार्मिक कारणों से गालियों का चलन सीमित है।
गालियों का प्रयोग करने वाले राज्यों की लिस्ट (प्रतिशत के अनुसार, उच्चतम से निम्नतम):
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दिल्ली – 80%
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पंजाब – 78%
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उत्तर प्रदेश – 74%
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बिहार – 74%
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राजस्थान – 68%
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हरियाणा – 62%
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महाराष्ट्र – 58%
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गुजरात – 55%
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मध्य प्रदेश – 48%
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उत्तराखंड – 45%
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कश्मीर – 15%
यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि दिल्ली, पंजाब, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में गालियों का चलन सबसे ज्यादा है, जबकि कश्मीर में धार्मिक आदर्शों और शांत वातावरण के कारण गालियों का प्रयोग बहुत कम है।
गालियों का समाज पर क्या असर?
सर्वे में यह भी सामने आया कि:
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गालियों का प्रयोग केवल पुरुषों तक सीमित नहीं है; युवाओं, महिलाओं और कॉलेज छात्राओं में भी यह बढ़ रहा है।
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लगभग 30% लड़कियां लड़कों से ज्यादा गालियां देती हैं।
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54% युवाओं ने कहा कि उन्होंने गालियां ओटीटी, सोशल मीडिया और फिल्मों से सीखी हैं।
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62% लोगों ने स्वीकार किया कि बिना महिला पर जोक्स या गालियों के जोक्स पर उन्हें हंसी नहीं आती।
गालियों का प्रयोग अब केवल गुस्से की अभिव्यक्ति नहीं रह गया है, बल्कि यह मजाक, दोस्ती और तनाव दूर करने का तरीका बन गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार गालियां “कैथार्सिस इफेक्ट” की तरह काम करती हैं, यानी गुस्से और तनाव को कुछ समय के लिए कम करने का तरीका।
लेकिन इसका अत्यधिक प्रयोग मानसिक संतुलन और सामाजिक रिश्तों पर नकारात्मक असर डाल सकता है।
गाली देने की शुरुआत कब हुई?
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मानव इतिहास में गालियों का चलन आदिमानव युग से जुड़ा है।
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लगभग 2.5 मिलियन वर्ष पहले, जब भाषा नहीं थी, इंसान अपनी भावनाओं को चिल्लाकर, दांत पीसकर और अजीब आवाजें निकालकर व्यक्त करता था।
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संस्कृत ग्रंथों में असभ्य भाषा से बचने की सलाह दी गई थी।
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ग्रीक और रोमन लेखन में भी अपमानजनक भाषा के उदाहरण मिलते हैं।
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मुगल और ब्रिटिश काल में क्षेत्रीय भाषाओं में जाति, लिंग और परिवार आधारित गालियों का विकास हुआ।
गालियों पर कानून क्या कहता है?
भारत में गाली देना कानूनन अपराध माना गया है। भारतीय दंड संहिता (IPC) की कुछ धाराओं के तहत इसकी सजा का प्रावधान है:
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IPC 294 – सार्वजनिक स्थान पर गाली देने पर 3 महीने तक की जेल या जुर्माना।
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IPC 504 – जानबूझकर गाली देकर भड़काने पर 2 साल तक की जेल या जुर्माना।
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IPC 506 – गाली के साथ धमकी देने पर 2 से 7 साल तक की जेल।
समाज की आदत
गालियों का चलन आज केवल भाषा का हिस्सा नहीं, बल्कि समाज की आदत बन चुका है। सर्वे ने साफ कर दिया कि उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों और शहरों में गालियों का प्रयोग आम हो गया है।
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युवाओं और महिलाओं में यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है।
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कानून गाली देने पर सख्त है, लेकिन समाज में इसकी स्वीकार्यता बढ़ती जा रही है।
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ऐसे में सभ्य संवाद और भाषा की संस्कृति को बढ़ावा देना समय की मांग है।



