बड़ी खबर: जेल में रेपिस्ट ‘आशाराम’ ने लगाई फांसी, पुलिस ने छुपाई आत्महत्या की बात.. फिर ऐसे खुला राज !

मुरादाबाद, 15 अगस्त: मुरादाबाद जिला जेल में बंदी आसे उर्फ आशाराम की मौत ने प्रशासन की लापरवाही को उजागर कर दिया है। शुरुआती रिपोर्ट में इसे शौचालय में गिरने का हादसा बताया गया था, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट में आत्महत्या की बात सामने आने के बाद हड़कंप मच गया। आनन-फानन में डीआईजी जेल कुंतल किशोर मुरादाबाद पहुंचे और जेल का निरीक्षण कर सुरक्षा व्यवस्था की जांच की।

जेल प्रशासन ने किया पर्दा डालने का प्रयास

जेल में बंदी की मौत के बाद प्रशासन ने इसे शौचालय में गिरने का हादसा बताकर मामले पर पर्दा डालने की कोशिश की। मृतक को जिला अस्पताल भेजा गया, लेकिन डॉक्टरों ने चेक करने पर पाया कि उसकी सांसें पहले ही थम चुकी थीं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में आत्महत्या की पुष्टि के बाद मामला लखनऊ तक पहुंच गया।

डीआईजी जेल ने किया निरीक्षण

मुरादाबाद पहुंचने के बाद डीआईजी जेल कुंतल किशोर ने बंदी आसे की बैरक का निरीक्षण किया और जेल अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया। अधिकारियों से बात कर उन्होंने पूरी जांच पड़ताल की। जानकारी मिली कि पांच दिन पहले बंदी को बुखार आया था और उसे जेल अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बुधवार शाम करीब चार बजे वह शौचालय गया और गमछे को फंदा बनाकर लटक गया।

परिजन का आरोप: हत्या की गई

बंदी आसे उर्फ आशाराम की पत्नी कंचन का कहना है कि उनके पति की हत्या की गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि कई दिनों से उन्हें जेल में परेशान किया जा रहा था। पोस्टमार्टम के बाद परिजन बृहस्पतिवार को शव अपने घर लेकर आए और देर शाम अंतिम संस्कार किया। कंचन ने बताया कि उनके पति के गले पर काला निशान था और उन्होंने आत्महत्या नहीं की थी। उनके तीन छोटे बच्चे हैं – पिंकी (5), रिंकी (4) और चिराग (2)।

अपराध की पृष्ठभूमि

बंदी आसे के खिलाफ बिलारी थाने में 26 अक्टूबर 2024 को केस दर्ज किया गया था। आरोप है कि उसने दो नाबालिग बहनों का अपहरण किया और बड़ी बेटी के साथ दुष्कर्म किया। पुलिस ने 27 अक्टूबर को मुठभेड़ के दौरान उसे गिरफ्तार किया, जिसमें आसे के दाहिने पैर में गोली लगी। तत्कालीन थाना प्रभारी लखपत सिंह ने आर्म्स एक्ट और पुलिस पार्टी पर हमला करने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया था।

जेल में सुरक्षा व्यवस्था की चिंता

जिला जेल की क्षमता से पांच गुना बंदी और कैदी बंद हैं, जबकि केवल 60 बंदी रक्षक उनकी सुरक्षा के जिम्मेदार हैं। कई बार बंदी बीमार होने पर दो रक्षक अस्पताल में ड्यूटी करते हैं और छुट्टियों के कारण रक्षकों की संख्या और कम हो जाती है।

पहले भी जेल प्रशासन पर हो चुकी कार्रवाई

पिछले साल दिसंबर में संभल बवाल के आरोपियों से जेल में अनियमित मुलाकात सामने आने पर डीआईजी जेल कुंतल किशोर ने जांच की थी। जांच में वरिष्ठ जेल अधीक्षक पीपी सिंह, जेलर विक्रम सिंह यादव और डिप्टी जेलर प्रवीण सिंह की लापरवाही उजागर हुई थी। इसके बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया था।

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