बिहार चुनाव : राहुल का ‘Gen Z’ बनाम नीतीश का ‘महिला वोट बैंक’

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 दो चरणों में संपन्न हुआ! पहला चरण 6 नवंबर को और दूसरा चरण 11 नवंबर को। पहले चरण में रिकॉर्ड 64.66% मतदान दर्ज किया गया, जो राज्य के चुनावी इतिहास में अब तक का सर्वोच्च आंकड़ा रहा। जबकि दूसरे चरण में उत्साह और बढ़ा, जहाँ 68.79% वोटिंग हुई।

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BIHAR NEWS: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 दो चरणों में संपन्न हुआ! पहला चरण 6 नवंबर को और दूसरा चरण 11 नवंबर को। पहले चरण में रिकॉर्ड 64.66% मतदान दर्ज किया गया, जो राज्य के चुनावी इतिहास में अब तक का सर्वोच्च आंकड़ा रहा। जबकि दूसरे चरण में उत्साह और बढ़ा, जहाँ 68.79% वोटिंग हुई। दोनों चरणों को मिलाकर इस बार औसतन 66.90% मतदान हुआ, जो न सिर्फ़ बिहार की राजनीति में जनता की बढ़ती भागीदारी का संकेत देता है, बल्कि बदलते जनमूड की भी झलक दिखाता है। जेपी आंदोलन के बाद पहली बार बिहार में इस स्तर की जबरदस्त वोटिंग देखने को मिली है। 2020 में “तेजस्वी फेक्टर” और “नीतीश फेक्टर” दोनों मौजूद थे, लेकिन तब भी इतनी व्यापक जनभागीदारी नहीं दिखी थी। इस बार का असली श्रेय युवा मतदाताओं और महिला वोटर्स को जाता है, जिन्होंने लोकतंत्र को नई ऊर्जा दी है।

बिहार चुनाव का दिलचस्प पहलू यह है कि मुकाबला पारंपरिक दलों से ज़्यादा नई सामाजिक ऊर्जा और पुरानी राजनीतिक पकड़ के बीच दिखाई दे रहा है। एक ओर राहुल गांधी के ‘Gen Z’ यानी युवाओं और नए मतदाताओं का जुड़ाव है, जो पारदर्शिता, रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दों पर मुखर हैं। दूसरी ओर, नीतीश कुमार का मजबूत महिला वोट बैंक है, जो शराबबंदी, सुरक्षा और जनकल्याण योजनाओं की वजह से अब भी उनके साथ खड़ा दिखाई देता है। इस बार का बिहार चुनाव सिर्फ़ गठबंधनों का नहीं, बल्कि ‘नई सोच बनाम पुराने भरोसे’ का भी संघर्ष है। जहाँ राहुल गांधी और तेजस्वी यादव युवाओं में उम्मीद का प्रतीक बन रहे हैं, वहीं नरेंद्र मोदी – नीतीश कुमार अनुभव और स्थिरता की छवि के सहारे मैदान में हैं। ऐसे में, बिहार की जनता का फैसला यह तय करेगा कि युवा जोश जीतेगा या सधी हुई नीतियों का विश्वास।

 

पहले चरण का विजेता, बिहार का विजेता

 

BIHAR NEWS:  बिहार चुनावों में अक्सर देखा गया है कि जो दल पहले चरण में बढ़त बना लेता है, वही अंतिम परिणाम में बाज़ी मारता है। इस बार के पहले चरण के मतदान के रुझान और प्रारंभिक आकलनों से साफ़ संकेत मिल रहा है कि महागठबंधन लगभग 65% सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। यही वजह है कि चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के भाषणों के स्वर में बदलाव साफ़ झलकने लगा। पहले चरण में जहाँ नीतीश कुमार को लगभग दरकिनार कर दिया गया था, वहीं दूसरे चरण से ठीक पहले प्रधानमंत्री ने अपनी सभा में ‘अबकी बार नीतीश सरकार’ का नारा बुलवाकर यह संकेत दे दिया कि बीजेपी बैकफुट पर है।

