अफगानिस्तान में बदले सियासी हालात पर बुरी तरह घिरा अमेरिका

प्रमुख दक्षिण एशियाई रणनीतिक विशेषज्ञ सी. क्रिस्टीन फेयर, जोकि जॉर्ज राऊन विश्वविद्यालय में एडमंड ए. वॉल्श स्कूल ऑफ फॉरेन सर्विस में सुरक्षा अध्ययन कार्यक्रम में एक सहयोगी प्रोफैसर हैं, का कहना है कि पाकिस्तान और चीन के साथ तालिबान के अफगानिस्तान के अधिग्रहण में भारत सबसे खराब स्थिति में है। वहीं अफगानिस्तान के मौजूदा हालात को लेकर अमरीका बुरी तरह घिर गया है और उसकी कड़ी आलोचना हो रही है। अमरीकी राजनीतिक वैज्ञानिक का कहना है कि यह जैश-ए-मोहम्मद और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के तालिबों (इस्लामी मदरसा के छात्रों) के लिए एक तरह की घर वापसी है। उसने बताया कि भारत के पास कम से कम अनुकूल विकल्प होंगे, क्योंकि रूस और चीन जल्द ही तालिबान को पहचान देंगे।

फेयर ने कहा-अफगानिस्तान के संसाधन चीन की महत्वाकांक्षी बैल्ट रोड इनिशिएटिव (बी.आर. आई.) बुनियादी ढांचा परियोजना के करीब होगी। एक लिहाज से देखें तो यह चीन के लिए एक जीता है, जबकि दुख की बात है कि भारत बड़ा हारने वाला है। फेयर ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि तालिबान के पीछे पाकिस्तान सबसे बड़ी ताकत है। पाकिस्तान के खुफिया और सैन्य प्रतिष्ठान के निरंतर समर्थन के बिना तालिबान लड़ाई नहीं लड़ सकता है। फिर भी, भारत अफगानिस्तान में इस समय एकमात्र जिम्मेदार अभिनेता है, जो लोगों को आपातकालीन और मुफ्त वीजा प्रदान करता है।”फेयर ने ट्वीट किया कि शुभकामनाएं और जय हिंद। मुझे उम्मीद है कि दुनिया भारत की उदारता को याद रखेगी। वैश्विक नेता यही करते हैं। वे नेतृत्व करते हैं। दुर्भाग्य से, यूरोपीय देश अफगानों को एक खतरे के रूप में देखते हैं और इन पीड़ितों को एक शासन स्थापित करने में मदद नहीं करते हैं। बाइडेन भली-भांति जानते हैं अमरीका की अत्यधिक आलोचक फेयर ने (वैश्विक अमरीकी समाचार प्रकाशन, 1970 में सैमुअल पी.हंटिंगटन द्वारा सह-स्थापित)में फॉरेन पॉलिसी में लिखा, “यू.एस. अधिकारी अमरीका के अफगानिस्तान से बाहर निकलने  को सही ठहराने वाले उपदेश दे रहे हैं। उन्होंने घोषणा की है कि अफगान राष्ट्रीय सुरक्षा बलों के लिए अपने देश की बागडोर संभालने का समय आ गया है।

अफगान नेताओं को एकजुट होना चाहिए और अपने देश के लिए लड़ना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि संयुक्त राज्य अमरीका ने अफगानिस्तान के लिए काफी कुछ किया है। हालांकि यह विशुद्ध रूप से मूर्खता है और बाइडेन इसे भली-भांति जानते हैं। संयुक्त राज्य अमरीका ने बहुत कुछ नहीं किया है और यहां तक कि मौजूदा हमले भी उसी की शह पर हो रहे हैं।” वह आगे कहती हैं, “बाइडेन अनजाने में इस स्थिति में नहीं आए। बाइडेन ओबामा प्रशासन में वरिष्ठ अधिकारी रह चुके हैं और पूर्व सी.आई.ए.विश्लेषक ब्रूस ओ. रिडेल अमरीकी सुरक्षा, दक्षिण एशिया और आतंकवाद विरोधी अमरीकी विशेषज्ञ हैं तथा दक्षिण एशियाई मामलों के वरिष्ठ निदेशक पीटर आर. लावॉय के साथ काम कर चुके हैं।”

यूरोप सहित अन्य देशों में फिर दिखेगा शरणार्थी संकट
तालिबान के अफगानिस्त पर कब्जे के बाद अफगानी नागरिक देश छोड़कर भाग रहे हैं और यूरोप सहित दूसरे देशों से पनाह मांग रहे हैं। ऐसे में अगर अंतर्राष्ट्रीय समदाय तालिबान पर दबाव बनाने में विफल रहता है तो यूरोप में फिर शरणार्थी संकट गहरा सकता है। वैसे अफगान शरणार्थियों की समस्या दशकों पुरानी है। 1978 के गृह युद्ध और 1979 में सोवियत संघ के आक्रमण के पश्चात अफगान नागरिकों का विस्थापन और दूसरे देशों में शरण लेने की प्रक्रिया शुरू हुई जो बाद के दशकों में भी तालिबान के सत्ता आने और क्रूरता के साथ शरिया जनून को लागू करने की वजह से जारी रही।

