महिला पत्रकारों के बॉयकॉट के बाद फंस गया तालिबानी मंत्री, देने लगा सफाई..

9 अक्टूबर 2025 को दिल्ली के अफगान दूतावास में जो हुआ, उसे देखकर सीधा यही कहेंगे — शर्मनाक और घिनौना। तालिबान के विदेश मंत्री मावलवी अमीर खान मुत्तकी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिला पत्रकारों को अंदर जाने से रोक दिया गया और पुरुष पत्रकारों को बुला लिया गया। कोई protocol? नहीं। कोई पब्लिक अफेयर की मर्यादा? कहीं नज़र नहीं आई। और जब लोग सिर उठा कर बोले तो तालिबानी प्रवक्ता ने कहा — “यह तो तकनीकी मामला था।” हाह! तकनीकीवाद भी कभी-कभी खूब शर्मनाक होता है।

क्या हुआ — प्रेस कॉन्फ्रेंस का पूरा झमेला

9 अक्तूबर की ब्रीफिंग में महिला पत्रकारों को दखल नहीं दिया गया या कहा गया कि वे पर्दे के पीछे बैठें — जो कि किसी भी सभ्य मुल्क की शान के ख़िलाफ़ है। कुछ ने कहा कि पास और सीट सीमित थे; पर सवाल ये कि जब सीमाएँ हों, तो लिंग के आधार पर भेदभाव कैसे न्यायसंगत ठहराया जा सकता है? महिला पत्रकारों ने ठान लिया — इतना अपमान किसे बर्दाश्त करना है?

सोशल मीडिया पर आग — वरिष्ठ पत्रकारों की फटकार

सोशल मीडिया पर तो जैसे आग लग गई। कई वरिष्ठ पत्रकारों ने खुलेआम तालिबानी रवैये की निंदा की। स्मिता शर्मा ने सीधे-सीधे कहा कि दिल्ली में भी महिला पत्रकारों की “नो एंट्री” कैसे हो सकती है — मतलब, किस जमाने में आ गए हम? विनीता यादव ने कहा कि ऐसे लोगों को कोई प्रोटोकॉल नहीं मिलना चाहिए — और हम सहते क्यूँ रहें? लोगों ने तंज़ में कहा — तालिबान आया तो क्या यहां तलाबंदी का नया दौर शुरू हो गया?

IWPC ने किया ऐलान

Indian Women’s Press Corps (IWPC) ने 11 अक्तूबर 2025 को पक्का प्रेस नोट जारी किया और घटना की कड़ी निंदा की। संस्था ने इसे भेदभावपूर्ण बताया और सरकार से इस पर कड़ा रुख अपनाने का अनुरोध किया — मतलब सिर्फ ट्विटर पर भड़कने से काम नहीं चलेगा, प्रोफेशनल बॉडी ने भी कहा कि इसको उठाओ। प्रेस नोट पर Sujata Raghavan और Aditi Bhal के साइन मौजूद हैं — हाँ, दस्तावेज़ी प्रमाण भी है।

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तालिबान की “सफाई” — तकनीकी वजह? बस बहाना!

तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने कहा कि यह किसी नीति का हिस्सा नहीं था, बल्कि “तकनीकी” वजहें थीं — सीटें और पास सीमित थे। और साथ में कहा गया कि मुत्तकी काबुल में महिला पत्रकारों से बातें करते हैं, इसलिए इसे बढ़ा-चढ़ा कर नहीं लेना चाहिए। भाई साहब, बात यह है कि इतिहास और रवैये को भी देखो — जब किसी समूह के शासन में महिलाओं के अधिकारों पर हमेशा उँगली रहे, तो ऐसे बहानों पर भरोसा कैसे कर लिया जाए?

यह मामला सिर्फ ‘एक आयोजन’ नहीं — बड़ा संदेश जा रहा है

देखिये, अगर किसी दूतावास ने सार्वजनिक मंच पर महिला पत्रकारों को अलग रखा — तो यह सिर्फ एक आयोजन का मसला नहीं रह जाता। यह संदेश देता है कि महिला आवाज़ें दब सकती हैं। और जब वो प्रतिनिधि वही हों जिन पर पहले से ही महिलाओं के अधिकारों पर सवाल उठते हैं, तो यह और भी ज़्यादा गंभीर है — अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह एक बुरी छवि बनाता है।

कूटनीतिक और मीडिया के संभावित कदम — अब क्या होने वाला है?

  • IWPC ने सरकार से दखल करने को कहा — मतलब दूतावास से स्पष्टीकरण और अगर ज़रूरी हुआ तो कूटनीतिक स्तर पर सवाल।

  • मीडिया हाउस मिलकर अगली बार किसी भी ऐसे आयोजन में कड़ा रुख अपना सकते हैं — collective boycott, प्रेस नोट, या शर्तें।

  • अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार समूह और मीडिया watchdogs इसे उठा सकते हैं — जिससे तालिबान पर और दबाव बनेगा।

‘टेक्निकल’ बहाने से आंखें मूँदना बंद करो

यह कोई छोटा मामला नहीं है। “सीट कम थी” कहकर छिपाने की कोशिश मत करो — यह यही दिखाता है कि तालिबान जैसा रवैया किस हद तक असभ्य और असंवेदनशील है। मीडिया और नागरिक समाज इस पर चुप नहीं बैठेंगे। अगर किसी को लगता है कि यहां आकर महिलाएं ज़रूर पीछे खड़ी रहेंगी — उन्हें सख्त झटका मिलेगा।

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