दिल्ली में तालिबान मंत्री की प्रेस कॉन्फ्रेंस से मचा बवाल, महिलाओं की नो एंट्री पर बड़ा एलान.. सरकार को देना होगा जवाब?

अफगानिस्तान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी भारत दौरे पर आए थे, जहां उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। लेकिन इस दौरान एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया। बताया जा रहा है कि महिला पत्रकारों को कॉन्फ्रेंस में शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई।
मुत्तकी की यह प्रेस कॉन्फ्रेंस दिल्ली में आयोजित थी, लेकिन आयोजकों की इस कार्रवाई ने मीडिया जगत और सोशल मीडिया दोनों में रोष पैदा कर दिया।

चिदंबरम का बयान: “पुरुष पत्रकारों को वॉकआउट करना चाहिए था”

इस पूरे मामले पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है।
उन्होंने X (पहले ट्विटर) पर लिखा —

“यह जानकर मुझे झटका लगा कि अफगानिस्तान के मुत्तकी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिला पत्रकारों को बाहर रखा गया। मेरी राय में पुरुष पत्रकारों को वहां से वॉकआउट कर देना चाहिए था।”
चिदंबरम का यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। उन्होंने इसे महिला पत्रकारों के प्रति भेदभाव और प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला बताया।

सोशल मीडिया पर भड़की नाराजगी

सोशल मीडिया पर घटना का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें देखा जा सकता है कि महिला पत्रकारों को प्रेस कॉन्फ्रेंस स्थल में प्रवेश नहीं दिया गया।
इस वीडियो के सामने आने के बाद लोगों ने तालिबानी रवैये की कड़ी आलोचना की। कई यूजर्स ने लिखा कि “यह 21वीं सदी का नहीं, मध्यकालीन सोच का उदाहरण है।”
कुछ ने इसे भारत में महिलाओं के प्रति अपमानजनक संदेश बताया और आयोजकों से माफी की मांग की।

प्रेस की स्वतंत्रता और लैंगिक समानता पर बड़ा सवाल

यह घटना केवल एक प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने पत्रकारिता की आज़ादी, महिलाओं की भागीदारी और लैंगिक समानता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में स्वतंत्र प्रेस की गरिमा पर चोट के समान है।
सवाल यह भी उठ रहा है कि जब भारत महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में कदम बढ़ा रहा है, तब ऐसी घटनाएं वैश्विक स्तर पर कैसी छवि पेश करती हैं।

राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ

अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से महिलाओं की शिक्षा और रोजगार पर कई प्रतिबंध लगाए गए हैं।
अब भारत में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस तरह का भेदभाव सामने आने से यह मुद्दा और अधिक संवेदनशील बन गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तालिबान की छवि खराब करती हैं, बल्कि भारत के अंदर भी लैंगिक समानता की बहस को और तीव्र करती हैं।

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