“इस्लामिक सेंटर में हिंदू भी मेंबर होंगे,” अड़ गए वे मुसलमान..लड़ाई बस तालीम की है!

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वरिष्ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह की कलम से

झारखण्ड में एक मुस्लिम नौजवान तबरेज़ अंसारी को कुछ गुंडों ने पेड़ से बांधा ,उसकी पिटाई की और उसकी जान ले ली | तबरेज़ पर उन लोगों ने चोरी का आरोप लगाया था | राजस्थान से खबर है कि गौपालक किसान पहलू खान के ऊपर पुलिस ने जानवरों की रक्षा से सम्बंधित कानून का उन्लंघन करने का आरोप लगाकर मुक़दमा चलाने का फैसला लिया है | इसके अलावा भी देश में कई जगह मुसलमानों की लिंचिंग की ख़बरें आती ही रहती हैं | जहां हर मामूली घटना पर पर सत्ताधारी पार्टी के बड़े नेता, ट्वीट करते रहते हैं ,मुसलमानों की हत्याओं के बारे में आम तौर पर उनकी चुप्पी देखी जाती है | अगर पूछा जाए तो टका सा जवाब दे दिया जाता है कि कानून अपना काम कर रहा है | भीड़ द्वारा ह्त्या का सिलसिला करीब पांच साल पहले दिल्ली के पास दादरी के एक गाँव से शुरू हुआ था | अखलाक नाम के एक मुसलमान को उसके घर में घुसकर मार दिया गया था | उस पर गौमांस रखने का आरोप था | अखलाक की ह्त्या कोई छिटपुट ह्त्या नहीं थी | योजनाबद्ध तरीके से उसको टार्गेट करके मारा गया था | पुलिस ने कार्रवाई भी ,कत्ल का मुक़दमा दर्ज किया | लेकिन भाजपा के मुकामी नेताओं ने पुलिस की कार्रवाई का विरोध किया और कहा कि क़त्ल नहीं ग़ैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया जाना चाहिए | उनका कहना था कि ,’ अखलाक ने अपने फ्रिज में गोमांस रखा था इसलिए इलाके के हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं भड़क उठीं और अखलाक की हत्या हो गई | उसकी ह्त्या किसी ने किसी योजना के तहत नहीं किया था |’ इस मामले में अखलाक को ही मुलजिम बनाने की कोशिश की गयी | इस काम में पुलिस का भी सहयोग था | जो लोग वहां मौजूद थे उनके अनुसार अखलाक की हत्या गाँव के मंदिर से किए गए इस ऐलान के बाद की गई कि अख़लाक़ ने गाय काटी है और गोमांस खाया है | ऐसा लगता है कि लोगों का ग़ुस्सा भड़का और क्षणिक आवेश में ह्त्या हो गयी लेकिन ऐसा नहीं था | वहां पर बहुत दिनों से चल रहे आक्रामक हिन्दुत्ववादी प्रचार और मुस्लिम विरोधी माहौल के बाद इस ह्त्या को अंजाम तक पंहुचाया गया था | यह नफरत का लगातार बन रहे माहौल का नतीजा थी | अखलाक की ह्त्या दुनिया भर में अखबारी सुर्खियाँ बन गयी लेकिन यह कोई अकेली घटना नहीं थी. मुसलमानों की मामूली बात पर पिटाई और उन्हें बेइज्ज़त करने की घटनाओं की ख़बरें उसके पहले भी मिलती रहती थीं , आज भी मिल रही हैं .ऐसा लगता है कि मुसलमानों को आतंकित करने की कोई मुहिम चल रही है.

