भारतीय राजनीति में वंशवाद का डेजा बू

–  ए॰ एम॰ कुणाल

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद बॉलीवुड में परिवारवाद को लेकर जो बहस चालू हुई है, उसने वंशवाद की राजनीति के मुद्दे को पीछे छोड़ दिया है। पिछले दो माह से सभी जगह सुशांत सिंह का मामला छाया हुआ है। वह तो भला हो सोनिया गांधी को लिखी चिट्ठी का, जिसके लीक होने के बाद परिवारवाद को लेकर राजनीति गर्म है। कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में सोनिया गांधी की नाराजगी खुलकर सामने आई। सोनिया ने अंतरिम अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी से खुद को मुक्त कर किसी और को जिम्मेदारी सौपने की बात की थी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद, मुकुल वासनिक, आनंद शर्मा और कपिल सिब्बल के पास एक अच्छा मौका था, पर 1996 की तरह एक बार फिर वे थक हार कर नेहरु – गांधी परिवार के सामने नतमस्तक हो गए।

2019 की हार के लिए राहुल गांधी ने पार्टी नेताओं के पुत्र मोह को मुख्य कारण बताकर वंशवाद की राजनीति पर सवाल उठाए थे। राहुल ने साफ तौर से पी चिदंबरम, कमलनाथ और अशोक गहलोत का नाम लेते हुए कहा था कि इन नेताओं ने पार्टी हित से ज्यादा अपने पुत्र प्रेम को तवज्जों दिया हैँ। राहुल के बंद कमरे के अन्दर कही गई बात के बाहर आ जाने से इस मामले को और भी तूल मिल गया था I अपने कई साक्षात्कार में वंशवाद को जायज ठहराने वाले राहुल गांधी का यह बयान वाकई में काफी दिलचस्प है। हालांकि इस बात का जवाब भारतीय जनता पार्टी के पास भी नहीं है। अगर राहुल गांधी की पराजय वंशवाद की हार है, तो वरुण गांधी की जीत के मायने क्या हैँ?

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद वंशवाद के मुद्दे को लेकर पहले आक्रमणकारी रही भाजपा ने कहना शुरु कर दिया था कि यह वंशवादी राजनीति की हार है। भारतीय राजनीति में वंशवाद की परंपरा शुरू से ही रही है। वह चाहे स्वतंत्रता की लड़ाई में अहम भूमिका निभाने वाली कांग्रेस पार्टी हो या दूसरे राष्ट्रीय या क्षेत्रीय दल हो, हर जगह  संगठन और आम कार्यकर्ता से ज्यादा पार्टी के सुप्रीम नेता अपने परिवार को तवज्जों देते हैं। हालांकि इस परम्परा को शुरू करने का श्रेय कांग्रेस को जाता है और उसके ऊपर आरोप भी लगते रहे है कि कांग्रेस पार्टी “गांधी – नेहरू” नाम की बैशाखी के सहारे चल रही है। जिसके कारण दूसरा कोई नेता तैयार नही हो पाया। जो नेता तैयार भी हुए, उनका कद नेहरू – गांधी परिवार के आगे हमेशा बौना ही रखा गया। चाहे जवाहरलाल नेहरू हों या इंदिरा गांधी, दोनों पर ही वंशवाद की परंपरा को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया जाता है। हालांकि पं. नेहरु ने इंदिरा के बजाय सरदार पटेल के बेटे और बेटी को पार्टी का सांसद बनाया था।नेहरु जी के जीते जी इंदिरा कभी चुनावी राजनीति में नही आई। नेहरु जी के बाद शास्त्री जी ने देश का कमान संभाला था और उनकी मृत्यु के बाद इंदिरा भारत की प्रधानमंत्री बनी थी।

इंदिरा गांधी को वंशवाद के आरोप से बरी नहीं किया जा सकता है। इंदिरा ने पहले अपने छोटे बेटे संजय गांधी को राजनीति में उतारा और संजय की मृत्यु के बाद जब राजनीतिक विरासत का संकट पैदा हो गया तब सियासत से दूर रहने वाले अपने बड़े बेटे राजीव गांधी को अपना उत्तराधिकारी बनाया। इंदिरा गांधी की मौत के बाद राजीव गांधी को कांग्रेस की बागडोर सौंपना, कांग्रेस की व्यक्तिवादी सोच का ही परिणाम था। राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस को वंशवाद की परंपरा से कुछ वर्षो के लिए मुक्ति जरुर मिली, पर उस दौरान कांग्रेस की स्थिति वैशाखी के सहारे चलने वाले इंसान सी थी। 1996 के चुनाव में हार के बाद थक हार कर कांग्रेसी नेताओं ने फिर से नेहरु – गांधी परिवार की शरण में जाना ही बेहतर समझा।