वर्ष 2001 में ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध शुरू किए जाने की वजह से भी विस्थापन की प्रक्रिया चलती रही। वर्तमान समय में भी अफगानियों का देश छोड़कर यूरोप में शरण लेने के लिए जाने के अनेक कारण हैं। अमरीकी सेना की वापसी के बाद अफगानिस्तान में सुरक्षा स्थिति कमजोर हुई है तथा । यूरोपीय देशों में सरकारें ‘शरणार्थी संकट’ की समस्या जूझ रही हैं। शरणार्थी पहले ही अपने जीवन को खतरे में डाल कर कभी वैधानिक तो कभी अवैधानिक तरीके से यूरोप पहुंचने को तैयार हैं।

ये कदम उठाने होंगे
• संघर्ष का शांतिपूर्ण और बातचीत से अंत तभी संभव है जब सरकार के गठन में सभी अफगान हितधारक शामिल हों।
• इस दिशा में अफगान नेताओं के अलावा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को एक समावेशी अंतरिम सरकार के तौरतरीकों पर चर्चा करने के लिए अफगानिस्तान के बाहर एक साथ बैठने की जरूरत है।
• जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई के बिना मौखिक दावों के आधार पर तालिबान शासन को मान्यता देने की कोई हड़बड़ी प्रतिकूल होगी। तालिबान की वास्तविक मंशा का एकमात्र प्रमाण राजनीतिक समायोजन है।
•अल कायदा और अंतर्राष्ट्रीय आतंकी समूह तथा सबसे महत्वपूर्ण रूप से भारत केंद्रित आतंकी समूह तालिबान के संरक्षण में काम करते हैं।
•अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध व्यवस को तब तक नहीं हटाना चाहिए जब तक तालिबान विशेष रूप से विदेशी आतंकवादी समूहों पर कार्रवा के साथ अपने दावों को साबित नहीं करता।
• अफगानिस्तान को फिर से अंतर्राष्ट्रीय आतंक समूहों का आधार बनने से रोकने के लिए उन्हें संरक्षित करने की आवश्यकता है।

अफगानिस्तान को कब्जाने के दौरान तालिबान ने क्या कब्जा किया
काबुल (विशेष)- केवल एक हफ्ते में, अफगानिस्तान के नए शासक तालिबान शहर-दर-शहर कब्जा कर लिया और में कावलको अपने नियंत्रण में ले लिया जिससे उनकी जीत पूरी हुई। जिस आश्वषजनक गति से तालिवान ने व्यापार मार्गों पर कम्जा किया है और सीमा पार से आगे निकल गए वह जीन अमरीका और नाटो सैनिकों की पूरी तरह से वापसी के कुछ हफ्ते पहले हई है और यह अमरीका निर्मित हथियारों से संभव हुई है. जिन्हें तालिबान लडाकों ने देश पर कब्जा कर लिया था। जब्त किए गए उपकरणों में राइफल और बॉडी आर्मर सूट और कुछ महंगी हथियार प्रणाली शामिल हैं। यहां सूची है। तालिवान लड़ाके आग्नेयास्त्रों और वाहनों के तालिबानन निकल ना जायसी कशा से संभाल लिया था पानिकों की ममका निदेश पर और बॉडी 3 साथ पूनते हुए देखे जाते हैं जिनका उपयोग अमरीकी सैनिकों ने किया या अफगान राष्ट्रीय सुरक्षा बलों को प्रदान किया।का वीडियो सामने आए हैं जिनमें वे एडवांस्ड यू.एच-60 लैक हॉक अटैक हैलीकॉप्टर का उपयोग करते हए दिखाई देते हैं।

•विद्रोहियों दशकों से सुनी पश्तून समूह से लड़ रहे अफगान सरदार अब्दुल राशिद दोस्तम के महलनुमा आवास पर भी कब्जा कर लिया। उत्तरी शहर मजार-एशरीफ में तालिबान के हमले के दौरान आवास पर कब्जा कर लिया गया था।
•कुछ तालिबान लडाकों को अमरीकी तोपों के लिए अपनी रूसी निर्मित एके-47 राइफलों की ट्रेडिंग करते हुए भी देखा गया है। उन्हें अफगान सेना द्वारा फैकी गई एम.-4 कार्बाइन और एम.-16 राइफलें ले जाते हुए देखा गया था।
• उत्तरी शहर कुंदुज में आत्मसमर्पण करने वाले अफगान सैनिकों की फुटेज में सेना के वाहनों को भारी हथियारों से लदे हुए तथा तोपखाने की तोपों के साथ दिखाया गया है।
• तालिबान ने भारत द्वारा अफगानिस्तान को उपहार में दिए गए एम.आई.-24 हैलीकॉप्टरों पर भी नियंत्रण हासिल कर लिया है। कुंदुज शहर के गिरने पर कुछ लड़ाकों ने हेलीकॉप्टर के ठीक बगल में खड़े होकर तस्वीरें क्लिक की हैं। फोटो में हमले के हैलीकॉप्टर के शटर ब्लेड गायब थे, यह दर्शाता है कि तालिबान को उनका इस्तेमाल करने से रोकने के लिए अफगान बलों – उन्हें हटा दिया था।

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