हाईकोर्ट में पूर्व BJP प्रवक्ता को बनाया जज, विपक्ष ने कर दिया बवाल.. SC के कोलेजियम की सिफारिश और..

बॉम्बे हाईकोर्ट में पूर्व बीजेपी प्रवक्ता आरती साठे की न्यायाधीश पद पर नियुक्ति ने देश की न्याय प्रणाली और राजनीतिक निष्पक्षता पर बहस छेड़ दी है। कांग्रेस, एनसीपी (एसपी) और टीएमसी जैसे विपक्षी दल इस नियुक्ति पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं, जबकि बीजेपी ने इन आरोपों को नकारते हुए इसे “राजनीतिक हमला” बताया है। मामला सुप्रीम कोर्ट के कोलेजियम की सिफारिश के बाद तूल पकड़ गया है।
किस आधार पर हो रही है आलोचना?
आरती साठे की जज नियुक्ति पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया कांग्रेस विधायक दल के नेता विजय वडेट्टीवार की रही। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर किसी राजनीतिक दल की पूर्व प्रवक्ता को हाईकोर्ट का जज बना दिया जाए, तो क्या आम जनता को निष्पक्ष न्याय मिल सकेगा? उन्होंने यह भी पूछा कि क्या संविधान की रक्षा ऐसे तरीकों से हो सकती है?
NCP और TMC ने भी जताई आपत्ति
एनसीपी (एसपी) विधायक रोहित पवार ने इस नियुक्ति को न्यायपालिका की निष्पक्षता के लिए खतरनाक बताया। उन्होंने फरवरी 2023 में महाराष्ट्र बीजेपी द्वारा जारी प्रवक्ता नियुक्ति पत्र का स्क्रीनशॉट साझा किया, जिसमें आरती साठे का नाम शामिल था।
वहीं तृणमूल कांग्रेस (TMC) प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद साकेत गोखले ने भी कोलेजियम की सिफारिश पर सवाल खड़े करते हुए पारदर्शिता और निष्पक्षता की मांग की।
सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम की सिफारिशें
सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम की 28 जुलाई 2025 को हुई बैठक में तीन नामों की सिफारिश की गई थी— अजित भगवानत्राव कडेहंकर, आरती अरुण साठे और सुशील मनोहर घोडेस्वर। इस सिफारिश के बाद ही आरती साठे की नियुक्ति की गई। विपक्ष का तर्क है कि राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की न्यायपालिका में नियुक्ति, सिस्टम की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करती है।
बीजेपी का पलटवार: अब कोई संबंध नहीं
बीजेपी की तरफ से राज्य के मुख्य प्रवक्ता केशव उपाध्ये ने विपक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने साफ किया कि आरती साठे ने डेढ़ साल पहले ही पार्टी से इस्तीफा दे दिया था और अब उनका बीजेपी से कोई संबंध नहीं है।
उपाध्ये ने यह भी कहा कि कांग्रेस और रोहित पवार जैसे नेताओं को कोलेजियम के फैसले पर सवाल उठाने का कोई अधिकार नहीं है और यह हमला न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाता है।
न्यायपालिका बनाम राजनीति
आरती साठे की नियुक्ति को लेकर शुरू हुआ यह विवाद सिर्फ एक नियुक्ति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने भारत की न्याय प्रणाली, कोलेजियम सिस्टम और राजनीतिक हस्तक्षेप जैसे मुद्दों को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। जहां विपक्ष इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला बता रहा है, वहीं बीजेपी इसे राजनीति प्रेरित हमला मान रही है।



