जब नौसेना की पनडुब्बी में जलसमाधि के खतरों से लड़कर की रिपोर्टिंग !

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सशस्त्र बलों में सर्वाधिक खतरनाक और कठिन ड्यूटी पनडुब्बी में कार्यरत नौसैनिकों की होती है। पनडुब्बी एक प्रकार का जलयान (वॉटरक्राफ़्ट) है। जो पानी के अन्दर रहकर काम कर सकता है। देखा जाय तो एक फाइटर पायलट की ग्लैमरस नौकरी की तुलना में पनडुब्बी में कार्यरत नौसैनिक और अधिकारी अपेक्षाकृत कई गुना खतरे के मशीनी वातावरण में रहते हैं, जिसमें बैटरियां, मिसाइलें और टारपीडोज भी होते हैं। एक छोटी सी स्पार्किग या चिंगारी पनडुब्बी को भारी विस्फोट के साथ जलसमाधि दिला सकती है। जैसा कि भारतीय नौसेना की किलो क्लास की पनडुब्बी आईएनएस- सिंधुरक्षक के साथ 13 अगस्त 2013 की रात मुम्बई तट पर हुआ था। उसमें कार्यरत 14 नौसैनिकों और नवल अधिकारियों को भागने का वक्त भी नहीं मिला था।
रक्षा मंत्रालय द्वारा आयोजित डिफेंस करेस्पांडेंट कोर्स (डीसीसी) करने के दौरान मुम्बई के नेवी नगर स्थित नेवल डाकयार्ड पर अरब सागर में मौजूद किलो क्लास की पनडुब्बी ‘आईएनएस- सिंधुरत्ना’ में हमें समन्दर की गहराइयों में कुछ वक्त जांबाज नाविकों के साथ बिताने और उनके सानिध्य का अविस्मरणीय अवसर मिला। यह हमारे लिये एक गौरव की बात थी। मुझे अच्छी तरह याद है कि वह वर्ष 2005 के सितम्बर माह की 5वीं तारीख थी। पनडुब्बी में नौसेनाकर्मियों की अनवरत् चलने वाली कठिन ड्यूटी देखकर हमारे सिर सम्मान और श्रद्धा से झुक गये। उस वक्त यह अहसास तारी था कि देश के सच्चे सपूत तो ये हैं। पनडुब्बी के सबसे निचले तल में लगे भारी-भरकम जेनरेटर और इंजन से निकलने वाली गर्मी तथा शोर में भी पनडुब्बीकर्मी अपनी ड्यूटी को बखूबी अंजाम दे रहे थे।
पनडुब्बी के भीतर दाखिल होने की प्रक्रिया ऐसी विषम और मशक्कतभरी थी, कि एक सामान्य इंसान इसमें घुसने के बाद यह सोचकर परेशान रहेगा कि वह अन्दर घुस तो गया, लेकिन निकलेगा कैसे ? मेरे मन में भी कुछ ऐसा ही ख्याल-सवाल उमड़-घुमड़ रहा था। पनडुब्बी में दाखिल व्यक्ति किसी असमान परिस्थिति में अगर खुद अपने बल से निकलने में सक्षम नहीं है तो उसे सहारा देकर निकालना मुश्किल है। पनडुब्बी की पीठ पर से बहुत ही पतली सुरंग (जो एक सामान्य मोटाई के व्यक्ति के घुसने भर की ही होती) जो कि तकरीबन 25 फिट गहरी होती है उसमें लगी बिल्कुल खड़ी (स्ट्रेट) सीढ़ी पर से नीचे उतरकर पनडुब्बी में दाखिल होने में मेरे पसीने छूट गये। एकबार तो ऐसा लगा कि मेरा दम ही घुट जायेगा। लेकिन हिम्मत कर मैं पनडुब्बी में दाखिल होने में कामयाब रहा। हमें बताया गया कि पनडुब्बी में आने-जाने का यही एकमात्र रास्ता है। हालांकि आपातकाल के लिये एक इमरजेंसी द्वार भी होता है, जो समुद्र के अंदर यानि कि पानी में ही खुलता है। हम लोग आईएनएस- सिंधुरत्ना में दाखिल तो हो गए, लेकिन हम में से कइयों को अन्दर जाने के बाद एनजाइटी (घबड़ाहट और बेचैनी) होने लगी। पनडुब्बी में तैनात डाक्टर ने हमें एन्टीएन्जाइटी मेडिसिन दी। लेकिन हमें पूरी राहत तभी मिली जब पनडुब्बी से बाहर निकले।
