नटराज और अप्सरा पेंसिल की कहानी:

तीन दोस्तों ने जर्मनी से सीखकर मुंबई में शुरू किया बिजनेस; आज 50 देश खरीदते हैं हिंदुस्तान की पेंसिल

नटराज और अप्सरा दोनों एक ही कंपनी के पेंसिल ब्रांड्स हैंडुअल मार्केटिंग के जरिए कंपनी ने 60% बाजार पर जमाया कब्जा

शुरू हुई पेंसिलों की दौड़, और ये देखिए दूसरी पेंसिलों का हाल। जीत की तरफ बढ़ती हुई नटराज पक्की पेंसिल…और नटराज फिर चैंपियन।

बचपन की कुछ यादें मिटाई नहीं जा सकतीं। नटराज पेंसिल का ये ऐड उन्हीं में से एक है। बड़े होने पर अब भले ही पेंसिल से दूरी बन गई हो, लेकिन अपनी फेवरेट पेंसिल की कहानी आप आज भी जानना चाहेंगे। तो चलिए, शुरू से शुरू करते हैं…

भारत में था विदेशी पेंसिलों का दबदबा

गुलामी के दिन थे। सूई से लेकर रेल तक विदेशों से बनकर आते थे। पेंसिल भी उन्हीं में से थी। 1939-40 के दौरान भारत में करीब 6.5 लाख रुपए की पेंसिल यूके, जर्मनी और जापान जैसे देशों से इम्पोर्ट की जाती थी। द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के बाद अचानक सप्लाई थम गई। ऐसे में कुछ देसी कारोबारियों ने पेंसिल बनाने का फैसला किया। कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास में कई कारखाने लगाए गए।

सरकार की मदद से पनपे देसी निर्माता

द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद विदेशी सप्लाई एकबार फिर शुरू हो गई। उनके सामने देसी पेंसिलें कहीं नहीं टिकती थी। ऐसे में धंधा चौपट होने लगा तो सभी पेंसिल निर्माताओं ने सरकार से मदद की गुहार लगाई। आजादी के बाद सरकार ने पेंसिल के आयात पर कुछ प्रतिबंध लगाए जिससे देसी निर्माताओं को पनपने का मौका मिला। हालांकि देसी पेंसिलों से कंज्यूमर संतुष्ट नहीं थे। विदेशी पेंसिलों के मुकाबले ये कमजोर और महंगी होती थीं।

1958 में नटराज पेंसिल की शुरुआत

बीजे सांघवी, रामनाथ मेहरा और मनसूकनी नाम के तीन दोस्त थे। इन्होंने मिलकर 1958 में हिंदुस्तान पेंसिल्स नाम की कंपनी शुरू की। पेंसिल के बिजनेस को इन्होंने जर्मनी जाकर समझा था। कंपनी का पहला प्रोडक्ट नटराज पेंसिल ही थी। विदेश से सीखकर आने की वजह से इन्होंने मजबूत और किफायती पेंसिल बनाई। धीरे-धीरे ये पेंसिल लोगों को पसंद आने लगी। बाद में सांघवी ने फैक्ट्री का कंट्रोल अपने हाथों में ले लिया।

नटराज और अप्सरा दोनों एक ही कंपनी के ब्रांड

बचपन के दिनों को याद कीजिए। जब आपके पास नटराज पेंसिल होती थी और आपकी बहन के पास अप्सरा पेंसिल। दोनों में एक दूसरे से बेहतर पेंसिल साबित करने की होड़ लगी रहती थी। बचपन की उन सारी लड़ाइयों पर अब हंसी आ सकती है क्योंकि नटराज और अप्सरा दोनों एक ही कंपनी यानी हिंदुस्तान पेंसिल्स के ही ब्रांड हैं।

नटराज की शुरुआत 1958 में ही हो गई थी। 1970 में अप्सरा पेंसिल शुरू हुई। शुरुआत में इसका फोकस ड्राइंग पेंसिल के तौर पर था। बाद में अप्सरा के नाम से भी वो सारे प्रोडक्ट्स बनने लगे जो नटराज के नाम से बनते थे। इस वक्त नटराज और अप्सरा के प्रोडक्ट्स की रेंज राइटिंग पेंसिल, इरेजर, शार्पनर, स्केल, वैक्स क्रेयॉन, ऑयल पेस्टल, मैथमेटिकल इंस्ट्रूमेंट, वाटर कलर, बाल प्वॉइंट और जेल पेन तक है।