दादरी की घटना के पहले मुज़फ़्फ़रनगर में भी बड़े पैमाने पर मुस्लिम विरोध की राजनीति देखी गयी थी . वहां भी मुसलमानों को टार्गेट करके ही दंगे की योजना बनाई गयी थी . उसके बाद जो हुआ वह दुनिया को मालूम है . मुसलमानों को बड़े पैमाने पर क़त्ल किया गया , उसमें शामिल लोगों को सत्ताधारी पार्टी की तरफ से इनाम अकराम दिया गया , बड़े पैमाने पर धार्मिक पोलराइज़ेशन किया गया और कुछ मामलों में मुसलमानों पर ही आरोप लगाया गया कि उनके उकसाने के कारण ही प्रतिक्रिया में हिन्दू भावना आहत हुयी और हिंसक वारदात हुयी. . ज्यादातर मामलों में यही पैटर्न देखा जा सकता है . एक और बात देखी जा सकती है कि जब इस तरह की बातें अखबारी सुर्ख़ियों से बाहर हो जाती हैं तो पुलिस वाले पीड़ित को ही मुलजिम बनाकर मुक़दमा शुरू कर देते हैं .राजस्थान के पहलू खान के मामले को इस तरह की मानसिकता का ताज़ा उदाहरण माना जा सकता है . मामला अखबारों में छप गया तो सरकारी तौर पर सफाई आ गयी कि पहलू खान का ” नाम ” चार्जशीट में नहीं है लेकिन सबको मालूम है कि जिस तरह से चार्जशीट बनाई गयी है उसके हिसाब से मुक़दमे के दौरान पहलू खान का फंसना तय है .

पिछले करीब पन्द्रह वर्षों से समाज में एक अजीब ट्रेंड देखा जा रहा है . जिस देश और समाज में पहले सेकुलर होना गर्व की बात मानी जाती थी और साम्प्रदायिक मानसिकता के लोग ऐलानियाँ कुछ भी नहीं बोलते थे , उसी समाज में मुसलमानों के खिलाफ बोलने वाले या उनको पाकिस्तान भेजने की धमकी देने वालों की संख्या बढ़ी है और वे अब समाज में गर्व से रहते हैं . बड़े बड़े अफसर भी निजी बातचीत में इसी तरह की बात करते पाए जाते हैं . अपनी बातचीत को सही साबित करने के लिए टेलिविज़न पर चल रही बहसों का हवाला देना भी आजकल फैशन में है. कई बार इन बहसों में निहायत ही जाहिल किस्म के दाढ़ी टोपी वाले लोगों को बैठा लिया जाता है जो दीनी मामलों की कोई जानकारी नहीं रखते और बहस में मौजूद साम्प्रदायिक लोगों की बेबुनियाद बातों का जवाब देने की कोशिश में कोई न कोई ऐसी बात कह देते हैं जो बिलकुल गलत होती है , इस्लाम की मान्यताओं के खिलाफ होती है लेकिन दंगा भड़काने का माद्दा रखती है . आजकल कुछ ऐसे भी मुसलमान देखे जा रहे हैं जो बीजेपी की सरकार के नेताओं को खुश करने के लिए मुसलमानों और इस्लाम की मान्यताओं के खिलाफ बोलते हैं,इस्लाम की बुनियादी बातों को तोड़ मरोड़ कर पेश करते हैं और सरकार से कुछ फायदे की उम्मीद करते हैं. ऐसे ही एक मौलाना साहब ने एक दिन टीवी की बहस में भगवान राम और अल्लाह की तुलना करने के चक्कर में ऐसी बात कह दी जिसके बाद वहीं स्टूडियो में ही मौजूद कैमरामैन गुस्सा हो गए . मैंने जब उनको समझाने की कोशिश की तो मुझे भी समझाने लगे . उनको डांट कर माहौल को शांत कराया गया .ऐसे लोगों के हवाले से आज ऐसा माहौल बन गया है कि हिन्दू युवकों का वर्ग इस्लाम को ही आतंक का धर्म घोषित करने की कोशिश करता पाया जा रहा है . एक बात और देखी गयी है . जहां भी इस तरह के विवाद की नौबत आ रही है उसमें शिक्षा का गिरता स्तर सबसे ज्यादा जिम्मेवार है. १९८० के पहले के दशक में हिन्दू और मुसलमान अपने अपने धर्म को राजनीतिक आचरण की बुनियाद मानने से परहेज करते थे. छिटपुट मामलों में चुनाव के समय इस तरह की चीज़ें देखी जाती थीं लेकिन यह समाज का स्थाई भाव नहीं था. लेकिन जबसे बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आया है तब से कोई भी बातचीत शुरू कीजिये धार्मिक चर्चा ज़रूर शुरू हो जाती है .इस तरह की अहमकाना सोच के लिए हिन्दू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के नेता ज़िम्मेदार हैं . हिन्दुत्ववादी कट्टरपंथियों को तो खैर सत्ता के बड़े पद दिए जा रहे हैं लेकिन मुसलमान कट्टरपंथी भी खूब चल रहे हैं . दिल्ली का इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर मुक़म्मल तौर पर एक सेकुलर इदारा है . वहां अगर कोई फिरकापरस्ती की बात करता है तो उसको वहां के ज़िम्मेदार लोग डांट डपट कर चुप करवा देते हैं . दो घटनाओं का ज़िक्र करके बात को स्पष्ट करने की कोशिश की जायेगी . इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में बड़ी संख्या में हिन्दू भी मेंबर हैं . पिछले साल सेंटर की सालाना बैठक में एक सदस्य ने कहा कि ,” यह मुसलमानों का इदारा है और इसमें हिन्दुओं को मेंबर नहीं बनाया जाना चाहिए ” . वे अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाए थे कि कई लोगों ने उनको डांटना शुरू कर दिया . इस घटना के कुछ महीने पहले इस्लामिक सेंटर के एक सेमीनार में एक मौलाना साहब ने अपनी तक़रीर में कह दिया कि हम ने इस देश में आठ सौ साल अपनी बाजुओं के जोर पर राज किया है . उनका यह कहना था कि मंच पर ही मौजूद एक बड़े पत्रकार ने उनको डपट दिया और कहा कि इस तरह की बेवकूफी की बात करना बिलकुल गलत है .