पीएम का पद ठुकरा कर त्याग की प्रतिमूर्ति बनी सोनिया गांधी ने जब कांग्रेस का अध्यक्ष पद संभाला था, उस वक्त उनके सामने संगठन से ज्यादा नेहरु-गांधी परिवार के विरासत की चिंता थी। जिस विरासत के असली वारिस राहुल और प्रियंका गांधी हैं। यदि कांग्रेस अगली बार सत्ता में वापसी करती है, तो 35 साल बाद कोई गांधी परिवार का प्रधनमंत्री बन सकता है। हालांकि 2019 के चुनाव के वक्त पीएम पद के सवाल पर राहुल गांधी ने कहा था कि जनता मालिक है। अब देखना है कि देश की जनता उन पर कब मेहरबान होती है।

गांधी परिवार के अलावा भी कांग्रेस के कुछ नेता है जिनका परिवार वर्षो से राजनीति का केंद्र बिन्दु रहा है लेकिन गांधी परिवार के बड़े कद के कारण पार्टी पर उनकी पकड़ कमजोर है। यही वजह है कि उन्हे समय-समय पर दस जनपथ के प्रति अपनी निष्ठा का प्रमाण देना पड़ता है। वह चाहे शीला दीक्षित हों, भूपेंद्र सिंह हुड्डा हों,  कैप्टन अमरिंदर सिंह हों, कमलनाथ हों या अशोक गहलोत, किसी की निष्ठा पर सवाल खड़ानही किया जा सकता पर विरासत के सवाल पर उनके पुत्र मोह से इंनकार भी नहीं किया जा सकता।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे  स्व. राजेश पायलट और स्व. माधवराव सिंधिया, इन लोगों ने कुशल नेतृत्व क्षमता का परिचय देते हुए पार्टी के दूसरे पंक्ति के नेताओं में अपनी मौजूदगी दर्ज करायी थी। राजेश पायलट के पुत्र सचिन पायलट अपने पिता के राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी है और इस बात पर किसी को ऐतराज भी नही है। वहीं माध्वराव  सिंधिया के पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया को दूसरे वरिष्ठ नेताओं को दर किनार कर मनमोहन सरकार में मंत्री बनाया जाना वंशवादी परम्परा का ही परिणाम था। इस बार चुनाव हारने के बाद भाजपा में चले गए सिंधिया की विरासत पर अब कोई सवाल नहीं उठा सकता।

स्वर्गीय शीला दीक्षित के पुत्र संदीप दीक्षित की दिल्ली की राजनीति में भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भले ही वे दौड़ में कही नहीं है पर शीला दीक्षित ने अपने पुत्र के लिए जमीन तैयार करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा अपने पुत्र दीपेंद्र हुड्डा को प्रमोट कर रहे है। जबकि पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह अपने पुत्र रामिंदर सिंह को राजनीति में आगे लाने की कोशिश कर रहे हैं। राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत हो या मघ्य प्रदेश के पूर्व सीएम कमलनाथ दोनों ने ही इस बार के चुनाव में अपने पुत्र मोह को पार्टी से ऊपर रखा। ऐसे में दस जनपथ के करीबी दूसरे नेता भला पुत्र मोह से कैसे बच सकते है। हर कोई अपने पुत्र को अपना भावी उत्तराधिकारी बनाने की जुगत में लगा हैं

गांधी परिवार की तरह ही दूसरे राजनेता भी अपनी राजनीतिक विरासत को महफूज रखने के लिए कमर कसना शुरु कर दिया है। कुछ नेताओं ने तो राजनीति से सन्यास लेने के पूर्व ही अपने उत्तराध्किारी की घोषणा कर दी है। एम. करुणानिधि, फारुख अब्दुला, मुफ्ती मोहम्मद सईद, शरद पवार आदि ने तो सर्वाजनिक तौर अपने बच्चों के नाम पर समय से पहले मोहर लगा दिया था। दूसरे और कई नेता ऐसे भी है जो नेतृत्व की नई पौध तैयार करने में जुटे हैं।