2020 के बिहार विधानसभा चुनाव कुल तीन चरणों में हुए थे- पहले चरण में 71 सीटों, दूसरे चरण में 94 सीटों, और तीसरे चरण में 78 सीटों पर मतदान हुआ था। दिलचस्प बात यह है कि बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में भी वही पैटर्न देखने को मिला था जो 2025 के पहले चरण में नज़र आ रहा है। तब जिन 121 सीटों पर पहले चरण का मतदान इस बार हुआ है, उनमें से महागठबंधन ने 61 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जिनमें राजद को 42, कांग्रेस को 8, और वामदलों को 11 सीटें मिली थीं। वोट शेयर के लिहाज़ से भी महागठबंधन 38.1% के साथ सबसे आगे रहा था, जबकि एनडीए 36.3% वोट शेयर के साथ 59 सीटें जीतने में कामयाब रहा था। इनमें भाजपा को 32, जेडीयू को 23, और अन्य दलों को 4 सीटें मिली थीं। यानी, 2020 की तरह ही इस बार भी पहले चरण में महागठबंधन का प्रदर्शन बेहतर रहा है,और यही संकेत 2025 के अंतिम नतीजों की दिशा तय कर सकता है। इतिहास गवाह है कि बिहार में पहले चरण की बढ़त अक्सर पूरे चुनाव का रुख तय करती है! यह राजनीतिक संदेश साफ़ है कि एनडीए सेमीफाइनल हार चुका है, और अब लड़ाई सम्मान बचाने की बन चुकी है। अगर राहुल गांधी और तेजस्वी यादव दूसरे चरण में भी अपनी पहले जैसी स्ट्राइक रेट बनाए रखते हैं, तो महागठबंधन 135 से 140 सीटों तक पहुँच सकता है, जो बिहार की सत्ता में एक बड़े परिवर्तन का संकेत होगा। और यही वजह है कि इस बार भी राजनीतिक हलकों में कहा जा रहा है, “पहले चरण का विजेता, बिहार का विजेता होगा।”

 

एग्ज़िट पोल पर भरोसे का संकट

BIHAR NEWS:  पिछले कुछ चुनावों में एग्ज़िट पोल जिस तरह से बुरी तरह असफल रहे हैं, उसके बाद जनता का इन सर्वेक्षणों पर से भरोसा लगभग उठ चुका है। फिर भी, अब तक बिहार चुनाव को लेकर 15 एग्ज़िट पोल सामने आ चुके हैं, जिनमें से 14 ने एनडीए को बहुमत से अधिक सीटें मिलने का अनुमान जताया है। हालाँकि, इस बार की बंपर वोटिंग को केवल “सत्ता के पक्ष में लहर” मान लेना जल्दबाज़ी होगी। इतनी बड़ी संख्या में जनता का मतदान केंद्रों तक पहुँचना, सत्ता के प्रति समर्थन से ज़्यादा परिवर्तन की इच्छा या लोकतांत्रिक जवाबदेही का संकेत भी हो सकता है। पहले चरण में 64.66% और दूसरे चरण में 68.79% मतदान दर्ज होना इस बात का संकेत है कि मतदाता केवल सरकार बदलने या बनाए रखने के लिए नहीं, बल्कि राजनीतिक जवाबदेही तय करने के लिए भी मतदान कर रहे हैं। इस बढ़े हुए मतदान प्रतिशत के पीछे ‘राहुल गांधी फैक्टर’ को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता! खासकर युवाओं और पहली बार वोट देने वालों के बीच राहुल गांधी की बढ़ती स्वीकार्यता ने एक जन-जागरण जैसी लहर पैदा की है। कहा जा सकता है कि इस बार मुकाबला केवल गठबंधनों का नहीं, बल्कि ‘राहुल के जन-संपर्क’ और ‘नीतीश की परंपरागत पकड़’ के बीच का है। ऐसे में, बंपर वोटिंग को सत्ता के समर्थन में समझना शायद उतना आसान नहीं जितना एग्ज़िट पोल बता रहे हैं।

 

बिहार का मूड साफ़ है: NDA मुश्किल से 100 पार, महागठबंधन बहुमत की राह पर

 

