Big Exclusive : आज भी सरकार में जारी है आरएसएस पर रोक!

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ये वो खबर है जो आपकी हैरानी की सारी सीमाएं तोड़ देगी| जी हाँ, जिस दौर में सरकार के टॉप पोजीशन पर आरएसएस के स्वयंसेवक बैठे हों, उस दौर में भी सरकार के भीतर आरएसएस बैन है| इस कहानी को समझने के लिए आपको थोड़ा फ़्लैश बैक में जाना होगा |

30 नवंबर 1966, यह वो तारीख थी जब देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सरकारी कर्मचारियों के लिए आरएसएस को ब्लैक लिस्ट कर दिया था। उस वक्त का ये जीओ यानि गर्वनमेंट आर्डर इसका सबूत है। इस जीओ में लिखा है-

(Dated 30 November 1966, Where in it was clarified that the government have always held the activities of both The Rastriya swayam sevak sangh and The Jamaat e Islami to be of such a nature that participation in them by government servants would attract the provisions of sub rule 1 of the central civil services (conduct) rules, 1964 and that any government servant who is the member of or is otherwise associated with the aforesaid organizations or with their activities, is liable to discipliinary action)

इस आर्डर में यह कहा गया है कि कोई भी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ या जमाते ए इस्लामी की किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं हो सकता है। इस प्रावधान को central civil services (conduct) rules, 1964 के जरिए लागू किया गया और अनिवार्य कर दिया गया। इसलिए कोई भी सरकारी कर्मचारी इन आर्गनाइजेशंस के साथ किसी भी गतिविधि या कार्य में शामिल नहीं हो सकता है। ये सरकारी कर्मचारियों के लिए आरएसएस को लेकर सीधी और खुली चेतावनी थी कि वे इससे दूर रहें।

यहां बैन की वजह भी साफ की गई है। सरकार का ये आर्डर सीधे तौर पर आरएसएस को एक सांप्रदायिक संगठन घोषित करता है। आर्डर में लिखा है-

No notice should be taken by government and its officers local bodies state-aided institutions of petitions or representations on communal basis and no patronage whatsoever should be extended to any communal organization.

अब यहां एक बड़ा सवाल उठता है कि आखिर इंदिरा गांधी ने ये आर्डर क्यों जारी किया और सरकारी तंत्र में आरएसएस को बैन करने के पीछे की वजह क्या थी। आखिर इंदिरा के दिमाग में क्या चल रहा था? क्या उनको किसी साजिश या सियासी उठापटक की भनक लग चुकी थी? आरएसएस को आज़ादी के बाद से अब तक तीन बार बैन किया जा चुका है। पहली बार महात्मा गांधी की हत्या की साजिश में बैन किया गया। दूसरी बार इमरजेसी के दौर में इंदिरा गांधी ने बैन किया और तीसरी बार बाबरी ध्वंस के आरोप में उस समय के प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव ने आरएसएस ने बैन किया | खास बात यह है कि ये तीनो बैन कुछ समय के बाद हट गए। मगर एक ऐसा बैन है जो आज भी कायम है। 1966 के बाद से आज तक ये बैन नहीं हट सका है जबकि इस दौरान अटल बिहारी बाजपेयी से लेकर नरेंद्र मोदी तक बीजेपी के प्रधानमंत्री दिल्ली तक गद्दी पर राज कर चुके हैं।

इंदिरा की आरएसएस से चिढ़ का कारण जो भी रहा हो मगर उनकी नजर आरएसएस पर लगातार बनी हुई थी। साल 1980 में जब इमरजेंसी के बाद वे सत्ता में लौटीं तब भी उनके आधीन गृह मंत्रालय ने एक बार फिर से इस आर्डर को औऱ भी ताकत के साथ जिंदा कर दिया। इस बार आर्डर में न सिर्फ सरकारी अधिकारियों को आरएसएस से दूर रहने की हिदायत दी बल्कि आरएसएस को साफ शब्दों में सांप्रदायिकता फैलाने वाला संगठन करार दिया। दरअसल इंदिरा गांधी आरएसएस को लेकर इस हद तक सशंकित थीं कि वे किसी भी सूरत में इसकी छाया सरकारी तंत्र पर नहीं पड़ने देना चाहती थीं। कहीं न कहीं उन्हें डर था कि आरएसएस की विचारधारा अगर अफसरशाही में हावी हो गई तो सरकार के फैसलों पर इसका सीधा असर पड़ेगा। इसलिए 1980 का ऑफिस मेमोरंडम और भी ज्यादा सख्ती के साथ सामने आया।

ये आर्डर हमे एक पूर्व रॉ अधिकारी आरके यादव की आरटीआई के जवाब में मिला हासिल हुआ है। अब तक इस आर्डर में कोई बदलाव नहीं किया गया है। आरटीआई लगाने वाले आरके यादव के मुताबिक ये आर्डर आज भी जिंदा है और आज भी कोई सरकारी अधिकारी आरएसएस की गतिविधियों में शामिल नहीं हो सकता।
इंदिरा गांधी का युग साल 1984 में उनकी हत्या के साथ ही खत्म हो गया। उसके बाद दिल्ली की गद्दी पर कई प्रधानमंत्री बैठे। कई पार्टियों की सरकारें सत्ता पर काबिज रहीं। राजीव गांधी से लेकर वीपी सिंह, चंद्रशेखर, देवगौड़ा, गुजराल, अटल बिहारी बाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी तक प्रधानमंत्रियों के चेहरे बदलते रहे मगर ये आर्डर नहीं बदला।

देश की आजादी की लड़ाई में आरएसएस का अहम रोल रहा है। यहां तक देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने आरएसएस की सेवाओं को देखते हुए उसे साल 1963 की रिपब्लिक डे परेड में शामिल होने का गौरव भी दिया। लेकिन नियति का चक्र देखिए, उनकी ही बेटी ने इसे सत्ता में आते ही बैन कर दिया।

हालांकि ये बैन थोड़ा हास्यास्पद लगता है क्योंकि सरकार के शीर्ष पर बैठे हुए लोग सीधे आरएसएस से ताल्लुक रखते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद आरएसएस के स्वयंसेवक रह चुके हैं। अमित शाह, राजनाथ सिंह, गडकरी जैसे हैवीवेट सरकारी मंत्री भी आरएसएस की पृष्ठभूमि से आते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी भी आरएसएस के स्वयंसेवक रह चुके हैं। इसके बावजूद इस बैन का जारी रहना कुछ अटपटा सा लगता है।

 

 

 

विनीता यादव की रिपोर्ट

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