शक के आधार पर मतदाता सूची से नाम हटाना नागरिकता निलंबित करने जैसा: सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस

मतदाता सूची पुनरीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस शक के आधार पर नाम हटाने पर उठे गंभीर सवाल 16 दिसंबर को फिर होगी अहम सुनवाई

 

देशभर में चल रही मतदाता सूची सघन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को जोरदार बहस हुई। याचिकाकर्ताओं ने SIR की वैधानिकता पर सवाल उठाते हुए कहा कि सिर्फ शक के आधार पर किसी का नाम मतदाता सूची से हटाना, नागरिकता को निलंबित करने जैसा कदम है। यह दलीलें तमिलनाडु CPI(M) के राज्य सचिव पी. शनमुगम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने पेश कीं।

 

कोर्ट का रुख: प्रक्रियागत खामियों से परे देखने की जरूरत

इन तर्कों पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि SIR को केवल प्रक्रियागत खामियों के आधार पर नहीं परखा जा सकता, क्योंकि चुनाव आयोग यह काम 20 साल बाद कर रहा है। पीठ ने कहा: “अगर चुनाव आयोग हर साल मतदाता सूची को कॉपी-पेस्ट करना ही शुरू कर दे, तब क्या होगा?” हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह अभी कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दे रही, बल्कि केवल सवाल पूछ रही है।अगली सुनवाई 16 दिसंबर को निर्धारित।

 

चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व क्या?

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बाग्ची की बेंच SIR की संवैधानिकता पर लगातार सुनवाई कर रही है। बहस के दौरान राजू रामचंद्रन ने कहा कि चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को सुरक्षित और सुविधाजनक बनाना है। मतदान की तीन प्रमुख शर्तें उम्र, निवास और नागरिकता, समान रूप से महत्वपूर्ण हैं, और इन शर्तों को पूरा करने वाले हर व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल करना चुनाव आयोग का कर्तव्य है।

 

‘शक’ के आधार पर कार्रवाई पर चिंता

रामचंद्रन ने यह भी कहा कि उद्देश्य गैर-नागरिकों को हटाना नहीं है, लेकिन ‘शक’ की सोच से प्रक्रिया शुरू करना ही मूल समस्या है, क्योंकि इससे मतदाता का अधिकार प्रभावित हो सकता है।

 

धारा 21(3) का हवाला

उन्होंने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21(3) का भी हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट है कि मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए कारण दर्ज करना अनिवार्य है।

Related Articles

Back to top button