निजी सेक्टर में आरक्षण पर बड़ा कदम, सांसद धर्मेंद्र यादव ने पेश किए दो ऐतिहासिक प्राइवेट मेंबर विधेयक

निजी क्षेत्र की नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण लागू करने की ऐतिहासिक पहल SC–ST–OBC प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए दो प्राइवेट मेंबर विधेयक पेश सामाजिक न्याय को सरकारी दफ्तरों से निकालकर हर सेक्टर तक ले जाने का प्रयास

नई दिल्ली: संसद के सत्र में आज एक ऐतिहासिक पहल देखने को मिली, जब समाजवादी विचारधारा से प्रेरित सांसद ने सामाजिक न्याय को निजी क्षेत्र तक ले जाने के उद्देश्य से दो प्राइवेट मेंबर विधेयक पेश किए। यह दिन उनके लिए भी खास रहा, क्योंकि उन्होंने इसे “अंबेडकर–लोहिया के विचारों और नेताजी के मार्ग पर चलने की दिशा में निर्णायक कदम” बताया। आदरणीय अखिलेश यादव जी के नेतृत्व में तैयार किए गए ये विधेयक सामाजिक न्याय की लड़ाई को सरकारी संस्थानों के दायरे से बाहर निकालकर देश के हर रोजगार और शैक्षणिक अवसर तक पहुँचाने की कोशिश हैं।

 

पहला विधेयक: निजी क्षेत्र की नौकरियों में SC–ST–OBC आरक्षण अनिवार्य करने का सुझाव

पहला विधेयक निजी क्षेत्र की कंपनियों, सर्विस सेक्टर और नियुक्तियों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण सुनिश्चित करने का प्रस्ताव रखता है। मौजूदा समय में देश की बड़ी आबादी का रोजगार निजी हाथों में है, ऐसे में प्रतिनिधित्व के बिना “समान अवसर” का अधिकार अधूरा माना जाता है।

यह विधेयक उसी ऐतिहासिक खाई पर प्रहार करता है, जिसने रोजगार को एक मुनाफ़ावादी ढांचे में बदलकर सामाजिक न्याय की अवधारणा को कमजोर किया है।

 

दूसरा विधेयक: निजी, सहायता प्राप्त और गैर-सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का प्रावधान

दूसरे विधेयक में प्राइवेट, एडेड और अनएडेड शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के दौरान SC–ST–OBC छात्रों के लिए आरक्षण अनिवार्य करने का सुझाव दिया गया है। जब देश की शिक्षा व्यवस्था का बड़ा हिस्सा निजी संस्थानों के अधीन हो चुका है, ऐसे में सामाजिक प्रतिनिधित्व के बिना शिक्षा एक महंगी और असमान व्यवस्था बन जाती है।

यह विधेयक शिक्षा को अधिकार के रूप में मजबूत करता है और उसे बाज़ार के दायरे में सिमटने से रोकने का प्रयास है।

 

“यह कदम संविधान की आत्मा और मंडल आंदोलन की लड़ाई को आगे बढ़ाता है”

सांसद ने संसद में कहा कि ये दोनों विधेयक संविधान की आत्मा  समानता, न्याय और सामाजिक लोकतंत्र को मजबूत करने वाले हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जब रोज़गार और शिक्षा दोनों निजी क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहे हों, तब सामाजिक न्याय को केवल सरकारी दफ्तरों में सीमित रखना उचित नहीं है। इन विधेयकों को प्रतिनिधित्व के लोकतंत्रीकरण की दिशा में ऐतिहासिक पहल करार दिया जा रहा है।

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