पनडुब्बी में दाखिल होने के बाद हमें छोटे-छोटे कम्पार्टमेंट, जिसमें पाइपों-मशीनों का संजाल था, को सतर्कता से पार कराते हुए सीढ़ियों से उतारकर एक ऐसे कक्ष में ले जाया गया जो अपेक्षाकृत ज्यादे सुविधाजनक था। हमें बताया गया कि यह रेड रूम है। इसे कन्ट्रोल रूम भी कहा जाता है। यह वो जगह होती है जहां से पनडुब्बी संचालित की जाती है। उसमें पर्याप्त वातानुकूलन (एसी) था और वहां की मद्धिम लाल रोशनी अलग प्रभाव डाल रही थी। रेड रूम में हमारी पढ़ाई शुरू हुई। कैप्टन (नाम मुझे याद नहीं आ रहा और वह डायरी भी नहीं मिली जिसमें हमनें नोट किया था) ने बताया कि पनडुब्बीकर्मी को किसी मिशन में तैनाती के दौरान 30 दिन तक की लगातार ड्यूटी करनी पड़ती है। मिशन में शामिल पनडुब्बी इतने दिनों तक समुद्र में कहीं पानी के अन्दर होती है। किलो क्लास की परम्परागत डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां बिना सतह पर आये 25-30  दिनों तक लगातार पानी के भीतर रहने में सक्षम होती हैं। उनके मिशन के बारे में उनके परिवार वालों को कुछ पता नहीं होता। वो बस इतना जानते हैं कि वे ड्यूटी पर जा रहे हैं।
पनडुब्बी का जीवन इसलिये भी बहुत कठिन होता है कि वहां रोजमर्रा की जरूरतों के लिये इस्तेमाल में लाये जाने वाली वस्तुयें यहां तक कि पानी और भोजन भी बहुत ही मितव्ययता से खर्च करना पड़ता है। नहाने के लिये पानी सप्ताह में सिर्फ एक बार मिलता है। उसके लिये भी सबकी सहमति जरूरी है कि इस हफ्ते किसको नहाना जरूरी है, वही नहायेगा। पानी बचाने के लिये सेव करने की इजाजत नहीं है। एक पनडुब्बीकर्मी को एक दिन में महज तीन-चार मग पानी ही इस्तेमाल के लिये मिलता है। पनडुब्बीकर्मी अपने पहनने वाले कपड़े एक सप्ताह बाद भी शायद ही चेन्ज करता हो। पनडुब्बी के कमांडर ने हमें उन सभी स्थानों को दिखाया, जहां तक हम लोगों का जाना उचित और मुनासिब था।
हमनें देखा कि पनडुब्बी आईएनएस- सिंधुरत्ना के भीतर कृत्रिम रूप से जीवन योग्य सुविधाओं की व्यवस्था की गयी है। कैप्टन ने बताया कि आधुनिक पनडुब्बियाँ अपने चालक दल के लिये प्राणवायु ऑक्सीजन समुद्री जल के विघटन की प्रक्रिया से प्राप्त करती है। पनडुब्बियों में कार्बन डाईऑक्साइड को अवशोषित करने की भी व्यवस्था होती है ताकि पनडुब्बी के भीतर कार्बन डाईऑक्साइड ना भर जाए। ऑक्सीजन की पर्याप्त उपलब्धता के लिये पनडुब्बी में एक ऑक्सीजन टंकी भी थी। आग लगने पर बचाव के लिये भी व्यवस्था का पर्याप्त इंतजाम था। आग लगने की स्थिति में जिस भाग में आग लगी होती है, उसे शेष पनडुब्बी से विशेष रूप से बने परदों की सहायता से अलग कर दिया जाता है ताकि विषैली गैसें बाकी पनडुब्बी में ना फैले।
