Coldrif सिरप पर बुरी फंसी BJP: दो रिपोर्टों में फर्क, 9 बच्चों की मौत का जिम्मेदार कौन? भाजपा की क्लीन चिट पर सवाल!

छिंदवाड़ा की दर्दनाक घटनाओं — 30 दिन में 9 बच्चों की मौत — ने सिर्फ़ दवा पर सवाल खड़े नहीं किए, बल्कि राजनीति की आग भी भड़का दी। अब मामला विज्ञान बनाम बयान का नहीं रहा; यह बन चुका है BJP-सरकार पर उठ रहे सवालों और कांग्रेस के तीखे आरोपों का भी। जब तमिलनाडु की लैब एक रिपोर्ट कहती है और मध्यप्रदेश की दूसरी, तो जनता के मन में एक ही सवाल: कौन सच बोल रहा है?
क्या हुआ — सीधा और साफ़ क्रम
छिंदवाड़ा के परासिया इलाके में सितंबर की शुरुआत से बच्चों के वायरल बुखार के बाद किडनी फेल होने और भर्ती होने की सूचनाएँ आईं। महीने भर में नौ मासूमों की मौत दर्ज हुई। स्थानीय स्तर पर Coldrif और Nextro-DS सिरप पर रोक लगाई गई, और बाद में मध्यप्रदेश सरकार ने राज्यव्यापी Coldrif बैन कर दिया। साथ में स्क्रीनिंग अभियान शुरू हुआ और केंद्रीय टीमें भी जांच में जुटीं।
दो लैब — दो निष्कर्ष, और बढ़ता संशय
सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब विवादित सिरप के सैंपल पर अलग–अलग लैबों ने अलग निष्कर्ष दिए — तमिलनाडु की लैब ने सिरप में खतरनाक रासायनिक संकेत बताए, जबकि मध्यप्रदेश की लैब ने वही दवा “ठीक” करार दी। बीच में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का त्वरित बयान आया कि ‘भारत की दवाएं सुरक्षित हैं’ — लेकिन जब वैज्ञानिक रिपोर्टों में अंतर हो, तो आधिकारिक बयान भरोसा कम दिलाते हैं और शक बढ़ाते हैं।
राजनीतिक रिंगबाजी — कांग्रेस बनाम BJP
कांग्रेस ने हमला बोल दिया — आरोप लगाया गया कि BJP सरकार दवा कंपनियों की ढाल बन रही है और वैज्ञानिक निष्कर्षों को दबाया जा रहा है। उनका कहना है कि जब बच्चों की जान गई है, तब भी सरकार जल्दबाज़ी में क्लीन-चिट क्यों दे रही है। वहीं BJP ने पलटवार किया और कहा कि विपक्ष देश की फार्मा-छवि को धूमिल कर रहा है। इस तकरार में सचाई पीड़ितों और परिवारों से दूर होती जा रही है — और यही सबसे चिंताजनक बात है।
मेडिकल व वैज्ञानिक चिंता — DEG जैसा टॉक्सिक एजेंट शक के दायरे में
पोस्टमार्टम व बायोप्सी में किडनी पर टॉक्सिक असर के संकेत मिले हैं; कुछ विशेषज्ञों ने डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) जैसी औद्योगिक रसायन की आशंका जताई है। पर अंतिम फॉरेंसिक रिपोर्ट अभी बाकी है — और यही रिपोर्ट बताएगी कि मौतों में सिरप की भूमिका कितनी निर्णायक थी। जब तक स्वतंत्र तीसरी पार्टी की पुष्टि नहीं आ जाती, राजनीतिक बयानबाज़ी ही माहौल नियंत्रित करेगी।
असली सवाल — जांच किसे भरोसेमंद लगे?
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क्या तमिलनाडु लैब की रिपोर्ट सही है, या मध्यप्रदेश लैब की?
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क्या केंद्रीय और राज्य स्तर पर सैंपलिंग / टेस्टिंग प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और फॉलो की गई?
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क्या सप्लाई-चेन, बैच-ट्रेसिंग और फैक्ट्री ऑडिट सार्वजनिक किए जाएंगे?
इन सवालों के जवाब के बिना जनता का भरोसा बहाल नहीं होगा — और सियासी बयान मौके पर शांति नहीं दिला पाएंगे।
डॉक्टरों और परिवारों की जिम्मेदारी — क्या बदलना चाहिए?
चिकित्सकीय प्रैक्टिस, दवा देने का तरीका और माता-पिता की जागरूकता भी अहम हैं — बिना डॉक्टर की सलाह दवा न दें, स्क्रीनिंग में सहयोग करें। पर यह व्यक्तिगत सतर्कता तभी काम करेगी जब दवाओं की गुणवत्ता पर पूरा भरोसा हो।
क्या किया जाना चाहिए — माँगें और रास्ता आगे का
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तुरंत स्वतंत्र तृतीय-पक्ष (नेशनल/अंतरराष्ट्रीय) फॉरेंसिक टेस्ट कराए जाएँ और रिपोर्ट सार्वजनिक हों।
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Coldrif के सभी बैच का पुरा सप्लाई-चेन ऑडिट खुलकर रखा जाए।
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फैक्ट्री ऑडिट, कच्चे माल का सोर्स और GMP रिकॉर्ड सार्वजनिक हो।
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प्रभावित परिवारों को तुरंत राहत-मुआवजा और मुफ्त इलाज की सुविधा दी जाए।
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दवा-निगरानी प्रणालियों में पारदर्शिता और जवाबदेही को क़ानूनी मजबूती दी जाए।
चिकित्सा पर राजनीति भारी न पड़े
यह विवाद केवल पार्टी-राजनीति का अखाड़ा नहीं होना चाहिए। जब बच्चे मरे हैं, तब राजनीति पीछे हटे और विज्ञान बोलने दिया जाए। BJP पर उठ रहे सवालों का समाधान पारदर्शी, स्वतंत्र और तेज़ जांच से ही होगा — न कि बयानबाज़ी से। और कांग्रेस जैसी पार्टियाँ भी सियासी लाभ की जगह पीड़ितों की आवाज को प्राथमिकता दें। आखिरकार यह मामला सिरप का नहीं, भरोसे का है — और भरोसा तभी लौटेगा जब रिपोर्ट, जांच और जवाबदेही साफ़-सुथरे ढंग से सामने आएँ।



