मेरठ और बलिया से आज़ादी की कहानियां

क्रांति के अगुआ ‘पांचली’ को अंग्रेजों ने तोपों से उड़ा दिया था, अगस्त क्रांति के पुरोधा चित्तू बाबा के किस्से बच्चों को सुनाते हैं बुजुर्ग

आजादी की इबारत लिखने में बेशुमार कुर्बानियां ऐसी भी हैं जो वक्त की धूल में दबे इतिहास के पन्नों पर धुंधलाई सी दिखती हैं। मगर इनका जिक्र भर हर भारतीय की रगों में उबाल लाने के लिए काफी है। हम ऐसी ही दो कहानियां लाए हैं। एक मेरठ से जहां ब्रिटिश सल्तनत के खिलाफ पहली क्रांति हुई और दूसरे बलिया से जहां बाकी देश से 5 साल पहले पूर्ण स्वराज आया। ये कहानियां आजादी की जंग के साथ ही कुछ किरदारों की भी हैं।

पढ़िए कौन हैं ये किरदार…

क्रांति का अगुआ ‘पांचली’, यहां आज भी जख्मों से आंसू रिस रहे

4 जुलाई 1857 की सुबह अंग्रेजों ने पांचली गांव पर तोपें बरसा दीं। दो कुएं व एक तालाब लाशों से पट गया। गगोल गांव के 9 लोगों को दशहरे के दिन फांसी दी गई, तब से यहां दशहरा नहीं मना।

ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ 1857 में आजादी की पहली लड़ाई लड़ने वाले मेरठ में सैकड़ों गौरवगाथाएं दफन हैं। पांचली खुर्द ऐसा ही एक गांव है, जहां से शुरू हुई 1857 की क्रांति से ही देश को आजाद कराने की बुनियाद पड़ी। विरासत में मिलते चले आ रहे किस्से कहानियों को सुनाते हुए यहां के बुजुर्ग रो पड़ते हैं।

यहीं पर एक बड़े घर में मूढ़े पर बैठे 71 साल के वीर महेंद्र सिंह मिल जाते हैं। वह क्रांतिवीर कोतवाल धन सिंह की 7वीं पीढ़ी के वंशज हैं। कहते हैं, ‘इतिहास में कुछ नहीं है। जो हमारे पास था, उसे लोगों ने शोध के बहाने मांगकर कभी लौटाया नहीं।’ फिर सिंह गौरव गाथाओं के किस्से सुनाने लगते हैं। कहते हैं- 1857 अप्रैल का महीना था। दो अंग्रेज सिपाही और एक मेम गांव के बाग में पहुंचे।

बाग में मौजूद तीन किसानों मंगत, नरपत और झज्जड़ से इनकी कहासुनी हो गई। बात बढ़ी और संघर्ष हुआ तो एक अंग्रेज और मेम को पकड़ लिया गया, दूसरा अंग्रेज भाग गया और 25-30 सिपाहियों के साथ लौटा। दोषियों को गिरफ्तार करने की जिम्मेदारी कोतवाल धन सिंह के पिता को सौंपी गई, जो गांव के मुखिया थे। ऐलान हुआ कि यदि मुखिया ने तीनों बागियों को नहीं सौंपा तो गांव वालों को सजा मिलेगी।

इस पर नरपत और झज्जड़ ने समर्पण कर दिया, मंगत फरार ही रहे। दोनों को 30-30 कोड़े और जमीन से बेदखली की सजा मिली। मंगत के परिवार के तीन सदस्यों को फांसी दी गई। इस घटना ने धन सिंह सहित पांचली के बच्चे-बच्चे को विद्रोही बना दिया और एक दिन पहले ही 10 मई को मेरठ में सैनिक बगावत की योजना बन गई।

कोतवाल धन सिंह के नेतृत्व में देर रात 2 बजे जेल तोड़कर विद्रोह के आरोप में जेल में बंद 836 कैदी सैनिकों को छुड़ा लिया गया। बाद में पांचली और दूसरे गांवों के किसानों को अंग्रेजों ने नेस्तनाबूद कर डाला। मेरठ गजेटियर के अनुसार 4 जुलाई 1857 की सुबह 4 बजे पांचली पर एक अंग्रेज रिसाले (सैन्य टुकड़ी का नाम) ने तोपों से हमला किया।

रिसाले में 56 घुड़सवार, 38 पैदल सिपाही और 10 तोपची थे। पूरे गांव को तोपों से उड़ा दिया गया। सिंह बताते हैं- सैकड़ों किसान मारे गए, जो बच गए उनमें से 46 लोग कैद कर लिए गए और इनमें से 40 को बाद में फांसी की सजा दे दी गई। गांव में दो कुओं और एक तालाब को भी लाशों से भर दिया गया था। गगोल गांव के भी 9 लोगों को दशहरे के दिन फांसी दी गई और गांव को तबाह कर दिया गया। तब से इस गांव में कभी दशहरा नहीं मना।