BIHAR NEWS:  बिहार के राजनीतिक माहौल को देखकर अब यह स्पष्ट हो रहा है कि जनता का झुकाव किस ओर है। राजनीतिक हवा और ज़मीनी समीकरण, दोनों इस बार महागठबंधन के पक्ष में जाते दिख रहे हैं। अगर चुनाव आयोग ने “SIR” जैसे किसी ‘बड़े खेल’ की गुंजाइश नहीं छोड़ी, तो इस बार एनडीए 100 सीटों का आंकड़ा पार करने में भी कठिनाई झेलेगा। जनता का मूड बता रहा है कि महागठबंधन 135 से 140 सीटों के बीच मजबूत स्थिति में है, और बिहार की सत्ता परिवर्तन के मूड में है। जैसे 2020 में हुआ था, वैसे ही इस बार भी राजद (RJD) महागठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरती दिख रही है। इस चुनाव में मतदाताओं ने जातीय समीकरणों से आगे बढ़कर रोज़गार, शिक्षा, जवाबदेही और नेतृत्व की ईमानदारी जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दी है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि 2025 का यह जनादेश सिर्फ़ राजनीतिक गठबंधन का नहीं, बल्कि विश्वास और उम्मीद के पुनर्जागरण का प्रतीक बनने जा रहा है!

 

‘जंगल राज’ का गोलपोस्ट शिफ्ट करने में सफल रहे लालू

 

BIHAR NEWS:  बिहार की राजनीति में इस बार एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिला! लालू प्रसाद यादव ने अपने पुराने ‘जंगल राज’ के नैरेटिव को पूरी तरह पलटने में सफलता पाई है। उन्होंने इस चुनाव में केवल दो रैलियाँ कीं, लेकिन रणनीतिक रूप से बड़ा संदेश दिया कि अब राजद का चेहरा तेजस्वी यादव हैं। लालू परिवार से भी तेजस्वी के अलावा कोई और चेहरा मैदान में नहीं उतारा गया। यहाँ तक कि तेज प्रताप यादव को पार्टी से बाहर कर, लालू यादव ने ‘परिवारवाद’ की कमजोर कड़ी को भी निर्णायक रूप से तोड़ दिया। इस कदम ने न सिर्फ़ राजद की जनसाख को मज़बूती दी, बल्कि पार्टी को नई पीढ़ी के लिए स्वीकार्य विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया। जो युवा मतदाता लालू युग के ‘जंगल राज’ को देखे बिना बड़े हुए हैं, वे इस बार तेजस्वी यादव के ‘हर घर सरकारी नौकरी’ वाले वादे से प्रभावित दिखे। दूसरी ओर, राहुल गांधी के ‘वोट चोर’ जैसे नारों ने युवा मतदाताओं के भीतर सत्ता-विरोधी ऊर्जा को जगाने में अहम भूमिका निभाई। नतीजा यह हुआ कि मोदी-शाह-नीतीश की जोड़ी द्वारा बार-बार दोहराया गया ‘जंगल राज’ का डर अब उतना असरदार नहीं रहा! उनका यह नैरेटिव ‘शेर आया, शेर आया’ की तरह सुनाई तो दिया, लेकिन जनता के मन में डर नहीं पैदा कर पाया!

 

वेस्ट बंगाल में ज़मीन खोने के बाद, बिहार पर लेफ़्ट की नज़र

 

BIHAR NEWS:  वेस्ट बंगाल में लगातार राजनीतिक ज़मीन खोने के बाद वामपंथी पार्टियों ने अब बिहार को अपनी पुनर्स्थापना का नया केंद्र बना लिया है। पिछले विधानसभा चुनाव में वाम दलों ने बिहार की राजनीति में अप्रत्याशित वापसी करते हुए कई सीटों पर ‘लाल रंग’ बिखेरा था! और यही प्रदर्शन अब 2025 के चुनाव में उनके आत्मविश्वास की नींव बना है। इस बार भी बिहार में तीनों प्रमुख वामपंथी दल, सीपीआई(एमएल), सीपीआई(एम) और सीपीआई महागठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। इस बार सीपीआई(एमएल) लगभग 20 सीटों, सीपीआई(एम) 4 सीटों, और सीपीआई 9 सीटों पर मज़बूत स्थिति में मानी जा रही है। पिछले चुनाव की तरह इस बार भी वाम दल ग्रामीण इलाक़ों में संगठन और जनसंपर्क के स्तर पर बेहद सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। दिलचस्प यह है कि जहाँ महागठबंधन की कमजोर कड़ी कांग्रेस इस बार अपेक्षाकृत मज़बूत दिख रही है! वहीं वामपंथी दल भी अपने आधार क्षेत्रों में 2020 से बेहतर प्रदर्शन की स्थिति में हैं। अर्थात्, बिहार 2025 में वाम दल केवल सहयोगी नहीं, बल्कि महागठबंधन के ‘मोबिलाइज़र’ की भूमिका निभा रहे हैं,जो मैदान में ऊर्जा और विचार, दोनों स्तर पर लड़ाई को धार दे रहे हैं।

