अकेली हिन्दू महिला का मुस्लिम बेटे ने किया अंतिम संस्कार, कंधा देने एकजुट हुए कई मुस्लिम युवा, अस्थि विसर्जन संगम में

भीलवाड़ा। शहर के गांधी नगर इलाके में जंगी चौक निवासी 67 वर्षीय शांति देवी का रविवार को निधन हो गया। बुजुर्ग महिला के परिवार में अंतिम संस्कार करने वाला कोई नहीं था। इस मुश्किल घड़ी में उन्हें मां की तरह मानने वाले मुस्लिम युवा असगर अली खान ने अंतिम संस्कार करने का फैसला किया। उनके साथ मोहल्ले के कई मुस्लिम युवाओं ने भी सहयोग किया और हिंदू रीति-रिवाज से उनकी अंतिम यात्रा संपन्न कराई।
अकेली जीवन की कहानी
शांति देवी जंगी चौक के पास गली में करीब 15 साल से अकेली रह रही थीं। निसार सिलावट ने बताया कि वह लंबे समय से बीमार चल रही थीं और महात्मा गांधी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। उनकी देखभाल असगर अली खान करता था। वर्ष 2018 में शांति देवी की तीन बेटियों और एक बेटे का निधन हो चुका था। इसके बाद से वह अकेली रहती थीं।
मोहल्ले वालों का सहयोग
असगर अली खान ने कहा कि वह शांति देवी को अपनी मां की तरह मानते थे। अंतिम संस्कार के लिए मोहल्ले के अशफाक कुरैशी, शाकिर पठान, फिरोज कुरैशी कांचा, आबिद कुरैशी, असगर पठान, अशफाक, इनायत और जाबिद कुरैशी सहित कई लोग उनके साथ आए। सभी ने मिलकर शांति देवी की अंतिम यात्रा की तैयारी की और शाम को मध्य प्रदेश से आए कुछ रिश्तेदारों के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी।
हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार
मोहल्ले के युवाओं ने शांति देवी की अर्थी को मोक्ष रथ से श्मशान तक पहुंचाया और हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया। अंतिम यात्रा के दौरान मोहल्ले की महिलाएं भावुक हो उठीं और उनकी रुलाई फूट पड़ी।
असगर अली का भावुक बयां
असगर अली खान ने बताया कि जब वह चार-पांच साल के थे, तब से शांति देवी ने उन्हें अपनी देखभाल और मां जैसा प्यार दिया। रोजाना उनका हाल पूछतीं और खाने-पीने का ध्यान रखती थीं। असगर ने कहा कि अब उनकी अस्थि विसर्जन भी त्रिवेणी संगम या मातृकुंडिया में करेंगे, क्योंकि वह शांति देवी को अपनी मां की तरह मानते थे।
एकता और मानवता की मिसाल
भीलवाड़ा में इस घटना ने धर्म और जाति की सीमाओं को पार कर एकता और मानवता की मिसाल पेश की है। यह घटना यह दिखाती है कि प्यार, सम्मान और सहयोग किसी भी धर्म या समुदाय से परे होते हैं।



