आपराधिक मामलों में जाति लिखने पर लगी पाबंदी, यूपी सरकार ने जातीय रैलियों पर रोक पर हाईकोर्ट को दिया जवाब
जातीय रैलियों पर रोक से जुड़े मामले में यूपी सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि ऐसे आयोजनों पर प्रतिबंध जारी है और अब आपराधिक मामलों में जाति लिखने पर भी रोक लगाई गई है। अदालत ने अगली सुनवाई 17 नवंबर तय की है।

लखनऊ: लखनऊ हाईकोर्ट में जातीय रैलियों पर रोक से जुड़ी सुनवाई में राज्य सरकार ने बताया कि प्रदेश में अब न सिर्फ ऐसी रैलियों पर प्रतिबंध है, बल्कि आपराधिक मामलों में किसी व्यक्ति की जाति लिखने पर भी पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई है।
राज्य और केंद्र सरकार ने दाखिल किए जवाब
लखनऊ पीठ में जातीय रैलियों पर रोक को लेकर चल रहे मामले में उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार दोनों ने अपना पक्ष रखा। राज्य सरकार ने बताया कि जातीय रैलियों पर रोक के साथ अब आपराधिक मामलों में जाति लिखने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है।
डीजीपी ने जारी किया सर्कुलर, 17 नवंबर को अगली सुनवाई
राज्य सरकार के जवाब के बाद पुलिस महानिदेशक ने इस संबंध में सर्कुलर जारी कर दिया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार के जवाब पर याची को प्रतिउत्तर दाखिल करने का समय दिया है। अब अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी।
कोर्ट ने पहले जताई थी नाराजगी
पिछली सुनवाई में कोर्ट ने राज्य और केंद्र सरकार से पूछा था कि जातीय रैलियों को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। अदालत ने नाराजगी जताई थी कि आदेश जारी होने के बावजूद राज्य सरकार ने उसका हलफनामा समय पर दाखिल नहीं किया।
तीन दिन का समय और सख्त चेतावनी
कोर्ट ने राज्य सरकार को हलफनामा दाखिल करने के लिए केवल तीन दिन का समय दिया था और चेताया था कि ऐसा न करने पर प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी को स्पष्टीकरण देने के लिए अदालत में पेश होना पड़ेगा।
2013 से चल रहा है मामला
यह जनहित याचिका 2013 में अधिवक्ता मोतीलाल यादव ने दायर की थी। याची का कहना था कि राजनीतिक दल जाति आधारित रैलियां—जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य सम्मेलन—कर समाज में विभाजन फैला रहे हैं। अदालत ने उसी वर्ष प्रदेशभर में ऐसी रैलियों पर रोक लगा दी थी।



