सियासत का ‘आया राम, गया राम’ दौर: जब 4 साल में गिरीं 45 सरकारें, लोकतंत्र बन गया था मजाक!
सियासी बेशर्मी का इतिहास: जब कुछ घंटों में पार्टियां बदलकर 'गया लाल' बन गए 'आया राम, गया राम'! 4 साल में 45 सरकारें और 1800 दलबदलू विधायक; कुर्सी के लिए लोकतंत्र को बनाया गया था खिलौना। दलबदल कानून के पीछे की पूरी कहानी: 1967 का वो दौर जिसने मजबूर किया सख्त नियम बनाने को।

Politics: आज हम दलबदल कानून की बात करते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारतीय राजनीति में एक दौर ऐसा भी था जब नेता सुबह एक पार्टी की चाय पीते थे और शाम को दूसरी पार्टी का डिनर? 1967 से 1971 के बीच भारत ने वो ‘सियासी सर्कस’ देखा, जिसने लोकतंत्र की नींव हिला दी थी।
हरियाणा से शुरू हुआ ‘रिकॉर्ड तोड़’ खेल
दलबदल की इस बेशर्म राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा बने हरियाणा के विधायक गया लाल। 1967 में उन्होंने रिकॉर्ड बना दिया महज 9 घंटों के भीतर तीन बार पार्टी बदली! इसी घटना के बाद भारतीय राजनीति में ‘आया राम, गया राम’ मुहावरा मशहूर हो गया।
Politics: जब कुर्सी के लिए बिकने लगे विधायक!
आंकड़े इतने डरावने हैं कि आप दंग रह जाएंगे: 4 साल, 45 सरकारें: 1967 से 1971 के बीच देश ने 45 सरकारों को बनते और बिगड़ते देखा। 1800 बागी: इस छोटे से कालखंड में 1800 से ज्यादा विधायकों ने अपनी निष्ठा बदली। मंत्री पद का लालच: दलबदल कोई विचारधारा की लड़ाई नहीं थी, बल्कि सौदेबाजी थी। हर 8 में से 1 बागी विधायक को ईनाम के तौर पर मंत्री की कुर्सी दी गई।
राष्ट्रपति शासन: अस्थिरता इतनी बढ़ी कि 16 बार राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा।
Politics: बिहार से पंजाब तक… सिर्फ सत्ता का ‘दंगल’
उत्तर भारत के राज्य दलबदल की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बन गए थे: बिहार: 1967-71 के बीच यहाँ 9 बार मुख्यमंत्री बदले गए। संविद सरकारें: विचारधारा को ताक पर रखकर दक्षिणपंथी और वामपंथी एक साथ आए, लेकिन अंतर्विरोधों के कारण ये सरकारें ताश के पत्तों की तरह ढह गईं। प्रशासनिक फेलियर: जब सरकारें ही नहीं टिक रही थीं, तो विकास और कानून-व्यवस्था भगवान भरोसे थी।
कैसे लगा इस ‘बीमारी’ पर ब्रेक?
लोकतंत्र को इस मज़ाक से बचाने के लिए 1968 में एक कमेटी बनी। लेकिन कानून बनते-बनते सालों लग गए। आखिरकार 1985 में राजीव गांधी सरकार ने ‘दलबदल विरोधी कानून’ (Anti-Defection Law) पास किया, जिसे 2003 में और भी सख्त बनाया गया।
न्यूज़ नशा की बात:
Politics: कानून तो आ गया, लेकिन आज भी ‘इस्तीफों’ और ‘ऑपरेशन लोटस’ जैसे शब्दों ने दलबदल को नया रूप दे दिया है। क्या वाकई हमारे नेता जनता के वोट का सम्मान करना सीख पाए हैं?
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