बड़ा खुलासा: उपराष्ट्रपति चुनाव में किसने की क्रॉस वोटिंग? नाम आए सामने.. ‘INDIA’ गठबंधन में लग गई सेंध?

नई दिल्ली। 2025 के उपराष्ट्रपति चुनाव में हुई क्रॉस वोटिंग ने पूरे राजनीतिक माहौल को हिला कर रख दिया है। कुल आंकड़ों से साफ हो गया कि कम से कम 15 सांसदों ने पार्टी लाइन से हटकर वोटिंग की, जिससे विपक्ष की मजबूती पर सवाल उठे। अब इस पूरे विवाद में एक नया मोड़ आया है। वरिष्ठ पत्रकार मंजरी जी. चतुर्वेदी ( Manjari G. Chaturvedi ) ने न्यूज़ नशा के पॉडकास्ट में बड़ा दावा करते हुए कहा कि आम आदमी पार्टी (AAP) के सांसदों ने इस क्रॉस वोटिंग में हिस्सा लिया। उनका कहना है कि लोकसभा चुनाव के बाद से ही आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और इंडिया गठबंधन से दूरी बनाकर चल रही है। यही वजह है कि उपराष्ट्रपति चुनाव में पार्टी ने परोक्ष रूप से विपक्ष के खिलाफ वोटिंग की।
आंकड़ों से साफ हुआ खेल – 15 सांसदों की क्रॉस वोटिंग कैसे?
उपराष्ट्रपति चुनाव के कुल आंकड़े इस विवाद को और गंभीर बनाते हैं।
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एनडीए की ताकत थी 437 सांसद, लेकिन उसे मिले 452 वोट। यानी 15 अतिरिक्त वोट।
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विपक्ष की ताकत थी 305 सांसद, लेकिन उसे मिले 300 वोट। यानी 5 कम वोट।
इससे स्पष्ट हुआ कि कम से कम 15 सांसदों ने एनडीए के पक्ष में वोट डाला, जबकि विपक्ष के 5 वोट भी कटे। यह इत्तेफाक नहीं माना जा रहा। अब इस पर मंजरी जी. चतुर्वेदी का खुलासा सामने आया है कि ये अतिरिक्त वोट आम आदमी पार्टी से जुड़े हो सकते हैं। AAP के सांसदों की कुल संख्या सीमित है, लेकिन अन्य छोटे दलों के साथ जोड़कर इसकी व्याख्या की जा रही है।
AAP और कांग्रेस की दूरी – राजनीतिक समीकरण का नया रूप
मंजरी जी. चतुर्वेदी के अनुसार, आम आदमी पार्टी ने लोकसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस और इंडिया गठबंधन से दूरी बनाए रखी है। इसके पीछे तीन बड़े कारण बताए जा रहे हैं:
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राजनीतिक प्रतिस्पर्धा – दिल्ली, पंजाब, गुजरात और गोवा जैसे राज्यों में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर रही है। भाजपा से लड़ाई के बाद सबसे बड़ा खतरा कांग्रेस से माना जा रहा है।
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वोट बैंक की राजनीति – AAP को डर है कि कांग्रेस से गठजोड़ करने पर उसका स्वतंत्र वोट बैंक कमजोर हो सकता है।
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आर्थिक प्रलोभन – सबसे बड़ा संयोग यह है कि जिस दिन वोटिंग हुई, उसी दिन पंजाब को केंद्र सरकार की तरफ से 1600 करोड़ रुपए का राहत पैकेज मिल गया। यह समय बहुत कुछ कहता है। क्या यह वोटिंग और राहत पैकेज का तालमेल महज़ संयोग है या राजनीतिक संकेत?
क्या यह एक सोची-समझी रणनीति है?
मंजरी जी. चतुर्वेदी का दावा है कि यह सिर्फ एक राजनीतिक खेल नहीं बल्कि AAP की रणनीति है। भाजपा के बाद कांग्रेस को सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानते हुए AAP अपने अस्तित्व को बचाने और मजबूत करने में लगी है। पार्टी की नीतियों और उसके सांसदों की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में एक गंभीर संकेत देती है कि इंडिया गठबंधन की एकता सिर्फ कागज़ पर है।
विपक्ष की एकजुटता पर सवाल
इस खुलासे के बाद विपक्ष के सामने कई सवाल खड़े हो गए हैं:
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क्या इंडिया गठबंधन में भरोसे की कमी है?
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क्या क्षेत्रीय दल अपनी स्वायत्त राजनीति को कांग्रेस से ऊपर रख रहे हैं?
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क्या लोकसभा चुनाव के बाद गठबंधन का ढांचा केवल चुनावी मजबूरी है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि AAP जैसी पार्टी विपक्ष से दूरी बनाकर भाजपा से तालमेल बढ़ाती है तो आने वाले चुनावों में विपक्ष की रणनीति बिखर सकती है।
क्या केंद्र सरकार इसे अपने पक्ष में भुना पाएगी?
एनडीए इसे एक बड़ी जीत के तौर पर पेश कर रहा है। भाजपा पहले ही विपक्ष पर अस्थिरता का आरोप लगाती रही है। अब उपराष्ट्रपति चुनाव के आंकड़े और AAP की भूमिका से सरकार विपक्ष की कमजोरी को और उजागर कर सकती है। साथ ही, केंद्र द्वारा राहत पैकेज देकर राज्यों में समर्थन जुटाना भी उसकी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
विपक्ष के सामने गंभीर संकट
उपराष्ट्रपति चुनाव की क्रॉस वोटिंग ने यह स्पष्ट कर दिया कि विपक्ष की मजबूती सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित है। आम आदमी पार्टी का कांग्रेस से दूर रहना और भाजपा से तालमेल बढ़ाना विपक्ष के सामने गंभीर संकट है। मंजरी तिवारी का खुलासा इस पूरी राजनीति को नए सवालों के घेरे में खड़ा कर रहा है। अब देखना यह है कि इंडिया गठबंधन इस टूटन को कैसे संभालता है और आने वाले चुनावों में विपक्ष अपनी रणनीति को कैसे नए सिरे से गढ़ता है।



