आज करवाचौथ पर चांद कितने बजे निकलेगा ? सुहागनों को करना पड़ सकता है इंतजार ? जानिए आपके शहर की टाइमिंग!

करवा चौथ हिंदू विवाहित महिलाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण व्रतों में से एक है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना करती हैं। 2025 में करवा चौथ का पर्व 10 अक्टूबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा। देशभर में महिलाएं सूर्योदय से लेकर चांद निकलने तक निर्जला व्रत रखेंगी।

शुभ मुहूर्त और पूजा का समय

हिंदू पंचांग के अनुसार, करवा चौथ 2025 की चतुर्थी तिथि कार्तिक कृष्ण पक्ष में पड़ेगी।
इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:56 बजे से 7:10 बजे तक रहेगा।
व्रत के बाद चंद्र दर्शन (Moon Rise Time) का समय रात 8:14 बजे बताया गया है।
हालांकि, विभिन्न शहरों में यह समय कुछ मिनटों का अंतर लेकर बदल सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग या मौसम विभाग से सही समय अवश्य जांचें।

पूजा विधि: कैसे करें करवा चौथ का व्रत

करवा चौथ की पूजा को परंपरा और शुद्धता के साथ किया जाना चाहिए। व्रत रखने वाली महिलाएं प्रातः स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेती हैं। शाम के समय पूजा के लिए लाल वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है।
पूजा के दौरान —

  • मिट्टी के करवे (मटके) में पानी भरकर रखें।

  • भगवान शिव, माता पार्वती, गणेश जी और कार्तिकेय की पूजा करें।

  • कुमकुम, रोली, चावल, दीपक, फल और मिठाई अर्पित करें।

  • पूजा कथा सुनें और फिर चांद निकलने पर चंद्रमा को अर्घ्य देकर पति का मुख देखकर व्रत खोलें।

यह पूरी विधि पति-पत्नी के बीच प्रेम और समर्पण के प्रतीक के रूप में मानी जाती है।

चांद निकलने का समय और व्रत खोलने की परंपरा

2025 में करवा चौथ पर चांद रात 8:14 बजे निकलेगा।
चांद निकलते ही महिलाएं छलनी के जरिए चंद्रमा को देखती हैं, फिर अपने पति का दर्शन करती हैं।
इसके बाद पति के हाथ से जल ग्रहण कर व्रत खोला जाता है।
इस पारंपरिक विधि से व्रत खोलने को सौभाग्य और वैवाहिक सुख का प्रतीक माना गया है।

क्या करें और क्या न करें

  • व्रत के दौरान संयम और श्रद्धा बनाए रखना आवश्यक है।

  • चांद निकलने से पहले व्रत खोलना अशुभ माना जाता है।

  • पूजा के समय सिंदूर, लाल चूड़ी, और करवा चौथ की कथा का पाठ अवश्य करें।

  • यदि मौसम खराब हो और चांद न दिखे, तो पंचांग में बताए गए निर्धारित समय पर व्रत खोला जा सकता है।

धार्मिक महत्व और विश्वास

करवा चौथ केवल व्रत नहीं, बल्कि पति-पत्नी के बीच अटूट प्रेम और आस्था का प्रतीक है।
पुराणों में बताया गया है कि देवी पार्वती ने स्वयं भगवान शिव के लिए इस व्रत को रखा था, जिसके बाद इसे “अखंड सौभाग्य का पर्व” कहा गया।

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