इसी तरह से अभी कुछ साल पहले तक जब हिन्दुओं की सभाओं में धार्मिक उन्माद फ़ैलाने की बात कोई भी करता था तो उसको चुप करा दिया जाता था लेकिन अब वह बात नहीं रही. अब लोग ऐलानियां सेकुलर सोच के नेताओं और बुद्धिजीवियों को गाली देने लगे हैं . सवाल उठता है कि इस तरह की सोच आ कहाँ से रही है . बड़े पदों पर बैठे अफसर, नेता, पुलिस वाले सब साम्प्रदायिक क्यों हो रहे हैं .मुझे लगता है कि इसके पीछे हमारी प्राइमरी और माध्यमिक शिक्षा का कुप्रबंध है . शिक्षा के शुरुआती वर्षों में आज़ादी की लड़ाई की मूलभावना के प्रति सम्मान की शिक्षा नहीं दी जा रही है . आजादी की लड़ाई में पूरा देश शामिल था . हिन्दू महासभा , मुस्लिम लीग और आर एस एस के अलावा बाकी सभी राजनीतिक जमातें शामिल हुई थीं. मुस्लिम लीग के सिर पर देश के बंटवारे का गुनाह था , हिन्दू महासभा और आर एस एस के बड़े नेता महात्मा गांधी की ह्त्या के मुकदमे में अभियुक्त रह चुके थे . इसलिए वे सर झुका कर रहते थे . लेकिन अब वे लोग महात्मा गांधी के हत्यारे को महिमा मंडित करते हैं . बीजेपी की आतंकवाद की अभियुक्त एक नेता ने तो महात्मा गांधी के हत्यारे को देशभक्त कह दिया था . अब धार्मिक उन्माद फ़ैलाने वाले समाज की मुख्यधारा में हैं और वे संसद तक पंहुंच चुके हैं . इसके लिए शिक्षा प्रणाली की कमी ज़िम्मेदार है. ज़रूरी यह है कि बुनियादी शिक्षा के गिर रहे स्तर को फौरन दुरुस्त किया जाए वरना गलत शिक्षा समाज और देश की एकता के लिए बहुत नुकसान का कारण बनेगी.

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