भविष्य में भारत ही पढ़ाएगा आतंक के प्रतिरोध का पाठ

अफगानिस्तान के जमीनी हालात दुनिया के सामने हैं और जो दिख रहा है वही भारतीय कूटनीति Indian diplomacy on Afghanistan को लेकर कयास की वजह है। तालिबान ने अपनी विचारधारा नहीं बदली है, यही बात भारत के पक्ष में जाएगी।

अफगानिस्तान Afghanistan पर तालिबान Taliban का कब्जा होने के बाद ज्यादातर टिप्पणियां पूर्वानुमानों के आधार पर की जा रही हैं, मानो भारत अलग-थलग है, इसके सामरिक हितों को नुकसान पहुंचा है और यह गंभीर सामरिक संकट में पड़ गया है। इन विचारधाराओं की अपनी अलग-अलग वजह है, परन्तु इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया कि आने वाले दिनों में एक नई विचारधारा उभर कर आएगी। अफगानिस्तान के जमीनी हालात दुनिया के सामने हैं और जो दिख रहा है वही भारतीय कूटनीति को लेकर कयास की वजह है।

तालिबान ने अपनी विचारधारा नहीं बदली है, यही बात भारत के पक्ष में जाएगी। तालिबान की उग्र-कट्टरपंथी इस्लामिक विचारधारा अफगानिस्तान तक ही सीमित नहीं है। इसका त्वरित असर पाकिस्तान पर पड़ेगा, जो तालिबान की जीत का जश्न मना रहा है और यह मान कर चल रहा है कि उसे क्षेत्र में सामरिक पकड़ हासिल हो गई है और चीन उसके साथ है। पाकिस्तान में सुन्नी उग्रवादी गुट आतंक की फैक्ट्रियां चला रहे हैं। उनके लिए इस्लाम पहले है, राष्ट्र बाद में। इधर, तालिबानी कट्टरपंथ 20 साल में और मजबूत हो गया है और इसने कई पाक गुटों को अपनी जद में ले लिया है, क्योंकि ये कट्टरपंथ सिखाने वाले संस्थानों के विस्तार में यकीन करता है। यही पाकिस्तान में अस्थिरता का कारण बनेगा।

 

अफगान तालिबान और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के बीच घनिष्ठ संबंध हैं। अलकायदा के सहयोगी हक्कानी नेटवर्क के भी इनसे नजदीकी संबंध हैं। जैसे ही ये ताकतें एकजुट होंगी, इसका सीधा असर पाकिस्तान पर पड़ेगा। अफगानिस्तान के मौजूदा संकट से मुक्त होते ही तालिबान इस्लामी कट्टरपंथ के प्रसार के अपने असली एजेंडा पर आगे बढ़ेगा। इसका पहला निशाना पाकिस्तान ही होगा, जिसके साथ यह 2640 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है।

मुस्लिम देश अफगानिस्तान पर काबिज ये इस्लामिक अमीरात अपनी सोच नहीं बदलेंगे। तालिबान जो कानून अफगानिस्तान में लागू करना चाहता है, मजबूरन अफगानियों को उसका पालन करना ही होगा, अन्यथा उनका वहां रहना दुश्वार हो जाएगा। आतंक ऐसे ही पनपता है, क्योंकि जब विचारधारा की जड़ें विरोध के प्रति असहिष्णु हो जाती हैं तो विरोध शांत हो जाता है और जान बचाने की जुगत में लोग शासन के अनुगामी हो जाते हैं। इसी का नतीजा होता है आतंकवाद, और जब यह फैलता है किसी सीमा को नहीं मानता।

 

कैसे विश्वास किया जा सकता है कि तालिबान, अफगानिस्तान में पनप रहे अलकायदा, ‘ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट’ (ईटीआइएम) और अन्य आतंकी गुटों को अन्य देशों पर हमला करने से रोकेगा? चीन खास तौर पर ईटीआइएम को लेकर चिंतित है जो इसके शिंजियांग प्रांत की आजादी चाहता है। पाकिस्तान के लिए टीटीपी चिंता का सबब बना हुआ है, जो अफगान तालिबान के कारण ज्यादा ताकतवर बन रहा है। इन दोनों के बीच आपसी संबंध हैं क्योंकि इनकी जडें एक ही जगह हैं – पश्तून प्रभुता में, जो इस्लामिक कट्टरपंथ का गढ़ है।

क्षेत्र का नक्शा जो आकार ले रहा है, विश्व के लिए चिंता का सबब होना चाहिए। कट्टरपंथ से चरमपंथ पनपता है और उससे आतंकवाद। इस स्थिति में भारत को सावचेत रहने की जरूरत है। आने वाले महीनों में जब तालिबान, अफगानिस्तान में आतंक पर काबू नहीं पा सकेगा तो चीन और पाकिस्तान दोनों इसकी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करेंगे, तब विश्व को आतंक के प्रतिरोध का पाठ यदि कोई पढ़ा सकेगा तो वो होगा भारत। अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इससे सहमत नजर आ रहा है।

 

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