पुरी रथ यात्रा की तिथि को लेकर विवाद गहराया, इस्कॉन और श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रशासन आमने-सामने
सेवायतों, धार्मिक विद्वानों और श्रद्धालुओं ने सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा और पंचांग के अनुसार यात्रा कराने का किया अनुरोध
पुरी (ओडिशा), 17 जुलाई।
विश्व प्रसिद्ध श्रीजगन्नाथ रथ यात्रा को लेकर इस वर्ष एक बार फिर तिथियों का विवाद चर्चा के केंद्र में है। ओडिशा के पुरी स्थित श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ (इस्कॉन) के बीच रथ यात्रा के आयोजन की निर्धारित तिथियों को लेकर मतभेद गहराता दिखाई दे रहा है। मंदिर प्रशासन और पारंपरिक सेवायतों का कहना है कि भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा सदियों से चली आ रही धार्मिक परंपरा, शास्त्रों और मंदिर के पंचांग के अनुसार ही आयोजित की जानी चाहिए, जबकि इस्कॉन का तर्क है कि विदेशों और विभिन्न देशों में स्थानीय परिस्थितियों, प्रशासनिक अनुमति तथा अन्य व्यावहारिक कारणों के चलते सभी स्थानों पर एक ही तिथि का पालन करना संभव नहीं होता।
इस वर्ष श्रीजगन्नाथ मंदिर की पारंपरिक रथ यात्रा 16 जुलाई को आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के शुभ अवसर पर प्रारंभ हुई। भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा अपने-अपने भव्य रथों पर विराजमान होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। इस ऐतिहासिक यात्रा में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं और भगवान के रथ को खींचने को अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
परंपरा का प्रश्न
पुरी के धार्मिक विद्वानों और सेवायतों का कहना है कि रथ यात्रा केवल एक सांस्कृतिक उत्सव नहीं बल्कि शास्त्रसम्मत धार्मिक अनुष्ठान है। इसकी प्रत्येक रस्म, प्रत्येक तिथि और प्रत्येक परंपरा का अपना विशेष महत्व है। उनका मानना है कि यदि विभिन्न संस्थाएं अपनी सुविधानुसार अलग-अलग तिथियों पर रथ यात्रा आयोजित करेंगी तो इससे मूल परंपरा की एकरूपता प्रभावित होगी और श्रद्धालुओं के बीच भ्रम की स्थिति उत्पन्न होगी।
मंदिर प्रशासन का कहना है कि रथ यात्रा की तिथि सदियों से मंदिर की पारंपरिक पंचांग व्यवस्था के अनुसार निर्धारित होती रही है। इसी व्यवस्था के आधार पर स्नान पूर्णिमा, अनासार, नवयौवन दर्शन, नेत्रोत्सव और रथ यात्रा सहित सभी प्रमुख धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होते हैं।
पुरी में बढ़ रही नाराजगी
पुरी में अनेक सेवायत, धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधि तथा स्थानीय श्रद्धालु इस विषय पर खुलकर अपनी चिंता व्यक्त कर रहे हैं। उनका कहना है कि श्रीजगन्नाथ मंदिर केवल ओडिशा का नहीं बल्कि सनातन परंपरा का एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र है। ऐसे में मंदिर द्वारा निर्धारित धार्मिक तिथियों का सम्मान किया जाना चाहिए।
धार्मिक विद्वानों का मानना है कि यदि विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग तिथियों पर रथ यात्रा आयोजित होगी तो आने वाली पीढ़ियों में वास्तविक परंपरा को लेकर भ्रम उत्पन्न हो सकता है।
राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की मांग
मामले को गंभीर मानते हुए श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रबंध समिति ने केंद्र सरकार का ध्यान भी इस ओर आकर्षित किया है। समिति ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र भेजकर आग्रह किया है कि भगवान जगन्नाथ से जुड़े प्रमुख धार्मिक अनुष्ठानों के आयोजन में परंपरागत तिथियों का सम्मान सुनिश्चित किया जाए। समिति ने इस्कॉन से भी अपने कार्यक्रमों की तिथियों पर पुनर्विचार करने की अपील की है।
इस्कॉन का पक्ष
इस्कॉन का कहना है कि उसका उद्देश्य विश्वभर में भगवान जगन्नाथ, भगवान श्रीकृष्ण तथा सनातन संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना है। संस्था के अनुसार भारत में बड़ी संख्या में रथ यात्राएं परंपरागत तिथि पर ही आयोजित की जाती हैं, लेकिन विदेशों में प्रशासनिक अनुमति, सार्वजनिक अवकाश, यातायात व्यवस्था, सुरक्षा प्रबंध तथा स्थानीय कानूनों के कारण कई बार निर्धारित तिथि पर आयोजन संभव नहीं हो पाता।
संस्था का कहना है कि इन परिस्थितियों में श्रद्धालुओं तक भगवान जगन्नाथ का संदेश पहुंचाने के उद्देश्य से सुविधाजनक तिथियों पर रथ यात्रा आयोजित की जाती है।
शंकराचार्य और धार्मिक पीठों का मत
पुरी गोवर्धन पीठ सहित कई प्रमुख धार्मिक पीठों ने रथ यात्रा की पारंपरिक तिथि का समर्थन किया है। धार्मिक आचार्यों का कहना है कि सनातन धर्म में पर्वों और उत्सवों का महत्व केवल आयोजन तक सीमित नहीं होता, बल्कि उनकी तिथि भी धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। इसलिए मूल परंपरा का पालन किया जाना आवश्यक है।
रथ यात्रा का वैश्विक स्वरूप
पिछले कई दशकों में इस्कॉन ने दुनिया के अनेक देशों में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा को लोकप्रिय बनाया है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, रूस, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका सहित अनेक देशों में हजारों श्रद्धालु इस आयोजन में भाग लेते हैं। इन आयोजनों के माध्यम से भगवान जगन्नाथ की परंपरा वैश्विक स्तर पर पहुंची है और बड़ी संख्या में विदेशी श्रद्धालु भी इससे जुड़े हैं।
परंपरा और व्यवहारिकता के बीच संतुलन
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान विवाद मूलतः दो दृष्टिकोणों का प्रतिनिधित्व करता है। एक ओर पुरी की सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा और मंदिर की सर्वोच्च धार्मिक मान्यता है, जबकि दूसरी ओर वैश्विक स्तर पर विशाल आयोजनों की व्यावहारिक चुनौतियां हैं। ऐसे में दोनों पक्षों के बीच संवाद और सहमति का मार्ग निकालना भविष्य के लिए अधिक उपयुक्त माना जा रहा है।
आगे क्या?
फिलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम हैं। मंदिर प्रशासन पारंपरिक तिथि के पालन पर जोर दे रहा है, जबकि इस्कॉन अपनी वैश्विक परिस्थितियों का हवाला दे रहा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या दोनों पक्ष किसी साझा समाधान पर पहुंचते हैं या यह विवाद आगे भी धार्मिक और सामाजिक विमर्श का विषय बना रहता है।