हमनें देखा कि पनडुब्बी में राशन और भोजन का भंडारण बहुत ही सीमित मात्रा में होता है। ज्यादातर डिब्बाबन्द भोजन ही प्रयोग में लाया जा रहा था। हालांकि कमांडर ने हमें बताया कि वहां की रसोई में नियमित खाना भी पकता है। उसमें चपाती, चावल, सादी दाल और बिना मसाले वाली सब्जी ही बनायी जाती है। हमनें यह भी देखा कि पनडुब्बीकर्मी को सोने के लिये छोटे-छोटे केबिन थे | उसमें शायिकायें ठीक उसी तरह बनी हैं जैसे कि मीटर गेज (छोटी लाइन) की ट्रेनों में थी टियर शायिका कोच में होती है। उन्हें दिन के समय में गिरा दिया जाता है। फिर वह केबिन एक दफ्तर का रूप ले लेता है। उसमें सामान्य कामकाज निपटाये जाते हैं। मैंने पनडुब्बी के सबसे निचले यानि कि जनरेटर कक्ष में बहुत ही गरम वातावरण में ड्यूटी निभा रहे एक नाविक से बातचीत की। उसने बताया कि वह सीवान (बिहार) जिले का रहने वाला है और उसने देश की सेवा के लिए ही इस कठिन कार्य को चुना है।
दरअसल पनडुब्बियाँ जटिल मशीनें होती हैं और इनके रख-रखाव में काफी मेहनत की जरूरत होती है। पनडुब्बियों के अन्दर काम करने का माहौल बैटरी एसिड और परमाणु ईधन के कारण अत्यंत विस्फोटक और खतरनाक होता है। इसलिए पनडुब्बियों का रोजमर्रा का कामकाज जोखिमों से भरा होता है। उनका संचालन ऐसे माहौल में होता है, जहाँ उसके चालक दल के सदस्यों की सावधानी से हादसे टलते रहते हैं। टाँरपीडो लोडिंग हो या मिसाइलों की तैनाती या महत्वपूर्ण उपकरणों का रख-रखाव, इस पर काम करने वाले खुशी के साथ अपने काम को अंजाम देते हैं। जैसाकि सेना में कहा जाता है, परिस्थितियाँ जितनी विपरीत होती हैं, सहयोग भावना उतनी ही मजबूत होती है। काम जितना मुश्किल और खतरों से भरा होता है, पनडुब्बी चालकों की प्रतिक्रिया उतनी ही जीवंत होती है।
भारतीय नौसेना के पनडुब्बी बेड़े की मौजूदा स्थिति
भारतीय नौसेना में मौजूदा समय में कुल 14 पनडुब्बियाँ हैं। इसके अलावा हाल में शामिल की गई नई पनडुब्बी आईएनएस-कलवरी भी है। इन 14 में से 9 पनडुब्बियाँ किलो क्लास और चार एसकेएस क्लास की हैं, जो डीजल-इलेक्ट्रिक चालित हैं। ये सभी रूस और जर्मनी की बनी हुई हैं। भारत के पास दो परमाणुचालित पनडुब्बियाँ भी हैं, जिनमें से एक आईएनएस-चक्र (अकूला-2 क्लास) है, जो रूस से 10 साल के लीज पर ली गयी है। और दूसरी परमाणुचालित पनडुब्बी आईएनएस-अरिहंत स्वदेशी है। अरिहंत के निर्माण का शुभारम्भ 26 जुलाई 2009 को विशाखापत्तनम् में एक गुप्त स्थान पर किया गया था। निर्मित होने के बाद गहन परीक्षणों से गुजरने के बाद इसे अगस्त 2016 में भारतीय नौसेना के बेड़े में शामिल (कमीशन) किया गया। आईएनएस-अरिहंत (अरि: शत्रु, हंत : मारना अर्थात शत्रु को मारने वाला) परमाणु शक्ति चालित भारत की प्रथम स्वदेशी पनडुब्बी है। इस 6000 टन की पनडुब्बी का निर्माण उन्नत प्रौद्योगिकी पोत परियोजना के अंतर्गत 2.9 अरब डॉलर की लागत से किया गया है। इसको बनाने के बाद भारत वह छठा देश बन गया जिनके पास इस प्रकार की पनडुब्बियां है।
