अक्षय खन्ना, बॉलीवुड की चकाचौंध से दूर एक ख़ामोश फ़नकार: फ़िल्म समीक्षक राजवर्धन सिंह जी
शोरगुल भरी इंडस्ट्री में अलग पहचान बिना प्रचार, सिर्फ़ अभिनय की ताक़त ख़ामोशी से रचा गया सशक्त सफ़

बॉलीवुड की दुनिया एक ऐसे बाज़ार की तरह है जहाँ आवाज़ जितनी ऊँची हो मौजूदगी उतनी पुख़्ता मानी जाती है। यहाँ मुस्कानें कैमरे के लिए होती हैं रिश्ते पीआर के लिए और ख़ामोशी को अक्सर कमजोरी समझ लिया जाता है। ऐसे शोरगुल भरे मंच पर अक्षय खन्ना एक अपवाद की तरह खड़े दिखाई देते हैं बिना शोर बिना प्रचार बिना किसी घोषणा के। विनोद खन्ना जैसे सुपरस्टार के बेटे होने के बावजूद अक्षय ने कभी उस विरासत को अपनी ढाल नहीं बनाया। वे उस (स्टार किड) संस्कृति से कोसों दूर रहे जहाँ नाम से पहले हाइप चलता है और अभिनय बाद में। उनकी यात्रा न तो सीधी रही न ही चमकदार बल्कि यह एक अंतर्मुखी कलाकार की आत्मसंघर्ष भरी कहानी है। अक्षय खन्ना को लेकर इंडस्ट्री और मीडिया में अक्सर एक राय बनी कि वे (डरावने रूखे या एरोगेंट) हैं। करन जौहर जैसे लोगों ने भी उनसे कहा तुम्हारा टोन लोगों को असहज कर देता है। असल में अक्षय उन लोगों में से हैं जिन्हें भीड़ में रहकर भी अकेले रहना पसंद है। उन्हें घिसे पिटे सवालों बनावटी हँसी और सेल्फ-प्रमोशन की संस्कृति से चिढ़ है। वे इंटरव्यू को संवाद नहीं औपचारिकता मानते हैं और शायद इसी ईमानदारी की क़ीमत उन्हें गलत समझे जाने के रूप में चुकानी पड़ी।
जब आईने ने हौसला तोड़ दिया
बॉलीवुड में सुंदरता एक पूंजी है और बाल उसका ताज। महज़ 20-22 साल की उम्र में बालों का झड़ना किसी भी युवा अभिनेता के लिए एक मानसिक आघात होता है। अक्षय ने इसे बेहद मार्मिक शब्दों में बयान किया था यह ऐसा था जैसे किसी पियानोवादक की उँगलियाँ काट दी जाएँ। यह सिर्फ़ शारीरिक बदलाव नहीं था बल्कि आत्मविश्वास पर गहरी चोट थी। एक ऐसी इंडस्ट्री में जहाँ हर फ्रेम परफेक्ट दिखने की माँग करता है वहाँ यह असुरक्षा उन्हें भीतर से तोड़ने लगी। शायद यही कारण रहा कि वे धीरे धीरे परदे से गायब होते चले गए चार साल के लंबे अंतराल के बाद जब अक्षय खन्ना लौटे तो वे बदले हुए थे। अब उनके पास हीरो बनने की ज़िद नहीं थी बस अभिनय की सच्ची भूख थी। इत्तेफ़ाक (मॉम और दृश्यम 2) जैसी फिल्मों में उन्होंने यह साबित कर दिया कि एक सशक्त अभिनेता को न लीड रोल चाहिए, न लंबा स्क्रीन टाइम बस एक प्रभावशाली दृश्य काफ़ी होता है। उनके ग्रे शेड किरदारों में एक अजीब-सी शांति और डर दोनों साथ चलते हैं। वे चीखते नहीं धमकाते नहीं बस मौजूद रहते हैं और वही मौजूदगी काफ़ी होती है। अक्षय खन्ना न तो मेथड एक्टर हैं न ही किसी तय स्टाइल के गुलाम। उनकी कोई ट्रेडमार्क अदा नहीं जिसे कॉपी किया जा सके। वे अभिनय नहीं करते वे उस पल को जीते हैं। आज जब हम इरफ़ान ख़ान या मनोज बाजपेयी की नेचुरल एक्टिंग की मिसाल देते हैं, तो यह भूल जाते हैं कि अक्षय खन्ना यह रास्ता बहुत पहले चुन चुके थे बस बिना शोर के। अक्षय खन्ना की कहानी उन लोगों के लिए है जो भीड़ का हिस्सा नहीं बन पाते, लेकिन अपनी पहचान खोना भी नहीं चाहते। वे बॉलीवुड के उस कोने में खड़े हैं जहाँ रोशनी कम है



