योगी के सामने ये क्या बोल गए BJP मंत्री – गोरखपुर एम्स से अच्छा तो हमारा KGMU..” छाया सन्नाटा, फिर..

उत्तर प्रदेश की सियासत में अक्सर नेता दिल की बात जुबां पर लाने से कतराते हैं, मगर इस बार BJP के एक मंत्री का “दिल से निकला बयान” सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने आ गया। मंच लखनऊ का था, मौका KGMU में नई स्वास्थ्य परियोजनाओं का था और विषय… गोरखपुर एम्स बनाम लखनऊ KGMU की तुलना!

BJP मंत्री का खुलासा: ‘गोरखपुर एम्स से अच्छा तो हमारा KGMU है!’

बयान कुछ ऐसा था, “दिल्ली वाला एम्स तो छोड़िए, गोरखपुर एम्स से तो केजीएमयू ही बेहतर है!”
अब ये बयान मजाक में था या हकीकत में, ये तो मंत्री ही जानें, लेकिन इतना तय है कि उन्होंने मंच से वो कह दिया, जो आम आदमी अक्सर घर में बैठकर कहता है। और वो भी तब, जब मंच पर खुद गोरखपुर के सांसद और सीएम योगी आदित्यनाथ बैठे हों!

KGMU की चमक: अब दिल के मरीज 15 दिन नहीं, सिर्फ 2 दिन में होंगे एडमिट

अब मंत्री जी की बातों को सिर्फ भावनात्मक मत समझिए, KGMU ने वाकई में कई सुधार किए हैं। हाल ही में यहाँ एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी की प्रतीक्षा अवधि 15 दिन से घटाकर 2 दिन कर दी गई है।
इसके अलावा ₹941 करोड़ की योजनाओं का लोकार्पण भी हुआ है। नया डायग्नोस्टिक सेंटर, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और मरीज़ों के परिजनों के लिए ठहरने की सुविधा KGMU को “एम्स-पार” बना रही है।

गोरखपुर एम्स का जवाब: ‘आप तुलना मत करिए… हम खुद को बेहतर बना लेंगे’

अब तुलना गोरखपुर एम्स से हुई है तो लोग उधर भी झांकेंगे। गोरखपुर एम्स ने पूर्वी यूपी में इंसेफलाइटिस जैसी बीमारियों पर अंकुश लगाने में अहम भूमिका निभाई है। मगर BRD मेडिकल कॉलेज की ऑक्सीजन त्रासदी की परछाई अब भी एम्स के आसपास घूमती है।

योगी का चेहरा: बयान सुनकर ‘मुस्कान’ या ‘मौन विरोध’?

जब मंत्री जी ने KGMU की तारीफ में गोरखपुर एम्स को नीचे रखा, तब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कोई तत्काल प्रतिवाद नहीं किया। राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा भी है कि शायद योगी जी इस बयान को मजाक में टाल गए, या फिर आलोचना को सुनने की लोकतांत्रिक ताकत दिखा दी।

मंच पर तारीफ, सोशल मीडिया पर ताली और तंज

बयान के बाद सोशल मीडिया पर कमेंट्स की बाढ़ आ गई।
कुछ लोग बोले – “मंत्री जी ने तो वो कह दिया जो कोई सोच भी नहीं सकता था!”
वहीं कुछ ने पूछा – “क्या ये बयान गोरखपुर एम्स के लिए अपमानजनक नहीं?”

उत्तर प्रदेश की मेडिकल राजनीति में नया अध्याय

बयान भले ही एक मंत्री का हो, लेकिन इसने UP के स्वास्थ्य संस्थानों की आपसी स्पर्धा और सरकार की प्राथमिकताओं पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
क्या KGMU की “राजधानी वाली चमक” वाकई बाकी संस्थानों से बेहतर है? या फिर मंत्री जी का यह बयान “लखनऊ प्रेम” की अतिशयोक्ति थी?

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