कांग्रेस पर वंशवाद का आरोप लगाने और सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को हवा देने वाले शरद पवार को भी अपनी राजनीतिक विरासत की चिंता है। शरद पवार अपनी लोकसभा सीट बेटी सुप्रिया के लिए छोड़ कर इस बात का संकेत दे दिया था कि वे भी गांधी परिवार से पीछे नहीं है। सुप्रिया से पहले शरद पवार के भतीजे अजित पवार को उनके वारिस के तौर पर देखा जाता था। लेकिन अपनी बेटी को आगे कर शरद पवार ने साफ कर दिया है कि उनके बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की बांगडोर सुप्रिया सुले के हाथों में होगी।

कल तक जो ठाकरे परिवार खुदको तो चुनाव से दूर रखता था अब सत्ता की चाभी पिता-पुत्र के हाथों में है। उधव ठाकरे सीएम है और आदित्य ठाकरे उनकी सरकार में मंत्री है। वैसे भी ठाकरे परिवार के बिना शिव सेना की क्या राजनीतिक पहचान है, ये सभी जानते है। बाल ठाकरे के विरासत के सवाल पर ही उधव और राज ठाकरे अगल हुए थे। हालांकि राज ठाकरे का अपना जनाधार है पर नंबर के खेल में वे काफी पीछे रह गए है

जम्मू-कश्मीर की राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाले दो परिवार शेख अब्दुल्ला और मोहम्मद सईद की विरासत भी अब नयी पीढ़ियों के हाथों में है। फारुख अब्दुल्ला ने पार्टी की कमान अपने बेटे उमर अब्दुला को सौंप दिया है। जबकि मुफ्ती मोहम्मद सईद ने अपने जीते जी अपनी बेटी महबूबा मुफ्ती को आगे करते हुए पार्टी की कमान उनको सौंप दी थी।

एक समय केंद्र की राजनीति की दशा और दिशा तय करने वाले उत्तर प्रदेश में परिवारवाद दूसरे राज्यों की अपेक्षा कुछ ज्यादा दिखाई देता है। एक ओर जहां मायावती कांशीराम के परिवार को दरकिनार कर उनकी विरासत की एकमात्र वारिस बन गयी हैं और अपनी सोशल इंजीनियरिंग के बल पर पार्टी के अन्दर और बाहर, अपने खिलाफ उठ रहे स्वर को दबाने मे कामयाब रही हैं। वहीं मुलायम सिंह का तो पूरा खानदान ही राजनीति में है। मुलायम सिंह के भाई शिवपाल यादव, रामगोपाल, पुत्र अखिलेश, भतीजा धमेंद्र यादव और बच्चों की बहुएं भी राजनीति में है। आज मुलायम परिवार की बागडोर अखिलेश यादव के हाथ में है। दूसरी ओर चौधरी चरण सिंह की विरासत को संभालने के लिए तीसरी पीढ़ी तैयार हो चुकी है। अजित सिंह अपने पुत्र जयंत को आगे लाने के लिए भरपूर कोशिश कर रहे है

हरियाणा मे जित देखो तित लाल की कहावत को चरितार्थ करते हुए देवीलाल, बंसीलाल और भजनलाल ने अपने लालों को मैदान में उतार रखा है। स्व. देवीलाल की तीसरी पीढ़ी मैदान में है। अजय सिंह चैटाला के पुत्र दुष्यंत चैटाला ने विरासत को संभाल रखा है। आजकल “हरियाणा सत्ता की चाभी” दुष्यंत के पास है।

एक समय बिहार में लालू यादव की तूती बोलती थी। आज उस डूबे हुए विरासत को तेजस्वी यादव संभालने की कोशिश कर रहे है।हालांकि रावड़ी देवी के शासन काल में उनके भाईयों की समानान्तर सरकार चलती थी और खासकर के साधु यादव खुद को लालू के राजनीतिक विरासत का असली वारिस मानते थे। वहीं लालू यादव के घोर विरोधी व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान भी परिवारवाद से बाहर नहीं निकल पाए हैं। पासवान का पूरा कुनबा ही लोकसभा सदस्य है। बॉलीवुड में अपनी किस्मत अजमा चुके चिराग पासवान उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे है

ठीक उसी तरह ओडिशा में पटनायक परिवार का कब्जा है। नवीन पटनायक अपने पिता बीजू पटनायक की विरासत को संभाल रहे है। इस बार मोदी लहर के बावजूद पटनायक साहब कलिंग का किला बचाने में कामयाब रहे। आने वाले समय में लगता नहीं है कि उनको कोई चुनौती दे सकता है।