भारतीय नौसेना के वरिष्ठतम् पनडुब्बी अधिकारी व परमाणु पनडुब्बियों के महानिरीक्षक एडमिरल श्रीकांत कहते हैं कि ये सभी पनडुब्बियाँ युद्ध के लिए पूरी तरह फिट हैं और किसी भी स्थिति का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। इसके अलावा नवीनतम तकनीक की नई पनडुब्बियों की खरीद होने तक सिंधुघोष क्लास (रूसी किलो क्लास) की चार और शिशुमार क्लास (जर्मनी की टाइप 209/1500 एचडीडब्ल्यू क्लास) की चार पनडुब्बियों को नई तकनीक से लैस करके उनका जीवनकाल बढ़ाने की दिशा में भी कदम उठाये गये हैं। साथ ही प्रोजेक्ट 75 (आई) के तहत छह नई पनडुब्बियाँ और प्राप्त की जायेंगी, जिसके लिए वर्ष 2017 में आरएफपी (रिक्वेस्ट फार प्रजोपल) जारी की गई। यह प्रोजेक्ट भारत सरकार के स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप माँडल के अन्तर्गत पूरा किया जायेगा। स्ट्रैटेजिक पार्टनर के चयन के लिए आरएफपी जारी करने का लक्ष्य 2018 का मध्य था, लेकिन इन पंक्तियों के जुलाई में लिखे जाने तक लक्ष्य पूरा नहीं किया जा सका था।
भारतीय नौसेना के पनडुब्बी बेड़े का इतिहास
भारतीय नौसेना के पनडुब्बी बेड़े का इतिहास 52 साल पुराना है। 8 दिसम्बर 1967 को भारतीय नौसेना में पहली पनडुब्बी ‘कलवरी’ शामिल हुई थी। यह तत्कालीन सोवियत संघ से ली गई ‘टाइप 641’ क्लास की पहली पनडुब्बी थी जिसे नाटो ने फोक्सट्रांट क्लास नाम दिया था। उस समय कड़ाके की सर्दी में इसे रिंगा बंदरगाह (अब लातविया नामक देश में) पर भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था। जब लातविया सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करता था। नौसेना के वाइस एडमिरल (रि) प्रदीप चौहान बताते हैं कि पनडुब्बी पर भारतीय नौसेना के निशान वाला ध्वज फहराया गया और इसके चालक दलके 78 सदस्य (अधिकारी व नौसैनिक) सावधान की मुद्रा में इस पर खड़ थे। ये लोग (चालक दल) विशाखापत्तनम् से पहले व्लादिवोस्तक गये जहां उन्होंने कलवरी के परिचालन का प्रशिक्षण लिया और फिर 10 हजार किलोमीटर से अधिक की यात्रा करते हुए विशाल सोवियत संघ के पनडुब्बी अड्डे बेलियिस्क गये और अंतत: रिगा पहुंचे। किलो श्रेणी की आठ पनडुब्बियों को रीगा में भारतीय बेड़े में शामिल किया गया था, जो कि वर्ष 1986 से 1990 के दौरान भारत पहुंची थीं। इनमें से चार को पूर्वी तट विशाखापट्टनम में और चार को पश्चिमी तट मुम्बई में रखा गया। इस श्रेणी की पहली पनडुब्बी का नाम आईएनएस-सिंधुघोष रखा गया। सोवियत संघ ने 1990 से 2000 के बीच किलो श्रेणी की दो और पनडुब्बियों को भारत को दिया था। जिससे इनकी संख्या कुल 10 हो गयी।