 

मुकेश साहनी और IP गुप्ता फेक्टर, चिराग-मांझी पर भारी

 

BIHAR NEWS:  बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कई छोटे मगर असरदार फैक्टर देखने को मिले, जिनमें मुकेश साहनी और आई.पी. गुप्ता का प्रभाव सबसे प्रमुख रहा। जहाँ एक ओर चिराग पासवान और जीतन राम मांझी की पार्टियाँ पारंपरिक एनडीए ट्रैक पर चलते हुए सीमित दायरे में सिमट गईं, वहीं मुकेश साहनी और IP गुप्ता ने समीकरणों को ज़मीनी स्तर पर हिलाने का काम किया। मुकेश साहनी, जिन्होंने पिछड़ों और मल्लाह समुदाय के बीच गहरी पकड़ बनाई है, वे इस बार कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभा सकते है, खासकर उन इलाक़ों में जहाँ एनडीए और महागठबंधन के बीच सीधा मुकाबला है। उनका यह फेक्टर न सिर्फ़ नीतीश कुमार के वोट बेस को काटता हुआ दिखा, बल्कि कुछ इलाक़ों में बीजेपी के निचले तबके के वोटर्स को भी खींच ले गया। वहीं, आई.पी. गुप्ता ने शहरी और पिछड़े वर्ग के शिक्षित वोटर्स के बीच अप्रत्याशित पकड़ बनाई, जिससे कई जगहों पर पारंपरिक समीकरण उलट गए। इन दोनों नेताओं का उभार इस बात का संकेत है कि बिहार की राजनीति अब सिर्फ़ जातीय गठजोड़ से नहीं, बल्कि सामाजिक आत्मसम्मान और नई नेतृत्व आकांक्षा से भी तय होगी। इस लिहाज़ से देखा जाए तो मुकेश साहनी और IP गुप्ता फेक्टर इस चुनाव में चिराग पासवान और मांझी फेक्टर से कहीं अधिक निर्णायक और प्रभावशाली साबित हुए हैं।

 

PK का बिहार का केजरीवाल बनने का ‘दिव्य स्वप्न’

 

BIHAR NEWS:  बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर का किरदार इस चुनाव में एक दिलचस्प विरोधाभास बनकर उभरा है। दूसरों को चुनाव जिताने की रणनीति रचने वाले प्रशांत किशोर खुद के लिए वह समीकरण नहीं बना पाए, जो उन्हें बिहार की राजनीति में टिकाऊ चेहरा बना सके। इसमें कोई शक नहीं कि राहुल गांधी की तरह प्रशांत किशोर ने भी युवा वोटर्स को प्रभावित करने में सफलता हासिल की है, लेकिन जब राजनीति संख्या और संगठन दोनों पर टिकती हो, वहाँ PK का ‘आंदोलनात्मक मॉडल’ सीमित असर ही छोड़ पाया। PK का सपना था -‘बिहार का केजरीवाल’ बनने का, पर वह सपना इस बार ‘दिव्य स्वप्न’ ही रह गया। पहले यह अनुमान था कि जन सुराज पार्टी कांग्रेस और जेडीयू के वोट बैंक में सेंध लगाएगी, मगर अब यह साफ़ दिख रहा है कि उसकी वास्तविक चोट बीजेपी के पारंपरिक वोटर्स पर पड़ी है। दरअसल, प्रशांत किशोर के अभियान ने युवाओं और शहरी मतदाताओं के एक हिस्से को यह सोचने पर मजबूर किया कि सत्ता से दूरी ही सबसे बड़ा विरोध है। परंतु, बिहार जैसे राज्य में जहाँ वोट बैंक की राजनीति और जातीय समीकरण निर्णायक भूमिका निभाते हैं, PK का यह प्रयोग उतना असरदार नहीं बन पाया जितनी उन्होंने उम्मीद की थी। अब सवाल यह है कि जन सुराज पार्टी का प्रदर्शन भविष्य में बिहार की राजनीति में तीसरी ताकत बन पाएगा या वोट कटवा की श्रेणी में सीमित रह जाएगा? इसका जवाब बिहार चुनाव के वोटिंग प्रतिशत शेयर और मतों के बंटवारे में छिपा है।