तमिलनाडु की राजनीति के भीष्म पितामह, द्रमुक नेता एम. करुणानिधि ने अपने मौत से पहले ही एम.के. स्तालिन को अपने भावी उतराधिकारी के तौर पर पेश कर दिया था। जबकि उनका बड़ा बेटा अझगिरि और पुत्री कनिमोझी केंद्र की राजनीति में अपना भाग्य आजमा रहे हैं। आने वाले समय में आंद्रा के नेता एन.टी. रामाराव के परिवार की तरह यहां भी करुणानिधि की विरासत को लेकर विवाद पैदा हो सकता है।

आंध्र प्रदेश के सुपर स्टार और पूर्व मुख्यमंत्री स्व. एन.टी. रामाराव की विरासत को लेकर मची घमासान से पूरा देश वाकिफ था। रामाराव के दामाद एन. चद्रबाबू नायडू ने, जो आंध्रा की राजनीति के मजबूत स्तंभ है, रामाराव से बगावत कर तेलगुदेशम पार्टी पर कब्जा कर लिया था। पार्टी के अन्दर आज उनकी सत्ता को चुनौती देने वाला कोई नहीं है। जबकि रामाराव की दूसरी पत्नी लक्ष्मी, जो खुद को उनकी विरासत का असली वारिस बता रही थी, आखिर में थक-हार कर बाहर का रास्ता पकड़ लिया।

वही आंध्र प्रदेश की राजनीति के नए स्टार जगमोहन रेड्डी, जिन्होंने अपने पिता की विरासत न मिलने के कारण कांग्रेस छोड़ दिया था, आज रेड्डी परिवार की राजनीति विरासत को आगे बढा रहे है। लोकसभा और विधानसभा के चुनाव में उनके शानदार प्रदर्शन को देखते हुए कही लगता नही है कि आंध्रा में वंशवाद का कोई मुद्दा था।

कर्नाटक के किसान नेता और पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी.देवगौड़ा का पुत्र प्रेम भी किसी से छुपा हुआ नही है। देवगौड़ा के परिवारवाद के कारण ही कर्नाटक में हार का मुंह देखना पड़ा। ठीक उसी तरह पंजाब की राजनीति के शेर कहे जाने वाले मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने अपने बेटे सुखबीर सिंह बादल को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर रखा है।

वाम दलों की तरह ही बीजेपी में व्यक्ति से ज्यादा संगठन को तरजीह दी जाती है और एक दो उदाहरणों को छोड़ दें, तो यह परम्परा संघ के जमाने से चली आ रही है, लेकिन अब वंशवाद के प्रभाव से बच पाना शायद बीजेपी के लिए भी मुश्किल हो। भाजपा के अन्दर भी वंशवाद के बीज अंकुरित हो चूके है। वह चाहे राजनाथ सिंह हो, वसुंधरा राजे हो, प्रेम कुमार धूमल हो, यशवंत सिंहा हो या प्रमोद महाजन और गोपीनाथ मुंडे का परिवार हो, सबके सब अपनी राजनीति विरासत को बड़ा रहे है। अनुराग ठाकुर, पूनम महाजन, पंकजा मुंडे, दुष्यंत, पंकज सिंह, जयंत सिंह आदि को वंशवाद की राजनीति से बाहर कर के नहीं देखा जा सकता है।

प्रमोद महाजन की मृत्यु के बाद राहुल महाजन को जिस तरह से प्रमोट करने की कोशिश महाराष्ट्र की राजनीति पर अच्छी पकड़ रखने वाले महाजन और उनके बहनोई की कीजा रही थी, उसे वंशवाद नहीं तो और क्या कहेंगे। भाजपा और गोपीनाथ मुंडे की राजनीतिक विरासत का असली वारिस राहुल को समझा जा रहा था। यह अलग बात है कि राहुल महाजन की एक विवाद के चलते छवि खराब हो गई, इस वजह से बीजेपी को अपने कदम पीछे खींचने पड़े, वरना पार्टी के अंदर तो उन्हे राहुल गांधी के बराबर तरजीह दी जा रही थी। अब उनकी जगह प्रमोद महजान की बेटी पूनम को पार्टी में शामिल किया गया है।