भारतीय नौसेना द्वारा आठ दिसम्बर को पनडुब्बी शाखा दिवस के रूप में मनाया जाता है। उस समय दिल्ली में पनडुब्बी शाखा के लिये एक नये महानिदेशालय का गठन किया गया, जब कि विशाखापत्तनम् में पनडुब्बी अड्डे की आधारशिला रखी गयी। इसका नाम बाद में आईएनएस-वीरबाहु रखा गया। भारतीय नौसेना ने अपने पनडुब्बी बेड़े की  स्वर्ण जयंती 8 दिसम्बर 2017 को बहुत ही धूमधाम से मनायी।
जब मैं परमाणुचालित पनडुब्बी ‘आईएनएस-चक्र’ के भारतीय नौसेना में कमीशनिंग समारोह का साक्षी बना
तारीख – 4 अप्रैल 2012। दिन- बुधवार, स्थान – शिप बिल्डिंग काम्पेक्स, विशाखापत्तनम्।
दिल्ली स्थित रक्षा पत्रकारों को परमाणुचालित पनडुब्बी आईएनएस-चक्र कमीशनिंग समारोह को कवर करने के लिए एक दिन पहले ही भारतीय वायुसेना के मध्यम परिवहन विमान ‘एएन-32 से विशाखापत्तनम् ले जाया गया। उसमें मैं भी था। नौसेना के हवाई अड्डे पर जब हमारे विमान ने लैंड किया तो मौसम खुशगवार और कुछ-कुछ नमी लिए हुए था। समुद्र की तरफ से तेज हवायें आ रही थीं। हम एक मिनी बस से फाइव स्टार होटल पर्ल पहुँचे,जहाँ हम लोगों के लिए ठहरने का बंदोबस्त था। लज़ीज़ लंच लेने के बाद हम लोग शहर और तटीय इलाकों में भ्रमण के लिए निकल गए। लेकिन शाम को लौटे तो सबने बार रूम की ओर रूख कर लिया। कुछ पत्रकार जल्दी ही वहां से निपटकर अपने-अपने रूम में पहुंच गये। क्यों कि अगले दिन सुबह 8 बजे ही पनडुब्बी के शामिल किए जाने के समारोह में पहुंचना था।
रूस से सजधज कर आई परमाणु पनडुब्बी ‘आईएनएस-चक्र’ को शानदार समारोह में रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने पनडुब्बी की पीठ पर नारियल फोड़कर भारतीय नौसेना के बेड़े में शामिल किए जाने की औपचारिकता का निर्वहन किया। इस पनडुब्बी के बारे में बता दूँ कि वस्तुत: यह अकुला-2 क्लास की पनडुब्बी है, जिसका रूसी नौसेना में नाम ‘नेरपा’ था। इस पनडुब्बी को भारत सरकार ने 900 मिलियन डालर में रूस से वर्ष 2011 में दस साल के लीज पर लिया है। हालांकि इसके लिए डील वर्ष 2004 में ही हो गई थी। और इसे अगले कुछ सालों में भारतीय नौसेना को प्राप्त हो जाना था, लेकिन इसमें वर्ष 2008 में एक विस्फोट हो जाने के कारण इसको भारत को हैंडओवर करने में विलम्ब हुआ। भारतीय नौसेना में आईएनएस-चक्र नाम से यह दूसरी पनडुब्बी है। प्रथम आईएनएस-चक्र, जो एक चार्ली क्लास की रसियन पनडुब्बी ही थी, उसे भारत ने 1987 में लीज पर लिया था और वह भारतीय नौसेना में 1991 तक रही।
पनडुब्बियों की र्वल्ड हिस्ट्री
