मोकामा फिर लहूलुहान, दुलारचंद की हत्या ने जगाई बंदूकों की सियासत


मोकामा की राजनीति फिर गोलियों की जद में है। टाल क्षेत्र के बाहुबली दुलारचंद यादव की हत्या ने 1980 के दशक की गैंगवार याद दिला दी। चुनावी मौसम में अनंत सिंह और सूरजभान के बीच फिर सियासी खून-खराबे की गूंज है।

मोकामा: मोकामा… कभी उद्योगों की पहचान था, आज बारूद की बदबू से घिरा है। 30 अक्टूबर की शाम दुलारचंद यादव की हत्या ने इस इलाके के रक्तरंजित इतिहास को फिर कुरेद दिया। गंगा किनारे का इलाका, जहां कभी टाल की हरियाली थी, अब बंदूकों की आवाज में डूब गया है।

कारखानों से अपराध तक की कहानी

1980 के दशक तक मोकामा ‘उद्योग नगरी’ कहा जाता था। रेलवे यार्ड और फैक्ट्रियों की गूंज यहां की पहचान थी। लेकिन फिर अपराधियों ने इस धरती को अपने कब्जे में ले लिया। जमीन, जाति और सत्ता की लड़ाई में गोलियां राजनीति की भाषा बन गईं।

‘छोटे सरकार’ अनंत सिंह की दास्तान

लदमा गांव के अनंत सिंह 1990 के दशक में गैंगवार के जरिए उभरे। भूमिहार समाज से आने वाले अनंत सिंह के खिलाफ अपहरण और रंगदारी जैसे 30 से ज्यादा केस दर्ज रहे। वे विधायक बने और सत्ता के गलियारों तक पहुंचे। 2019 में AK-47 केस में सजा हुई, मगर 2024 में बरी होकर फिर लौटे।

टाल के ‘बादशाह’ दुलारचंद की खामोशी

टाल क्षेत्र के 76 वर्षीय दुलारचंद यादव दशकों तक इलाके के अघोषित राजा रहे। 1980 से ही जमीन कब्जे और रंगदारी में उनका नाम जुड़ा रहा। 30 अक्टूबर 2025 को जब वे जनसुराज के उम्मीदवार पीयूष प्रियदर्शी के लिए प्रचार कर रहे थे, गोलियों ने उनकी कहानी खत्म कर दी। FIR में अनंत सिंह और उनके समर्थकों के नाम हैं।

गैंगवार, जातीय तनाव और चुनावी खून

अनंत सिंह बनाम सूरजभान का वर्चस्व संघर्ष सिर्फ राजनीतिक नहीं, जातीय भी है। भूमिहार–राजपूत टकराव और सत्ता की लड़ाई ने मोकामा को हमेशा हिंसा के घेरे में रखा।

इस बार चुनावी मैदान में अनंत सिंह (जेडीयू), वीणा देवी (राजद) और पीयूष प्रियदर्शी (जनसुराज) आमने–सामने हैं। सवाल वही है — क्या इस बार वोट गोली पर भारी पड़ेगा?

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