Exclusive: ‘अखिलेश यादव को बांधना था!’ भाजपा मंत्री ने खोल दिए BSP और BJP के होश उड़ाने वाले राज, सुनिए जो कहा..!

न्यूज़ नशा की फाउंडर और जानी-मानी पत्रकार विनीता यादव के साथ एक खास पॉडकास्ट इंटरव्यू में केंद्रीय मंत्री और आगरा से सांसद एसपी सिंह बघेल ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए। राजनीति से लेकर निजी जीवन तक की बातचीत में सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब उनसे पूछा गया कि आखिर वह क्यों बार-बार अखिलेश यादव के खिलाफ चुनावी मैदान में उतरते हैं, जबकि हार की संभावना हमेशा अधिक रहती है।
“हर चुनाव जीतने के लिए नहीं होता…” – बघेल
इस सवाल पर बघेल ने बेहद ही साफ और सटीक जवाब दिया। उन्होंने कहा –
“हर चुनाव जीतने के लिए नहीं होते, कुछ चुनाव बांधने के लिए भी होते हैं, खूंटे से बांधने के लिए, परेशान करने के लिए, घेरने के लिए, प्रचार न करने देने के लिए, उनको वहीं पर सीमित रखने के लिए।”
उनका यह बयान न केवल चुनावी राजनीति की चालबाजियों को उजागर करता है बल्कि यह भी बताता है कि कैसे बड़े नेताओं को ‘व्यस्त रखने की रणनीति’ बनाई जाती है।
दो बार अखिलेश से हार, लेकिन राजनीति का बड़ा मकसद
एसपी सिंह बघेल का राजनीतिक सफर कई उतार-चढ़ाव भरा रहा है।
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2009 लोकसभा चुनाव (फिरोजाबाद): BSP उम्मीदवार के तौर पर बघेल ने अखिलेश यादव का सामना किया और करीब 67,000 वोटों से हार गए।
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2022 विधानसभा चुनाव (करहल): इस बार BJP उम्मीदवार बने, लेकिन नतीजा वही रहा। अखिलेश ने उन्हें लगभग 67,504 वोटों से हराया।
यानि दो अलग-अलग पार्टियों से चुनाव लड़े, दो बार हारे, लेकिन मकसद सिर्फ अखिलेश को व्यस्त रखना था।
बलि का बकरा या पार्टी का रणनीतिक खिलाड़ी?
जब विनीता यादव ने उनसे पूछा कि क्या वह अपनी पार्टियों के “बलि का बकरा” बने, तो बघेल ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया –
“ये तो गर्व करने वाली बात है कि इतनी बड़ी कैबिनेट में मुझे इस लायक समझा गया कि मैं ही इस कठिन काम को बेहद आसान तरीके से कर सकता हूँ।”
यानि बघेल खुद को बलि का बकरा नहीं बल्कि पार्टी का रणनीतिक योद्धा मानते हैं, जिन्हें सबसे मुश्किल काम सौंपा जाता है।
पॉलिटिक्स में “बांधने की रणनीति” क्यों होती है ज़रूरी?
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि जब किसी नेता का प्रभाव चुनाव में बड़ा माना जाता है, तो विरोधी दल उसे उसी सीट पर बाँधने की रणनीति अपनाते हैं। इसका मकसद यह होता है कि वह नेता पूरे राज्य में प्रचार न कर सके और केवल एक क्षेत्र तक सीमित रह जाए।
बघेल के मामले में भी यही हुआ। पहले BSP और बाद में BJP ने उन्हें अखिलेश के सामने उतारकर यह सुनिश्चित किया कि अखिलेश का ध्यान पूरे चुनाव प्रचार से हटकर करहल और फिरोजाबाद पर ही केंद्रित रहे।
बघेल की राजनीतिक यात्रा
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1998–2009: समाजवादी पार्टी (SP) से जुड़े।
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2010–2014: बहुजन समाज पार्टी (BSP) में रहे।
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2014–वर्तमान: भारतीय जनता पार्टी (BJP) का हिस्सा।
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2024 लोकसभा चुनाव: आगरा (SC) से बीजेपी के टिकट पर जीते और 18वीं लोकसभा के सदस्य बने।
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वर्तमान में वे केंद्रीय राज्यमंत्री (मत्स्य पालन, पशुपालन, डेयरी और पंचायती राज मंत्रालय) हैं।
एसपी सिंह बघेल का यह बयान कि “हर चुनाव जीतने के लिए नहीं होते, कुछ बांधने के लिए होते हैं” न सिर्फ एक राजनीतिक रणनीति को उजागर करता है बल्कि भारतीय राजनीति के उन पहलुओं पर भी रोशनी डालता है जिन पर कम ही चर्चा होती है।
जहां विरोधियों को “बांधने” की नीति अपनाई जाती है, वहीं बघेल जैसे नेता इसे “गौरवपूर्ण जिम्मेदारी” मानते हैं।
👉 यह इंटरव्यू बताता है कि भारतीय राजनीति सिर्फ जीत-हार तक सीमित नहीं, बल्कि उसमें कई बार रणनीतिक बलिदान भी शामिल होते हैं।



