विवादों का निपटारा करने में अक्षम नेतृत्व के अभाव में डूब रही कांग्रेस की नाव

देश का सबसे पुराना दल धीरे-धीरे अपना जादू ही नहीं अस्तित्व भी खोता जा रहा है. महज़ तीन राज्यों- पंजाब, छत्तीसगढ़ राजस्थान तक सिमटी कांग्रेस में अंदरूनी कलह मुखर होती जा रही है. पार्टी की चुनावी संभावनाओं के लिए अब अन्य राज्यों में पार्टी को अपना किला बचाने पर ध्यान देना होगा. हालांकि ये पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होती जा रही है क्योंकि अंदरूनी कलह का निपटारा होता दिख नहीं रहा है और आलाकमान शांति स्थापित करने में असमर्थ नज़र आ रहा है. पंजाब में कलह को खत्म करने के लिए आलाकमान देर से जागा और मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के खिलाफ बुलंद होते विरोध के सुर को दबाने के लिए नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) का प्रमुख बनाया गया. लेकिन इससे मामला निपटता नज़र नहीं आ रहा है और पार्टी में मौजूद असंतुष्टों ने छह महीने बाद होने वाले चुनाव के अभियान के लिए नए चेहरा लाने की मांग की है.

आलाकमान के हाथ से कमान छूटना है वजह…
वरिष्ठ नेता जैसे मल्लिकार्जुन खड़गे और हरीश रावत जिन्हें केंद्र का दूत माना जाता है, अंसतुष्टों को ठीक करने या राज्य के क्षत्रपों से अपना वादा पूरा कराने में असफल रहे हैं. इस सब के पीछे महज एक वजह है आलाकमान के हाथ से कमान छूटना. इसका नतीजा 2017 में गोवा और मणिपुर मे देखने को मिला जब भाजपा ने कांग्रेस के मुंह से उसका निवाला छीन लिया. इसी तरह मध्यप्रदेश में कमलनाथ की सरकार और कर्नाटक में जेडी (एस) के गठबंधन में बनी सरकार खुद को बचाए नहीं रख सकी. कांग्रेस पार्टी इस वक्त उस नाव की तरह है जो बिना पतवार के बह रही है, ये पार्टी के लिए विपक्ष के तौर पर भी चिंता की बात है. ऐसे में ज़रूरी है कि कांग्रेस को अपने घर संभालने और उसकी नींव को मजबूत करने के लिए अपने नेतृत्व में सुधार लाना होगा और आलाकमान को बेलगाम होती कांग्रेस की कमान को तुरंत संभालना होगा.

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