बड़ी खबर: यूपी में आपस में भिड़े BJP के मेयर-पार्षद, विपक्षी खेमे में बैठे नाराज भाजपाई.. दलित सांसद का अपमान?

लखनऊ नगर निगम के सदन में गुरुवार को उस समय सियासी बवाल खड़ा हो गया जब भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पार्षद मुकेश सिंह मोंटी महापौर सुषमा खर्कवाल से नाराज़ होकर अचानक विपक्ष की दीर्घा में जा बैठे। इस कदम ने पूरे सदन में हलचल मचा दी। विपक्ष ने भी इस मौके को भुनाते हुए महापौर पर गंभीर आरोप लगाए। कांग्रेस और सपा पार्षदों ने इस घटनाक्रम को भाजपा की अंदरूनी कलह बताते हुए तंज कसे।

महापौर पर बजट में मनमर्जी का आरोप

BJP पार्षद मुकेश मोंटी ने महापौर सुषमा खर्कवाल पर आरोप लगाया कि उन्होंने बजट में मनमाने तरीके से संशोधन किया। इस पर मोंटी ने जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाने की मांग रखी, जिसमें दो सदस्य सत्ता पक्ष से और एक सदस्य विपक्ष से हो।
महापौर ने इस मांग को खारिज करते हुए कहा कि समिति गठन का अधिकार केवल उन्हीं का है। इस पर विवाद और बढ़ गया और मोंटी विपक्षी खेमे में जाकर बैठ गए।

सांसद का नाम शिलापट्ट से गायब, दलित अपमान का आरोप

सदन में हंगामा उस समय और बढ़ गया जब कांग्रेस पार्षद मुकेश सिंह चौहान ने आरोप लगाया कि मोहनलालगंज के दलित सांसद आर.के. चौधरी का नाम विकास कार्यों के शिलापट्ट पर नहीं डाला गया।
उन्होंने इसे दलित समाज का अपमान बताते हुए जोरदार विरोध किया। विपक्ष ने महापौर से इस पर जवाब मांगा। काफी देर की नारेबाजी और हंगामे के बाद महापौर ने आश्वासन दिया कि सांसद का नाम शिलापट्टों पर जोड़ा जाएगा। इसके बाद माहौल कुछ शांत हुआ।

विपक्ष ने खोला नया मोर्चा, दी पेशकश

मुकेश मोंटी के विपक्षी दीर्घा में बैठने के बाद सपा और कांग्रेस पार्षदों ने मौके का फायदा उठाते हुए उन्हें अपनी पार्टी में शामिल होने का निमंत्रण दिया। सपा पार्षद कामरान बेग ने दावा किया कि 2027 तक कई भाजपा पार्षद समाजवादी पार्टी से जुड़ेंगे।
यह बयान नगर निगम की राजनीति में नए समीकरण बनने की ओर इशारा करता है।

सदन में नोकझोंक और माहौल गर्म

पूरा घटनाक्रम करीब 45 मिनट तक चलता रहा। भाजपा और विपक्षी पार्षदों के बीच तीखी नोकझोंक होती रही। पुलिस और सुरक्षाकर्मियों को बीच-बचाव करना पड़ा। सदन का कामकाज बाधित रहा और कई महत्वपूर्ण एजेंडे हंगामे के कारण अधर में लटक गए।

राजनीतिक असर और अंदरूनी कलह का संकेत

लखनऊ नगर निगम की इस घटना ने यह साफ कर दिया कि भाजपा के भीतर असंतोष और गुटबाजी खुलकर सामने आ रही है। विपक्ष इसे भाजपा की कमजोर पड़ती पकड़ के रूप में पेश कर रहा है। वहीं, सत्ता पक्ष इस पूरे विवाद को ‘व्यक्तिगत नाराज़गी’ करार देकर संभालने की कोशिश कर रहा है।
यह प्रकरण आने वाले समय में नगर निगम की राजनीति पर गहरा असर डाल सकता है।

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