कंपनी ने डुअल ब्रांड स्ट्रैटजी से उठाया फायदा

एक ही कंपनी के होने के बावजूद नटराज और अप्सरा के लिए डुअल ब्रांड स्ट्रैटजी अपनाई गई। नटराज को ज्यादा मजबूत और किफायती पेंसिल के तौर पर पेश किया गया। अप्सरा को प्रीमियम पेंसिल के तौर पर दिखाया गया। इनके विज्ञापन भी इसी तरह प्लान किए गए। नटराज की टैगलाइन थी- फिर से चैंपियन और अप्सरा की टैगलाइन थी- फाइव मार्क्स एक्स्ट्रा।

दोनों ब्रांड की पोजिशनिंग अलग है और इनका कंज्यूमर बेस भी अलग है। इस स्ट्रैटजी से सभी तरह के कंज्यूमर कवर हो गए। इससे किसी दूसरी कंपनी को जगह बनाने की गुंजाइश ही नहीं बची। हिंदुस्तान पेंसिल्स लगातार कई दशकों से देश की नंबर वन पेंसिल कंपनी बनी हुई है।

पेंसिल के लिए जंगल की लकड़ी का इस्तेमाल नहीं

एक पेड़ से करीब 1.70 लाख पेंसिल बनाई जाती है। हिंदुस्तान पेंसिल्स रोजाना 85 लाख पेंसिल बनाता है यानी रोज 50 पेड़ काटने पड़ते हैं। कंपनी का दावा है कि वो प्रकृति को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। पेंसिल के लिए जंगल की लकड़ी का इस्तेमाल करने की बजाय वो इसे खेतों में फसल की तरह उगाते हैं।

पुलवामा जिले (जम्मू-कश्मीर) का ओखू गांव पेंसिल गांव के नाम से जाना जाता है। करीब 250 घरों वाले इस छोटे से गांव में तीन फैक्ट्रियां हैं जो लकड़ी की स्लेट बनाती हैं। इसका इस्तेमाल पेंसिल बनाने में होता है। यहीं से हिंदुस्तान पेंसिल्स को ज्यादातर कच्चे माल की सप्लाई होती है।

हिंदुस्तान पेंसिल्स का डोम्स और कैमलिन से मुकाबला

भारत का पेंसिल मार्केट कुछ गिने-चुने बिजनेस परिवारों के हाथ में है। हिंदुस्तान पेंसिल्स के कॉम्पिटिटर्स में डोम्स और कैमलिन पेंसिल हैं। चीन, ब्राजील और जर्मनी दुनिया के सबसे बड़े पेंसिल बनाने और एक्सपोर्ट करने वाले देशों में हैं। इस कारोबार में वहां की सरकारें भी काफी निवेश करती हैं। हिंदुस्तान पेंसिल्स ने बिना सरकारी मदद और विदेशी निवेश के न सिर्फ भारत में विदेशी प्लेयर्स को नहीं टिकने दिया बल्कि 50 देशों में एक्सपोर्ट भी कर रहा है।

सांघवी फैमिली के हाथ में आज भी कंपनी

इस वक्त हरेंद्र और कीर्ति कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं। उनके बच्चे भौमिक और ध्रुमन अहम पद संभाल रहे हैं। इसके अलावा फैमिली के कई अन्य मेंबर्स भी लीडरशिप रोल में हैं। पिछले कुछ सालों में हिंदुस्तान पेंसिल्स की ग्रोथ धीमी हुई है। कंपनी का नेट प्रॉफिट मार्जिन बेहद कम है। टॉफ्लर के मुताबिक 2018 में हिंदुस्तान पेंसिल्स का नेट प्रॉफिट मार्जिन 0.15% रहा है। कंपनी का प्रॉफिट 2015 में 9 करोड़ रुपए था जो 2018 में घटकर 1.17 करोड़ रह गया।

सांघवी फैमिली और सीनियर मैनेजमेंट हमेशा लाइमलाइट से दूर रहना पसंद करता है। इसलिए उनकी स्ट्रैटजी का ज्यादा पता नहीं चलता। फिलहाल उनका फोकस बिजनेस डायवर्सिफाई करने पर है। यानी वो पेंसिल के अलावा अन्य सभी तरह की स्टेशनरी का बिजनेस बढ़ाना चाहते हैं। साथ ही साथ पेंसिल मेकर्स को भरोसा है कि पेनलेस, पेपरलेस स्कूल और ऑफिस का आइडिया निकट भविष्य में पूरा होने वाला नहीं है।

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