पनडुब्बियों के उपयोग ने विश्व का राजनैतिक मानचित्र बदलने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। पनडुब्बियाँ किसी भी देश की नौसेना का विशिष्ट हथियार बन गई हैं। यद्यपि पनडुब्बियाँ पहले भी बनायी गयीं थीं, किन्तु ये उन्नीसवीं शताब्दी में लोकप्रिय हुई तथा सबसे पहले प्रथम विश्वयुद्ध में इनका जमकर प्रयोग हुआ। दुनिया की पहली पनडुब्बी एक डच वैज्ञानिक द्वारा सन 1602 में और पहली सैनिक पनडुब्बी टर्टल 1775 में बनाई गई। यह पानी के भीतर रहते हुए समस्त सैनिक कार्य करने में सक्षम थी और इसलिए इसके बनने के एक वर्ष बाद ही इसे अमेरिकी क्रान्ति में प्रयोग में लाया गया था। सन 1620 से लेकर अब तक पनडुब्बियों की तकनीक और निर्माण में आमूलचूल बदलाव आया। परमाणु शक्ति से चलने वाली पनडुब्बियाँ डीज़ल चालित पनडुब्बियों का स्थान लेती जा रही हैं। इसके बाद समुद्री जल से आक्सीजन ग्रहण करने वाली पनडुब्बियों का भी निर्माण कर लिया गया। इन दो महत्वपूर्ण आविष्कारों से पनडुब्बी निर्माण क्षेत्र में क्रांति सी आ गई। आधुनिक पनडुब्बियाँ कई सप्ताह या महीनों तक पानी के भीतर रहने में सक्षम हो गई है।
सेकन्ड र्वल्डवार के समय भी पनडुब्बियों का उपयोग परिवहन के लिये सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए किया जाता था। आजकल इनका प्रयोग पर्यटन के लिये भी किया जाने लगा है। पनडुब्बियों पर कई लेखकों ने पुस्तकें भी लिखी हैं। इन पर कई उपन्यास भी लिखे जा चुके हैं। पनडुब्बियों की दुनिया को छोटे परदे पर कई धारावाहिको में दिखाया गया है। हॉलीवुड के कुछ चलचित्रों जैसे आक्टोपस 1, आक्टोपस 2, द कोर में समुद्री दुनिया के मिथकों को दिखाने के लिये भी पनडुब्बियो को दिखाया गया है।
पनडुब्बियों की कुछ अजीबोगरीब दुर्घटनायें
22 मई 1968 को, जब वियतनाम युद्ध अपने चरम पर था तब अमेरिका की ‘यूएसएस-स्कॉर्पियन’ नामक पनडुब्बी उत्तरी अटलांटिक महासागर में कहीं खो गई। बड़े खोज अभियान स्वरुप, दुर्घटना के छह महीने बाद नवंबर 1968 में आयरलैंड के एज़ोरा से 725 किमी दूर दक्षिण पश्चिम में यह पनडुब्बी खोज ली गई। यह यहाँ पर तीन टुकड़ों में पाई गई। यह एक परमाणु पनडुब्बी थी जिसपर 99 लोग सवार थे और सभी मारे गये थे। इसका पिछला भाग इस प्रकार उखड़ा हुआ पाया गया जैसे किसी आंतरिक विस्फोट से उड़ाया गया हो। दुर्घटना के कारण आज भी रहस्य बने हुए हैं।
1943 में ‘यूएसएस-ट्रिगरफिश’ नामक पनडुब्बी शत्रुओं के जहाज़ों द्वारा नष्ट कर दी गई। इसका कोई चिन्ह नहीं मिला। 50 वर्षो बाद सन डीगो समुद्र तट पर यह फिर से पाई गई। इसके चालक दल का कोई सुराग नहीं मिला। पचास वर्षो तक यह पनडुब्बी पुरी तरह अज्ञात रही।
स्कॉटलैंड में नवंबर 2006 में आर्कने के समुद्र तट के पास 70 फीट की गहराई में दो रहस्यमयी पनडुब्बियों के अवशेष पाए गए। नवीनतम त्रिआयामी सोनार तकनीक से इन टुकड़ों के चित्र भी लिये गए, लेकिन इन पनडुब्बियों की राष्ट्रीयता नहीं पहचानी जा सकी। इनके चालक दलों का भी कोई चिन्ह नहीं मिला। अनुमान लगाए जा रहें है कि ये जर्मनी की यू बोट हैं जो द्वितीय वि युद्ध के दौरान नष्ट हुई होंगी।

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