सिंधिया परिवार का भारतीय राजनीति में वर्चस्व  शुरू से रहा है। कांग्रेस में जहां माधवराव सिंधिया का अहम रोल रहा है वहीं बीजेपी में स्व. विजयराजे सिंधिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। अपनी माता की विरासत को संभाल रहीं वसुंधरा राजे का पार्टी के अंदर दबदबे से भला किसे इन्कार हो सकता है। उनका पुत्र दुष्यंत और बहन यशोधरा राजे राजनीति में है। अब एक नाम ज्योतिरादित्य सिंधिया का भी शामिल हो चुका है। इस तरह सिंधिया परिवार की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए तीसरी पीढ़ी भी तैयार हो चुकी है। वहीं बीजेपी के पहले पंक्ति के नेता रहे जसवंत सिंह आजकल अपनी पार्टी से नाराज चल रहे है और अपन पुत्र मानवेंद्र सिंह का राजनीतिक करियर कांग्रेस के अंदर बनाने की कोशिश कर रहे है। मानवेंद्र सिंह पर अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे ले जाने की जिम्मेदारी है।

लालकृष्ण आडवाणी की पुत्री प्रतिभा आडवाणी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भी किसी से छुपी नही है। फिलहाल वे राजनीति से दूर रहकर फिल्म प्रोडक्शन का काम देख रही हैं, लेकिन जहां तक आडवाणी की राजनीतिक विरासत का सवाल है, तो वे अपने आप को राजनीति से दूर कब तक रख पाएगीं, यह तो समय ही बताएगा। कही ऐसा न हो कि भाजपा में आडवाणी युग के अंत के साथ ही उनकी बेटी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा का अंत न हो जाए। क्योकि जिस तरह से अमित शाह ने खुद को आडवाणी की विरासत का असली हकदार घोषित कर दिया है और आज पार्टी के अन्दर आडवाणीजी की जो स्थिति है, उसे देखते हुए ऐसा नही लगता है कि प्रतिभा आडवाणी को कभी राजनीति में प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलेगा। वैसे भी अब दौर जय शाह और अनुराग ठाकुर का है।

 पं. नेहरु के समय से ही विरोधी दल कांग्रेस को वंशवाद एवं व्यक्तिवाद के मुद्दे पर घेरते रहे हैं, लेकिन आज कल यह बाते आम हो चुकी है और राजनेताओं को भी इसमें कोई बुराई नजर नही आती है। उनका कहना है कि यदि एक हीरो का लड़का हीरो, डाक्टर का लड़का डाक्टर, आईएएस का लड़का आईएएस बन सकता है, तो फिर नेता का लड़का नेता क्यों नही बन सकता। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि वंशवाद को बढ़ावा देने का आरोप केवल नेताओं पर ही क्यों लगाया जाता है ?

भारत एक लोकतांत्रिक देश है और हर किसी को एक समान अधिकार प्राप्त है। अगर कोई व्यक्ति अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए राजनीति में आना चाहे तो इसमें कुछ गलत नही है। सवाल तब उठता है जब राजनीति के नाम पर उस व्यक्ति को संगठन के ऊपर थोपा जाता है और अलोकतांत्रिक तरीके से पार्टी के दूसरे योग्य नेता को दरकिनार कर, वंशवाद को बढ़ावा दिया जाता है, जैसा की आज कल सभी राजनीतिक दल कर रहे हैं। हालांकि चुनाव आयोग के दबाव के बाद अब प्रत्येक राजनीतिक दल अपने संगठन के अन्दर चुनाव करवाते हैं लेकिन कैडर पर आधरित पार्टी बीजेपी व आम दलों को छोड़कर बाकी सभी दल पर परिवारवाद हावी नजर आता है। आज कोई भी राजनीति पार्टी हो, राष्ट्रीय या क्षेत्रीय, टिकट बंटवारे के समय इस बात का ख्याल जरुर रखा जाता है कि वह किस नेता की परंपरागत सीट है। यदि एक सीट से कोई व्यक्ति दो बार जीत जाता है, तो वह उसकी सीट मानी जाती है और कई वर्षो के लिए वहा से उस व्यक्ति को और उसके के परिवार के सदस्यों को चुनाव में खड़ा होने का अधिकार मिल जाता है। दरअसल वंशवाद की मूल जड़ हमारी सामंती सोच में है। यही सोच हमें व्यक्तिवाद और परिवारवाद से बाहर नही निकलने देती है। सामंती सोच के चलते ही वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा मिलता है। जब तक सभी राजनीतिक दल वोट बैंक की राजनीति से ऊपर नही उठेगें तब तक इस देश को वंशवाद और व्यक्तिवाद से मुक्ति मिल पाना मुश्किल है।

 

Related Articles

Back to top button