सोनम वांगचुक ने बदला रुख? धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग क्यों हुई पीछे, क्या बीजेपी से बनी कोई सहमति?

नई दिल्ली: पिछले तीन हफ्तों से आमरण अनशन पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा सुधार अभियान के प्रमुख चेहरे सोनम वांगचुक ने अपने रुख में बड़ा बदलाव किया है। शुरुआत में उनका सबसे प्रमुख आग्रह केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का था, लेकिन अब उन्होंने संकेत दिया है कि यदि सरकार शिक्षा व्यवस्था की विफलताओं की जिम्मेदारी स्वीकार कर ठोस सुधारों का आश्वासन देती है, तो केवल इस्तीफा ही एकमात्र शर्त नहीं रहेगी।

अब क्या हैं वांगचुक की नई शर्तें?

वांगचुक ने कहा है कि वह अपना अनशन समाप्त करने पर विचार कर सकते हैं यदि:

  • केंद्र सरकार शिक्षा व्यवस्था की विफलताओं की जिम्मेदारी स्वीकार करे।
  • या फिर सरकार अथवा राजनीतिक नेतृत्व संसद में इस मुद्दे पर चर्चा और समाधान का स्पष्ट आश्वासन दे।
  • उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनकी आवाजाही, अभिव्यक्ति और संवाद की स्वतंत्रता सीमित की गई है।

इस बयान से स्पष्ट है कि उनका फोकस अब केवल किसी एक मंत्री को हटाने के बजाय शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही और सुधार सुनिश्चित कराने पर है।

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पीछे क्यों गई?

वांगचुक ने सार्वजनिक रूप से यह नहीं कहा कि उन्होंने धर्मेंद्र प्रधान को “क्लीन चिट” दे दी है। बल्कि उनके ताज़ा बयानों से यह संकेत मिलता है कि यदि सरकार व्यापक स्तर पर जवाबदेही स्वीकार करती है और सुधार की दिशा में आगे बढ़ती है, तो केवल इस्तीफे पर अड़े रहना आवश्यक नहीं है। यानी उनका आंदोलन अब व्यक्ति-केंद्रित नहीं बल्कि व्यवस्था-केंद्रित होता दिख रहा है।

क्या बीजेपी से कोई समझौता हुआ है?

अब तक ऐसा कोई आधिकारिक प्रमाण या बयान सामने नहीं आया है जिससे यह साबित हो कि सोनम वांगचुक और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बीच कोई राजनीतिक समझौता हुआ है।

विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि सरकार बातचीत से बच रही है, जबकि सरकार की ओर से मुख्य जोर वांगचुक के स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था पर रहा है। दिल्ली हाई कोर्ट के निर्देशों के बाद उनकी स्वास्थ्य निगरानी बढ़ाई गई और तबीयत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल भी ले जाया गया।

बीजेपी और वांगचुक का रिश्ता क्या है?

सोनम वांगचुक का बीजेपी के साथ रिश्ता समय-समय पर बदलता रहा है।

  • वर्ष 2020 में उन्होंने चीन के सामान के बहिष्कार के अभियान का समर्थन किया था, जिसे केंद्र सरकार के राष्ट्रवादी रुख के समान माना गया।
  • लेकिन पिछले कुछ वर्षों में वे लद्दाख को संवैधानिक सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और अब शिक्षा सुधार जैसे मुद्दों पर केंद्र सरकार के मुखर आलोचक बनकर उभरे हैं।

यानी उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड के अनुसार वे किसी राजनीतिक दल के सदस्य नहीं हैं और स्वयं को मुद्दा-आधारित सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

फिलहाल क्या स्थिति है?

वांगचुक की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। उन्होंने कहा है कि यदि सरकार उनकी प्रमुख मांगों पर सार्थक पहल करती है या संसद में इस मुद्दे पर ठोस आश्वासन मिलता है, तो वे अनशन समाप्त करने पर विचार करेंगे। फिलहाल आंदोलन जारी है और समर्थक ‘चलो संसद’ अभियान के तहत प्रदर्शन कर रहे हैं।

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