धुरंधर: प्रोपेगेंडा या वास्तविकता?, जानिया क्या कहते है फिल्म समीक्षक राजवर्धन सिंह जी

धुरंधर: प्रोपेगेंडा या वास्तविकता? सच्चाई वही जो छिपाई जाती है, न कि जो दिखाया। एक कड़ा सच, भारतीय सिनेमा का नया मोड़।

अक्सर कहा जाता है कि सच वह नहीं जो दिखाया जाता है, बल्कि सच वह है जिसे छिपाने की कोशिश की जाती है। फिल्म धुरंधर के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। सिनेमाघरों तक पहुँचने से पहले ही इसे विवादों के घेरे में खड़ा कर दिया गया। किसी ने इसे ‘पाकिस्तान विरोधी’ बताकर बैन करने की मांग की, तो तथाकथित बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने इसे ‘सिनेमाई कचरा’ और ‘प्रोपेगेंडा’ घोषित कर दिया। लेकिन, जब आप पूर्वाग्रहों के चश्मे उतारकर ‘धुरंधर’ देखने बैठते हैं, तो यह फिल्म आपको एक ऐसे सवाल के साथ अकेला छोड़ देती है जो अंतर्मन को झकझोर देता है।

 

फिल्म का विज़न और निर्देशक की मंशा

फिल्म समीक्षक राजवर्धन सिंह के मुताबिक, आदित्य धर का ‘महाकाव्य’ ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ के जरिए भारतीय युद्ध सिनेमा (War Cinema) की परिभाषा बदलने वाले निर्देशक आदित्य धर ने इस बार एक अलग ही दुनिया रची है। यह मात्र एक फिल्म नहीं, बल्कि 3 घंटे 34 मिनट का एक विजुअल दस्तावेज है। जासूसी और गैंगस्टर ड्रामा के इस अद्भुत मिश्रण में, धर दर्शकों को कराची के कुख्यात ‘लयारी’ जिले की अंधेरी गलियों में खींच ले जाते हैं। यह दुनिया जितनी काल्पनिक लगती है, वास्तविकता के उतने ही खौफनाक करीब भी है। यह फिल्म आपको केवल मनोरंजन नहीं परोसती, बल्कि भू-राजनीतिक (Geopolitical) शतरंज के उस खेल का हिस्सा बनाती है, जहाँ हर चाल पर देश की सुरक्षा दांव पर लगी होती है।

 

अभिनय : दिग्गजों का महासंग्राम

दिग्गजों की स्टारकास्ट, रणवीर सिंह, अक्षय खन्ना, संजय दत्त, अर्जुन रामपाल और आर. माधवन—को देखकर ही अंदाजा हो जाता है कि मुकाबला टक्कर का होने वाला है। फिल्म में अक्षय खन्ना ने ‘अब्दुल रहमान बलोच’ (रहमान डकैत) के किरदार को जिस शिद्दत से जिया है, वह अविश्वसनीय है। भारत में आतंकवाद को खाद-पानी देने में ऐसे किरदारों की क्या भूमिका रही है, यह अक्षय की आँखों में दिखता है। वहीं, रणवीर सिंह ने खुद को एक बार फिर साबित किया है। एक विशेष दृश्य में, बिना किसी भारी-भरकम संवाद के, सिर्फ अपने चेहरे के भावों (Expressions) को बदलते हुए उन्होंने जो अभिनय किया है, वह अभिनय के छात्रों के लिए किसी पाठ से कम नहीं है। मैं अक्षय खन्ना के अभिनय को कमतर नहीं आँक रहा, लेकिन रणवीर ने यहाँ अपनी मौजूदगी का लोहा मनवाया है।

 

 संवाद जो चुभते हैं

फिल्म देखते वक्त मुझे उन आलोचकों की बहुत याद आई जिन्होंने इसे खारिज कर दिया था, क्योंकि यह फिल्म उन्हीं को आईना दिखाती है। फिल्म का एक संवाद बहुत गहरा घाव करता है: “भारत को मारने वाले भारत के लोग हैं, पाकिस्तान तो दूसरे नंबर पर आता है।” यह लाइन सिनेमा हॉल से निकलने के बाद भी आपके साथ चलती है। यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि बाहरी दुश्मन से लड़ना आसान है, लेकिन घर के भेदियों से निपटना सबसे बड़ी चुनौती है।

 

 क्यों देखें धुरंधर

जो समीक्षक इसे ‘राजनीतिक एजेंडा’ कह रहे हैं, वे भूल जाते हैं कि सिनेमा का प्राथमिक उद्देश्य सत्य को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करना है, और इस कसौटी पर ‘धुरंधर’ सौ फीसदी खरी उतरती है। यह फिल्म भारत पर हुए उन आतंकी हमलों की परतें खोलती है, जिनके जख्म आज भी हरे हैं। यह उन गुमनाम चेहरों और कहानियों को सामने लाती है, जिन्होंने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भारत की पीठ में छुरा घोंपा है। धुरंधर बॉलीवुड की पारंपरिक मसाला फिल्मों से कोसों दूर, एक गंभीर और शोधपरक सिनेमा है। यह इतिहास के उन पन्नों को पलटती है जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। अगर आप सिनेमा में केवल नाच-गाना नहीं, बल्कि एक कड़वा सच और बेहतरीन कहानी देखना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए है। मेरी नज़र में यह भारतीय सिनेमा के इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ है।

Related Articles

Back to top button