 

असदुद्दीन ओवैसी की हवा ठंडी, PK का गरम हवा

 

BIHAR NEWS:  पिछली बार महागठबंधन को सत्ता से दूर रखने में असदुद्दीन ओवैसी का जो रोल था, इस बार वह प्रभाव पूरी तरह गायब नज़र आया। ओवैसी की पार्टी न तो मुस्लिम वोट बैंक को प्रभावित कर पाई, न ही सीमांचल में अपनी पुरानी पकड़ बनाए रख सकी। इस चुनाव में AIMIM का असर घटा है, जबकि PK एक नेता के रूप में उभरे हैं, जो सीधे वोट में नहीं, बल्कि वोटर की सोच और सवालों में दिखाई दे रहे हैं। इसके उलट, प्रशांत किशोर (PK) का ‘जनसुराज अभियान’ और उनकी संगठित जमीनी मौजूदगी राजनीतिक विमर्श में अधिक असर डालती दिखी। हालांकि PK ने सीधे तौर पर किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं बने, लेकिन उनके प्रभावशाली बयान, आंकड़ों पर आधारित राजनीति और संगठनात्मक सक्रियता ने जनता के बीच चर्चा और जागरूकता दोनों बढ़ाई।

 

राजनीति की नई धुरी: राहुल–तेजस्वी–अखिलेश Vs मोदी–शाह

 

BIHAR NEWS:  बिहार चुनाव 2025 में जिस तेवर, ऊर्जा और समन्वय के साथ अखिलेश यादव नज़र आए,वह भारतीय राजनीति में एक नए गठबंधन-संवेदन की झलक देता है। अखिलेश भले ही उत्तर प्रदेश से आते हैं, लेकिन उन्होंने बिहार में जिस प्रतिबद्धता से महागठबंधन के लिए प्रचार किया, वह अपने आप में मिसाल है जो राजनीति में बहुत कम देखने को मिलता है कि कोई नेता, जिसका अपनी पार्टी की एक भी सीट दांव पर न हो, वह किसी और के लिए इतनी मेहनत करे। राजनीति में यह दृश्य संकेत देता है कि राहुल गांधी, तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव की यह युवा तिकड़ी सिर्फ़ चुनावी तालमेल नहीं, बल्कि विचारधारा का नया साझा मंच गढ़ रही है। इन तीनों में जनसंवाद की भाषा, सामाजिक न्याय का आधार और युवाओं की उम्मीद जैसी समानताएँ हैं, जो आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति का नया केंद्रबिंदु बन सकती हैं। दूसरी ओर, मोदी–शाह की जोड़ी अब भी सशक्त संगठन, संसाधन और रणनीति के बल पर राजनीति चला रही है,परंतु जनता के मन में यह सवाल अब गहराने लगा है कि क्या करिश्मा अकेले करिश्माई चेहरों से कायम रह सकता है, या अब राजनीति को नए चेहरों और नई दृष्टि की ज़रूरत है? कहा जा सकता है कि 2025 का यह चुनाव सिर्फ़ बिहार की सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि दो पीढ़ियों की राजनीति, ‘स्थापित बनाम उभरती’ के बीच का सीधा टकराव है। और आने वाले वर्षों में यही “युवा तिकड़ी” भारत की राजनीति के सबसे रोमांचक अध्याय की रचना कर सकती है।

 

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