बड़ी खबर: मुस्लिम और ‘वक्फ बोर्ड’ आमने-सामने! ऐतिहासिक दरगाह में पत्थर से अशोक चिन्ह मिटाने पर बवाल!

श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर स्थित हजरतबल दरगाह में शुक्रवार को ईद-ए-मिलाद के मौके पर अशोक स्तंभ वाले शिलापट्ट को कुछ उपद्रवियों ने तोड़ दिया। इसके बाद मौके पर भारी भीड़ जमा हो गई और वक्फ बोर्ड के खिलाफ नारेबाजी व पत्थरबाजी की। यह दरगाह सदियों से मुस्लिम समुदाय के लिए सबसे पवित्र स्थल रही है क्योंकि यहाँ पैगंबर मोहम्मद का बाल सुरक्षित रखा गया है। विवाद तब शुरू हुआ जब हाल ही में करोड़ों की लागत से दरगाह का नवीनीकरण कर शिलापट्ट पर राष्ट्रीय प्रतीक अशोक चिन्ह उकेरा गया। इस कदम को लेकर राजनीतिक और धार्मिक विवाद छिड़ गया है।
अशोक चिन्ह वाले शिलापट्ट पर विवाद
दरगाह के उद्घाटन के दौरान शिलापट्ट पर अशोक स्तंभ उकेरा गया था। इसे लेकर मुस्लिम समुदाय के लोगों ने विरोध जताया। उनका कहना है कि धार्मिक स्थल पर राष्ट्रीय प्रतीक का इस्तेमाल अनुचित है और इससे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचती है। जुमे की नमाज के बाद बड़ी संख्या में लोग शिलापट्ट के पास जमा हो गए और विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया।
नेशनल कॉन्फ्रेंस और अन्य विपक्षी दलों ने भी इसे धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ बताते हुए सरकार की आलोचना की। पीडीपी नेता इल्तिजा मुफ्ती ने आरोप लगाया कि मुस्लिम समुदाय को जानबूझकर उकसाया जा रहा है।
जहाँ भी इस्लामी कट्टरपंथ हावी होता है, वहाँ से राष्ट्र व राष्ट्रीय चिह्न स्वतः ही गायब हो जाते हैं।
मामला कश्मीर के एक दरगाह का है, भारतीय प्रतीक चिह्न को तोड़फोड़ कर उखाड़ फेंका गया।
इस्लाम स्वयं में एक मुल्क है। ये उम्माह है। इनका संविधान कुरान है।
pic.twitter.com/zOpYavZ7tI— Anupam K. Singh (@anupamnawada) September 6, 2025
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का बयान: “धार्मिक स्थल पर अशोक चिन्ह क्यों?”
विवाद बढ़ने के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि उन्होंने कभी किसी धार्मिक स्थल पर राष्ट्रीय प्रतीक का उपयोग नहीं देखा। उन्होंने सवाल उठाया कि दरगाह में प्रतीक चिन्ह लगाने की आवश्यकता ही क्या थी, जबकि पूरा कार्य नवीनीकरण का था।
उमर अब्दुल्ला ने इसे धार्मिक संवेदनशीलता से जुड़ा मामला बताते हुए जांच और संवाद की आवश्यकता जताई।
वक्फ बोर्ड की चेयरपर्सन दरख्शां अंद्राबी का जवाब
वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष दरख्शां अंद्राबी ने विरोध करने वालों को उपद्रवी और आतंकवादी करार दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों पर FIR दर्ज न होने पर वह भूख हड़ताल करेंगी।
उन्होंने पुलिस और अधिकारियों से कहा कि जब भी कोई विधायक दरगाह जाए, उसकी तलाशी ली जाए ताकि उसकी जेब में कोई नोट न हो। यदि नोट में राष्ट्रीय प्रतीक हो तो उसे अंदर ले जाना “मकरूह” यानी घृणित माना जाएगा। उन्होंने कहा, “अगर किसी को अशोक चिन्ह से समस्या है, तो उन्हें दरगाह जाते समय राष्ट्रीय प्रतीक वाले नोट नहीं ले जाने चाहिए।”
हजरतबल दरगाह का इतिहास और महत्व
हजरतबल दरगाह श्रीनगर में डल झील के उत्तरी किनारे पर स्थित है। यह स्थान मुस्लिम समुदाय के लिए बेहद पवित्र माना जाता है क्योंकि यहाँ पैगंबर मोहम्मद का बाल सुरक्षित रखा गया है, जिसे मुई-ए-मुकद्दस कहा जाता है। यह बाल 1699 में यहाँ लाया गया था और विशेष अवसरों पर आम जनता को दिखाया जाता है।
दरगाह की स्थापना 17वीं शताब्दी में हुई थी। पहले यह बाग और हवेली थी, जिसे कश्मीर के गवर्नर सुलेमान शाह ने बनवाया था। इसका नाम इशरत महल था। बाद में मुगल शहजादा दाराशिकोह ने इसे मस्जिद में बदलकर जीर्णोद्धार कराया।
यह स्थल कश्मीरी वास्तुकला और इस्लामी धार्मिक परंपरा का अनूठा उदाहरण है। सफेद संगमरमर से बनी इसकी संरचना और शांति का वातावरण इसे विशेष बनाते हैं।
संविधान और कानून के तहत राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान
भारत में राष्ट्रीय प्रतीकों – जैसे ध्वज, गान, संविधान और प्रतीक चिन्ह – का अपमान गंभीर अपराध माना जाता है। भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 124 के तहत ऐसा करने वाले व्यक्ति को 3 साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है।
विवाद के बावजूद यह कानूनी पहलू भी चर्चा का विषय बन गया है कि धार्मिक स्थल पर राष्ट्रीय प्रतीकों का उपयोग कितना उचित है और किन नियमों के तहत इसका पालन होना चाहिए।
राजनीतिक और सामाजिक असर
इस घटना ने धार्मिक संवेदनशीलता और राजनीतिक प्रतिक्रिया को लेकर बहस तेज कर दी है। विपक्षी दलों का आरोप है कि इससे समाज में तनाव बढ़ सकता है, जबकि सत्ता पक्ष ने इसे संविधान और राष्ट्र प्रतीक का सम्मान बताते हुए विरोध करने वालों को “भड़काने वालों” की श्रेणी में रखा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसे विवादों को शांतिपूर्वक सुलझाना जरूरी है ताकि साम्प्रदायिक सौहार्द बना रहे।



