भारत में बदल रहा स्कूली शिक्षा का चेहरा
निजी स्कूलों में बढ़े छात्र, सरकारी स्कूलों में घटा नामांकन
नई दिल्ली। देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में पिछले कुछ वर्षों के दौरान बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। यूडीआईएसई+ (Unified District Information System for Education Plus) 2025-26 के आंकड़ों की 2022-23 के आंकड़ों से तुलना में सामने आया है कि निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जबकि सरकारी स्कूलों में नामांकन में गिरावट दर्ज की गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले तीन वर्षों में निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में छात्रों के नामांकन में 17 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वहीं, इसी अवधि में सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या करीब 13 प्रतिशत कम हुई है। यह बदलाव देश में अभिभावकों की बदलती पसंद और शिक्षा के विकल्पों में आ रहे परिवर्तन को दिखाता है।
निजी स्कूलों में बढ़ी शिक्षकों की संख्या
छात्रों के नामांकन के साथ ही शिक्षकों की संख्या में भी निजी और सरकारी स्कूलों के बीच अंतर देखने को मिला है। निजी स्कूलों में शिक्षकों की संख्या में करीब **17 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की संख्या में केवल 5 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
शिक्षा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि निजी स्कूलों में बढ़ते नामांकन के पीछे बेहतर सुविधाओं की उम्मीद, अंग्रेजी माध्यम की मांग, छोटे शहरों और कस्बों में निजी संस्थानों की बढ़ती पहुंच और अभिभावकों की बदलती प्राथमिकताएं अहम कारण हो सकते हैं।
माध्यमिक स्तर पर 7 प्रतिशत छात्र छोड़ रहे पढ़ाई
यूडीआईएसई+ रिपोर्ट में स्कूल छोड़ने वाले विद्यार्थियों (ड्रॉपआउट) की स्थिति पर भी जानकारी दी गई है। देश में माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 7 प्रतिशत दर्ज की गई है।
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इसमें काफी अंतर है। रिपोर्ट के अनुसार, लद्दाख और कर्नाटक में माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने की दर सबसे अधिक रही। यह स्थिति उन क्षेत्रों में छात्रों को स्कूल से जोड़े रखने की चुनौती को सामने लाती है।
स्कूलों में लड़कियों की भागीदारी बढ़ी, लेकिन अंतर कायम
लैंगिक अनुपात के आंकड़ों के अनुसार, देश के स्कूलों में प्रत्येक 1000 लड़कों पर 938 लड़कियां नामांकित हैं। यह आंकड़ा शिक्षा में लड़कियों की भागीदारी को दर्शाता है, हालांकि लड़कों और लड़कियों के नामांकन के बीच अभी भी अंतर बना हुआ है।
सरकारी स्कूलों के सामने गुणवत्ता और भरोसे की चुनौती
सरकारी स्कूल लंबे समय से देश की शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ रहे हैं, लेकिन घटते नामांकन ने इनके सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। कई राज्यों में सरकारी स्कूलों को छात्रों की संख्या बनाए रखने, आधारभूत सुविधाओं में सुधार और शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने पर जोर देना पड़ रहा है। वहीं, निजी स्कूलों का विस्तार यह संकेत देता है कि शिक्षा क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में शिक्षा की गुणवत्ता, समान अवसर और छात्रों की पहुंच को किस तरह मजबूत किया जाता है।
यूडीआईएसई+ 2025-26 के आंकड़े देश की स्कूली शिक्षा में बदलते रुझानों की तस्वीर पेश करते हैं—जहां निजी स्कूलों की भागीदारी बढ़ रही है, वहीं सरकारी स्कूलों को अपनी भूमिका और प्रभाव को मजबूत करने की जरूरत है।