ब्रिटेन आज भी अपने लोगों को यहां न जाने के लिए एडवाइजरी जारी करता है
1857 की क्रांति में जो अंग्रेज मारे गए थे, उनकी कब्रें मेरठ कैंट में हैं। इंग्लैंड से शोधार्थी और उनके परिजन यहां आते रहते हैं। ब्रिटिश हाईकमीशन आज भी इन्हें कैंट के 20 किमी के दायरे में फैले क्रांतिकारियों के गांवों में न जाने की एडवाइजरी जारी करता है। कई साल पहले एक ब्रिटिश शोधार्थी चुपके से पांचली गांव पहुंचा था और धन सिंह के वंशजों से मिला भी था।

बलिया में 50 हजार सपूतों के सामने ब्रिटिश हुकूमत ने टेके थे घुटने
यूपी के बलिया जिले का जश्न-ए-आजादी के दौर में अपना इतिहास है। 8 अगस्त 1942 को बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान (अब आजाद मैदान) से गांधीजी के ‘करो या मरो’ के आह्वान के बाद शेर-ए-बलिया चित्तू पांडेय की अगुवाई में इस बागी धरती के 50 हजार सपूतों के सामने ब्रिटिश हुकूमत को घुटने टेकने पड़े थे। 19 अगस्त 1942 को बलिया ने देश की पहली आजादी मनाई।

आज चित्तू पांडेय का गांव रट्टूचक बदहाली का शिकार है। रट्टूचक में न तो उनके नाम का कोई साइन बोर्ड है, ना कोई स्मारक। गांव के ओम प्रकाश बताते हैं कि इलाके में बुजुर्ग आज भी बच्चों को चित्तू बाबा की अगस्त क्रांति के किस्से सुनाते हैं। वे बताते हैं कि गांधी जी के आह्वान के बाद चित्तू पांडेय के नेतृत्व में जिला कारागार बलिया के बाहर 50 हजार लोग हाथों में हल, मूसल, कुदाल, फावड़ा, गुलेल लेकर पहुंच गए थे।

फिरंगियों के साथ मुठभेड़ में 20 से ज्यादा लोग शहीद हो गए। शाम तक ब्रिटिश हुकूमत ने घुटने टेक दिए। कलेक्ट्रेट सहित सभी सरकारी दफ्तरों पर तिरंगा फहराया गया और चित्तू ने बलिया को आजाद राष्ट्र घोषित करते हुए ब्रिटिश सरकार के समानांतर स्वतंत्र बलिया प्रजातंत्र सरकार का गठन किया। वे सरकार के प्रधान बने।

हफ्ते भर बाद क्रूर अंग्रेज अफसर नेदरसोल की अगुवाई में अंग्रेजों ने बलिया से आजादी छीन ली। नेदरसोल 22 अगस्त को सेना लेकर बलिया पहुंचा। ब्रिटिश सेना ने गांव के गांव जला दिए, पर चित्तू पांडेय को गिरफ्तार नहीं कर सकी। इस बगावत की चिंगारी ने पूरे देश में आजादी की लड़ाई में नई ऊर्जा का संचार किया था। इस छोटी-सी घटना के महत्व को इस तरह समझा जा सकता है कि बीबीसी ने अपने बुलेटिन में बताया था कि बलिया पर दोबारा ब्रितानी हुकूमत का कब्जा हो गया है।

शहीद चित्तू पांडेय के प्रपौत्र हरीश पांडेय कहते हैं कि मुझे चित्तू बाबा पर गर्व है। उन्होंने जो देश के लिए किया वह करना ही चाहिए था। यहां गांव-गांव आजादी की तमाम अनसुनी गर्वीली गाथाएं बुजुर्गों की जुबान पर जिंदा हैंं।ऐसा ही एक किस्सा चित्तू पांडेय के पौत्र रामजी की पत्नी सुुशीला बताती हैं कि अंग्रेजी हुकूमत शेर-ए-बलिया को गिरफ्तार करने आई थी, सूचना पाकर बाबा ने ठिकाना बदल दिया। गिरफ्तारी न होने से तिलमिलाए अंग्रेजों ने घर की कुर्की कर दी। मिट्‌टी का पलीता छोड़कर घर का सारा सामान ले गए। 1946 में उनका निधन हो गया।

बलिया में मनता है क्रांति उत्सव, बच्चे-बच्चे की जुबां पर क्रांति के नारे
स्वतंत्रता सेनानी कल्याण परिषद बलिया के मंत्री शिव कुमार कहते हैं कि बलिया आज भी अपने क्रांतिवीरों को याद करता है। उनके सम्मान में हर साल 9 से 25 अगस्त तक अगस्त क्रांति उत्सव मनाया जाता है। इस साल भी गांव-गांव में यह उत्सव शुरू हो चुका है। उत्सव गीत गाए जा रहे हैं और क्रांति जुलूस निकल रहा है। बच्चे आजादी के तराने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे, बलिया एक अमिट निशानी है, क्रांति-क्रांति है रगरग में सबकी यही जबानी है’ गाते दिख रहे हैं।

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